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| On 3 years ago

इतिहास में दर्ज है "पानीपत के तीन युद्ध" लेकिन अभी हाल ही में हमने जीता है "पानीपत का चौथा युद्ध" और वह भी ड्रैगन से।

इतिहास कहता है कि पानीपत में 3 युद्ध लड़े गए। पहला 1526 में बाबर ओर लोदी के बीच, दूसरा 1556 में अकबरी सेना और हेमू के बीच, तीसरा 1760 में अब्दाली औऱ मराठो के बीच औऱ चौथा?

जी हाँ। पानीपत का चौथा आर्थिक युद्ध भी लड़ा जा चुका है लेकिन काफी लोगो को उसकी खबर नही है, पानीपत के चौथे युद्ध को हमने जीता है और इस जीत को अनेको बार दोहराकर ही हम "चाइना" के खतरे से देश को बाहर निकाल पाएंगे।

आइये, पानीपत की चौथी लड़ाई को जानते है। यह लड़ी गई चीन की सोची समझी आर्थिक रणनीति के विरुद्ध अंसगठित भारतीय कामगारों द्वारा।

अलीगढ़ के तालों व रामपुर के चाक़ू के समान पानीपत के खेस व कम्बल बहुत प्रसिद्ध रहे हैं लेकिन चीन की सब्सिडी आधारित सस्ती कम्बलों द्वारा

पानीपत का बाजार वर्ष 2000 में लाद दिया गया। पानीपत में बनी कम्बलों को चीनी सस्ती कम्बलों ने बाजार से हटा दिया। चीन की कम्बल हल्की,सुंदर व दिलकश थी सो पानीपती कम्बलों पर भारी पड़ी।

पानीपत में कम्बलों का निर्माण ठप्प होने से हजारों कामगार बेरोजगार हो गए। व्यापारी चीन से कम्बल मंगवाकर इस मंडी में बेचते थे। इस विपरीत दशा में एक स्थानीय व्यापारी ने चीन से "कम्बल बनाने की मशीन" का आयात किया।

जब चीन से आई इस मशीन का स्थानीय कारीगरों ने सूक्ष्म अवलोकन किया तो उन्हें लगा कि वे इस मशीन पर काम भी कर सकते है और भविष्य में ऐसी मशीन बना भी सकते है।

एक विश्वास से कार्य आरम्भ हुआ और ऐसी 37 यूनिट्स लगी। धीरे-धीरे पुनः पानीपत की कम्बल वापस मुख्य भूमिका में आई और चीनी कम्बल हाशिये में चली गई। आज

पानीपत में सैकड़ों यूनिट्स जम कर कम्बल बना रही है। रोजगार बढ़ रहा है व विदेशी मुद्रा प्राप्त होने लगी हैं।

जिस प्रकार से पानीपत ने बाज़ार से "चीन के माल " को आउट किया वह एक नजीर बन गया है। इसी "पानीपत मॉडल" पर काम करके हम प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकते है। आखिर हमने पानीपत का युद्ध जीत ही लिया!

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