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| On 3 years ago

"केंटकी में शिक्षा पर प्रश्न" विश्व परिदृश्य में भारतीय प्रतिउत्तर व सम्भावना

हमारी "शिक्षा प्रणाली" की सुरक्षा व संवर्धन की आवश्यकता। अमेरिकन राज्य "केंटकी" में उठे प्रश्न आगे बढ़े।

जब अमेरिकन स्टेट "केंटकी" के व्यक्तियों को स्वयं की "शिक्षा प्रणाली" को बचाने की चिंता हो रही है तो हम किस तरह अपनी पुरातन शिक्षा प्रणाली को लेकर हमारी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ सकते है।

अमेरिका के दक्षिणी पश्चिमी व ओहियो नदी के किनारे बसे राज्य केंटकी के गवर्नर को 20 अप्रैल को श्रोताओं को राज्य की शिक्षा प्रणाली पर जबाबदेह होना पड़ा।

हजार्ड नामक स्थल पर इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का विषय यद्यपि "क्षेत्रीय आर्थिक विकास" था परन्तु उपस्थित समुदाय को आर्थिक विषय से अधिक शैक्षिक परिदृश्य की चिंता सता रही थी। समुदाय ने गवर्नर मेट बेविन के समक्ष शिक्षा प्रणाली व शिक्षको की समस्याओं पर गम्भीर प्रश्न रखे।

इन गम्भीर प्रश्नों में से कुछ निम्नानुसार है-
1. हम आर्थिक विकास से प्राप्त लाभों का एक अशिक्षित समुदाय के साथ कैसे विनियोग कर सकेंगे?

2. आप शिक्षा व शिक्षकों पर अपनी कठोर प्रतिक्रिया को किस प्रकार न्यायोचित ठहरायेंगे?
स्थानीय शिक्षक पेंशन प्लान में

बदलाव व बजट की सम्भावित कटौती के विरुद्ध अपना पक्ष रखने हेतु गत दिनों प्रदर्शन कर रहे थे।

अमेरिका के केंटुकी के समान भारत के अनेक राज्यो में कमोबेश यही दशा है व शिक्षक इसी प्रकार अपनी बात रखने का प्रयास कर रहे है।

भारतीय परिदृश्य अमेरिकन परिदृश्य से भिन्न है। भारत का अमेरिका से कही पुराना व उत्तम शैक्षिक परिदृश्य रहा है। आज कम से कम भारत मे तो मूल "भारतीय शिक्षा प्रणाली" को देख पाना बहुत मुश्किल हो रहा है।
आज हम हमारी जीवनमूल्यों व रोजगार को बढाने वाली शिक्षा के स्थान पर अन्य राष्ट्रों के शेक्षिक ढांचे को क्रमशः अपना रहे है।

सभी शिक्षकों, शिक्षाविदों से अपेक्षित है कि वे वर्तमान व्यवस्था में ही भारतीय शिक्षा मूल्यों को सम्मिलित करने हेतु नियमित प्रयास करे व इन प्रयासों को अभिलेख के माध्यम से प्रस्तुत करे।
आधुनिक विश्व मे जब आज जीवन मूल्यों का हास, मानसिक अवसाद, सामाजिक बिखराव, पर्यावरणीय अशुद्धि व नैतिकता क्षरण हो रहा है तब भारतीय शाश्वत मूल्यों का प्रतिस्थापन मानवता की रक्षा में सहायक हो सकेगा।

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  • आदर्श और मूल्य रोपण प्रक्रिया में विद्रोह और दमन न हो इसलिए विकास और शिक्षा समग्र और समता मूलक होनी चाहिए।हमारे भारतीय जीवन मूल्य कथनी और करनी में जमीन आसमान के अन्तर में झूल रहे हैं।जिन्हें एक यथार्थ धरातल तल पर व्यवस्थित करना आवश्यक है।हम शताब्दियों से किसी व्यापक सामाजिक आन्दोंलन से नहीं गुजरे फलस्वरूप सब अव्यवस्थित है।इन स्थितियों को एक स्वीकार्य यथार्थ के आदर्श धरातल पर लाना परम आवश्यक है।शुरुआत हमें शिक्षाविभाग के स्कूलों से करनी होगी जहाँ मूल्यांकन नहीं हो रहा है।मूल्यांकन के नाम पर जो है।उससे सब अवगत है।हम बच्चों का सही मूल्यांकन करें ।परीक्षा परीक्षा की तरह हो।शून्य प्रतिशत पर अगली कक्षा में क्रमोन्नत करें।ऐसा जब यथार्थ में होगा जब शिक्षक पर से परिणाम देने का दवाब समाप्त होगा।इस प्रक्रिया से बच्चे का कुछ छुपा न रहेगा।अभिभावक /शिक्षक/योजना कार वास्तविकता को जान सकेगें।तदनुसार काम हो सकेगा।कक्षा 8तक फेल न करेगें परन्तु बच्चे का रिपोर्ट कार्ड तो सब बोलेगा।कक्षा 9में प्रवेश परीक्षा हो।जो पास हो उन्हें एकेडमिक माध्यमिक शेष को अलग स्कूल में व्यावसायिक माध्यमिक में प्रवेश दे कक्षा 12तक सबको शिक्षित करें।