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प्राचीन राजपूताने में खान-पान

प्राचीन राजपूताने में खान-पान

राजपूताने के अलग अलग राज्यो में खान – पान जुदा जुदा है! पश्चिमी भागो में लोग बहुधा जवार, बाजरी और मोंठ पर निर्भर रहते थे और भेड़ बकरी मवेशी पालते थे तथा उनकी उपज को बाहर भेज देते थे! दक्षिणी और पहाड़ी इलाको में मक्की, जवार और गेहूँ पर लोग निर्वाह करते थे! पूर्वी भागो में गेहूँ अधिक खाते थे! हिन्दुओ में अधिकतर लोग शाकाहारी होते थे! राजपूत बहुधा मांस खाते थे! उनको बकरे और सुअर का मॉस बड़ा प्रिय था! राजपूताने के देशी

राज्यो में गाय, बकरी, कबूतर, बन्दर, मोर, उल्लू और बिल्ली को मारने की सख्त मनाही थी और इनको मरना भयंकर पाप माना जाता था!

अधिकतर जन सामान्य एक दिन में चार बार भोजन करते थे!
१. सीरावान- सुबह का नास्ता या कलेवा!
२. रोटी- १०-११ बजे दिन का भोजन!
३. दोपहरी- दो तीन बजे दिन का भोजन!
४. ब्यालू- संध्या का भोजन!

आम लोग गेहूँ, गुजी, बाजरी, ज्वार,मक्की की रोटियाँ राबड़ी के साथ या साग तरकारी के साथ खाते थे या मिर्च व लूण(नमक) की चटनी के साथ खाते

थे! अमीर लोगो को चावल, गेहूँ की रोटियाँ (फुल्के) व मिठाई नसीब होती थी! किसान अधिकतर कर्जे में डूबे हुए और गरीब होने से एक वक्त की रोटी भी कठिनता से पाते थे! ये आम किसान अनाज का रुखा सुखा दलिया, खीचं, सोगरा आदि खाकर गुजर बसर करते थे! जैसा कि एक कहावत से प्रगट है-

“कूरा करसा खाय , गेहूँ जीमे बाणिया!
अर्थात किसान खुद कूड़ा अनाज(घटिया अनाज) खाकर अपने कर्जे के पेटे बोहरों (महाजनों) को देते थे!

तरकारी के लिए ये गरीब किसान केर, कूमट, फोग, सांगरी, पीलू आदि

बनैले पेड़ो की फलिया काम में लाते थे! उनको गोभी, शलगम आदि नगर की वस्तुएं कभी त्योहारों पर भी नसीब नहीं होती थी! खाने को चावल कभी कभार ही त्योहारो पर ही नसीब होता था! उपरोक्त खाद्य वस्तुओ की व्याख्या इस प्रकार है-

सोगरा- बाजरे के आटे की सेकी हुई सख्त रोटी जो कम से कम ८० या ९० ग्राम वजन की होती है!

राब- दही की छाछ में बाजरे का आटा घोल कर सुबह या शाम को उबाला जाता है और दूसरे दिन खाया जाता है!

खीच – बाजरे को ओखली में

कूट कर और उसका छिलका उतार कर चौथाई हिस्सा मोंठ मिले पानी में पका कर गाढा बनाया जाता है! इसमें कभी कभी खाते समय घी या तिल्ली का तेल डालते है!

घाट- मक्का का मोटा डाला हुआ आटा पानी में पका कर गाढ़ा बना लिया जाता है!

दलिया- यह बाजरे के आटे की घाट ही है परन्तु ये पतला होता है!

उपरोक्त भोजन आज राजस्थान की विभिन्न होटलो और विश्व में अनेक स्थानो पर बड़े चाव से खाया जाता है!