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| On 3 years ago

चलो, ढूंढते हैं समाधान।

चलो, ढूंढते हैं समाधान।

क्या बात हैं जनाब? आपके चेहरे से खुदाई नूर की जगह परेशानी का पसीना भला क्यों टपटप कर रहा हैं। क्या बात हैं जनाबे आली? क्यों इस तरह आप खुद से भी नाराज़ लग रहे हों?

चलो छोड़ो। ज़माने भर की बातों को।अपनी सुनाओ। अच्छा। तो ये बात हैं कि आसपास के माहोल से सहमत नहीं हैं। आप परायों से और अपनों के व्यवहार से आज़िज आ चुके हैं क्योकि वे सब अपने आप से इतने मतबला हैं कि उन्हें आप की कोई परवाह तक नहीं। जनाब। सोच तो आप वाज़िब फरमा रहें हैं, पर सोचने से आखिर क्या होना हैं। सोचना तो एक क्रिया मात्र हैं और जब तक क्रिया का कोई उद्देश्य नहीं हो तो भला

वो निरर्थक ही तो मानी जायेगी ना, ठीक वेसे ही जेसे की बिना कारण विचरण करने पर पथिक आवारा कहलाता हैं और कही पहुचने की ठान कर चलने वाला यात्री कहलाता हैं। तो जनाब अपने सोचने का भी तो भला एक उद्देष्य बना डालिये। सोचिये जरूर पर समाधान की खातिर। जब भी सोचे तो समाधान की खातिर सोचे। हासिल समाधान को जीवन में उतार ले। फिर देखना आपकी चाल भी बदल जायेगी और जनाब का हाल भी बदल जाएगा।

जब आप समाधान के लिए सोचना शुरू करने वाले हैं तो थोडा बहुत हमारा मशवरा और सुन लीजिये। सुनने में जाता भी क्या हैं। कुछ पसंद आये तो मान लीजियेगा और नहीं जचे तो भुला दीजियेगा। ठीक वेसे ही जैसे पिछली मर्तबा आप जब शहर

के सबसे बड़े माल को देखने गए तो देखी तो हज़ारो चीजे थी पर लाये तो वही माल थे ना जो की बेगम साहिब द्वारा बनाई लिस्ट में था।

पहला मशवरा ये हैं जनाब की सोचने का काम दिमाग का हैं और दिमाग बड़ा हजरत हैं। ये टिकता नहीं पल पल बदलता हैं कभी गुजशता दौर में चला जाता हैं तो कभी आने वाले कल की फ़िक्र में परेशान हो जाता हैं। ये बड़ा मतलबी हैं एक तो हर काम को करने के आसान तरीके ढूंडता हैं और सख्त इतना की बड़ी मुश्किल से घिसता हैं। इसको काम में लेना बड़ा मुश्किल। हम आप तो पूरी जिंदगी इसका जरा सा हिस्सा ही काम में ले पाते हैं।

कहते हैं बड़े से बड़ा आलिम फाजिल आइन्टाइन

ने भी महज इसका रूपये में दो आना ही काम में लिया था। सबसे जियादा इसको योगेश्वर कान्हा ने काम में लाने की सफलता हासिल की थी। जनाब इस दिमाग पर फ़तेह हासिल करने के लिए और इसको समझने के लिए अनगिनत आलिम फ़ाज़िल अपना सर प्रयोगशाल्लाओं में धुन रहे हैं। पर खाकसार को एक जुमला याद आता हैं और वो बड़े मियॉं ने कहा हैं कि " खाली दिमाग शैतान का घर"। यानी इसको काम में लगा के रखो। ये काम में रहे इसका नुश्खा हैं अपने मन पर नियंत्रण रखो और मन जब नियंत्रतित होगा जब आप अपनी ज्ञानेन्द्रियों को किये जाने वाले काम में शामिल करो।

समाधान को ढूंढना कोइ जंगल में खोई सुई ढूंढने जैसा मुश्किल थोड़े ही हैं। बड़ा आसान हैं बस इसके लिए आपको अपनी भूमिका और कर्तव्य को देखना पड़ेगा। ये भी याद रखना होगा की दोनों एक नहीं जुदा जुदा हैं। इसे यु समझे की कर्तव्य पूरा नहीं करने पर दंड भुगतना पड़ता हैं इसलिए सब कमसेकम इसको निभातें जरूर हैं और भूमिका कोई कोई निभाता हैं और जो इसको निभाता हैं समाज सदैव के लिए उसका रिणी हो जाता हैं। यूँ देखो की चाणक्य ने अमात्य का कार्य कर कर्तव्य पूरा किया परंतु अखंड भारतवर्ष की स्थापना में सहयोग कर भूमिका निर्वहन किया।

तो कहना ये हैं कि जनाब। आप अपने कर्तव्य और भूमिका का निर्वहन आपको प्रदत्त ईश्वरीय नियामतों से सरोबर अपने दिमाग के क्रियात्मक सहयोग से कर अपने परिवेश को खुशनुमा कीजियेगा।