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| On 3 years ago

भारत – एक कटु भविष्यवाणी।

भारत – एक कटु भविष्यवाणी।

भारत विश्वगुरु

विश्व परिदृश्य में भारत का एक विशिष्ट स्थान है। भारत एक मात्र राष्ट्र हैं, जिसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व धरोहर वर्तमान में प्रासंगिकता कायम रखतें हुए सम्पूर्ण विश्व को सम्यक् जीवनशैली व दर्शन प्रदान करने में सक्षम है। भारतीय संस्कृति, दर्शन, कला, विज्ञान, सामाजिकता, ज्ञान व लोककला ना केवल भारत को विश्वगुरू की उपाधि हेतु योग्यता प्रदान करती है अपितु यह विश्व परिदृश्य में मानवता के विकास व मार्ग प्रशस्तीकरण हेतु भी सहायक है। भारतीय विशिष्टताओं का सम्वर्द्धन आने वाली पीढीयों हेतु वर्तमान मानव जाति का प्रथम दायित्व हैं। वर्तमान काल में समस्त भारतवासियों का यह परम पुनित कर्तव्य हैं कि वह "भारत तत्व" की पहचान कर उसके पुष्टीकरण एवम् संवर्द्धन में अपनी तमाम शक्तियों का विनियोग करें।

भारत एक स्वर्ग समान देश

वर्तमान भारत सम्पूर्ण विश्व हेतु एक मंच के रूप में उपलब्ध है, जहाॅ किसी भी प्रकार की विचारधाराओं के समन्वित व समग्र प्रभाव को समझा जा सकता है। यह एकमात्र राष्ट्र है जहाॅं किसी भी राष्ट्र का नागरिक ना केवल अपने प्रदेश के भौगोलिक स्वरूप की प्राप्ति कर

कर सकता है अपितु अपने राष्ट्र की विचारधारा, धार्मिक स्वतन्त्रता के दर्शन भी कर सकता है। भारतभूमि एक कर्म-भूमि व तपों-भूमि के रूप में विश्व कों एक सहज स्वर्ग के रूप में उपलब्ध है। यह इस राष्ट्र की सहजता व उदारता हैं कि अनेकों विदेशी आक्रमणों के उपरान्त भी भारत के मूल स्वरूप का दर्शन न्यूनाधिक रूप से आज भी सम्भव है।

सांस्कृतिक अवमूल्यन

भारतीय संस्कृति में आए अवमूल्यन हेतु विदेशी ताकतों, विचारों, दर्शन, खुलापन, आर्थिक उदारतावाद इत्यादि को जिम्मेदार ठहराना हमारी प्राथमिक भूल मात्र हैं इसकें अलावा कुछ भी नहीं। भारतीय संस्कृति में आनेे वाले अवमूल्यन हेतु एक मात्र दोष हमारी कमजोर मानसिकता का है, जिसमें निज मूल्य व निज सम्मान की रक्षार्थ उत्सर्ग का भव उत्तरोतर रूप से कमजोर हो रहा हैं। सक्षमता किसी गुलाम के बाह्य आवरण कों परिवर्तित कर सकती हैं परन्तु उसके अन्र्तकरण पर कदापि काबिज नहीं हो सकती। एक पक्षी को पंख विहीन कर पिजंरे में कैद तो किया जा सकता है परन्तु उसकें हृदय में ऊँची उडान के सपनें को नेस्तानाबुद कदापि नहीं किया जा सकता है।

समाज एक अदृश्य ज्वालामुखी के मुहाने पर

आज हम उदार दृष्टि सें विचार करे तो हमे यह स्वीकार करना होगा कि मूल्यों का अवमूल्यन समाज के प्रत्येक क्षैॅत्र में प्रथम दृष्टया परिलक्षित हैं समाज के अग्रज व अग्रणी खासजनों से लेकर अन्तिम आमजन तमाम प्रकार की भौतिक सुविधाओं की प्राप्ति हेतु समस्त मूल्यों की तिलांजली हेतु आसानी से तत्पर है। अधिकांश जनसंख्या नाना प्रकार के भष्ट्राचारों में आकंठ डूबी हुई है। प्रत्येक व्यक्ति अपने आज को सुखकर व भविष्य को सुरक्षित करना जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान रहा है। प्रत्येक कीमत पर सफलता प्राप्ति की आतुरता में समाज विभिन्न वर्गो व उपवर्गाे में बंटता जा रहा है। समाज एक ऐसे ज्वालामुखी के कगार पर मौज-मैले व नृत्य मे रत है जिसमें किसी भी क्षण सम्भावित विस्फोट से हमारी अस्मिता व पहचान मिट सकती हैं।

वीर पुरूष व सती नारियाँ

भारतराष्ट्र जिसकें पुरूषों की वीरता व स्त्रियों का सतीत्व सम्पूर्ण विश्व में उसें प्रथम स्थान प्रदान करता रहा है ऐसे वीर पुरूषों व सती स्त्रियों की अपेक्षा ऐसे मानव समूहों के दर्शन हो रहें है। जिसके स्वरूप में लालच, स्वार्थ, लम्पटता, आमोद-प्रमोद आदि मानों रच बस गए है।

अज्ञात खतरा

भय, भूख, भष्ट्राचार के इस तांडव नृत्य मेे अबोध मानवता कहीं सिसक रहीं है। समाज के लम्बरदार स्वयं के बनाए मूल्यों के बाजार में मानव मूल्यों को मनचाही कीमत पर नीलाम कर रहें है। प्रत्येंक ह्रदय में आज राम व रहिम, राष्ट्र के प्रति अगाध श्रृद्धा के चिरस्थायी भाव कों खोज पाना दुष्कर होने लगा है। एक तुच्छ निजी लाभ की प्राप्ति हेतु समाज को होने वाली स्थायी व दीर्घगामी हानि को सहन कर सकने की अपूर्व क्षमता आज के मानव ने अज्ञात स्त्रोतों से प्राप्त कर ली है।

उज्ज्वल भविष्य

किसी भी अंधेरी रात के दूसरी तरफ प्रातः की पवित्र किरणें मानव जाति की सेवार्थं सदैव उपलब्ध होती रही है। आवश्यकता मात्र इतनी ही है कि हम अंधेंरी रात के तमों गुण से व्यथित ना हो, ह्रदय में विश्वास का दीपक जलाएॅ और एक जुगनू के रूप में स्वयं को प्रकाशित कर दूसरों हेतु एक उदाहरण बने। प्रत्येक भारतीय से यह अपेक्षित है कि वह संर्कीण स्वार्थो की बेडियों से स्वयं को मुक्त कर एक सुन्दर, सहज, समाज के पुर्ननिर्माण के इस यज्ञ में अपने

कर्माे की आहूति से स्वयं को गौरान्वित व राष्ट्र को यशस्वी होने का आधार निर्माण करे।

प्रत्येक मनुष्य वर्तमान में भौतिक रूप से अवश्य तृप्त दिख रहा है परन्तु उसका अन्तर्मन उसकी अंतरात्मा उसके वर्तमान जीवन कों कचोटते हुए उस विलक्षण भारत तत्व की खोज में संलग्न है जिसकें गर्भं में पारस पत्थर की अलौकिक शक्ति, कस्तुरी सी अनुपम खुश्बू, अक्षय-पात्र सी उदारता व कामधेनु सा सर्वकल्याणकारी भाव है।

कटु भविष्यवाणी

सृजन व विनाश कदापि आकस्मिक नहीं होते, इसके प्राकट्य से अनेकों वर्ष पूर्व इनका बीजारोपण होता है। प्रकृति विध्वंस के रूदन से पूर्व अनेकों बार प्रत्यक्षतः व अप्रत्यक्ष रूप से इसका पूर्वाभास निश्चित रूप से करवाती है। आज समाज में चहॅुं ओर दिखती अव्यवस्थाऐं, भष्टाचार का भयानक स्वरूप व विकृत होता सामाजिक परिदृश्य हमें स्पष्ट संकेत प्रदान कर रहा हैं कि हम "अहम् ब्रह्मास्मि" के उदघोष के साथ "वसुधैव कुटुम्बकम" के स्वरूप जैसा सम्पूर्ण विश्व परिदृश्य तैयार करे अन्यथा

"एक नया कुरूक्षैत्र मुँह उठाए हमारा इन्तजार कर रहा है।"

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे भवन्तु निरामय! " की सदभावना के साथ एक साथी।