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| On 3 years ago

भाषा का सौंदर्य ही समृद्धि का सूचक है।

भाषा का सौंदर्य ही समृद्धि का सूचक है।

विश्व की अनगिनत भाषाओ में देववाणी संस्कृत, लेटिन व रोमन को मुल भाषा के रूप में स्वीकार किया जाता है। इन भाषाओ से अनेक भाषाओ का जन्म व विकास हुआ हैं। संस्कृत में रचित साहित्य भाषाई श्रेष्ठता के हर स्तर पर प्रमाणित हुआ हैं। संस्कृत भाषा की यह विशेषता हिंदी भाषा में भी स्थापित हैं।

विद्यालय में

भाषा शिक्षको का एक विशेष महत्व व विस्तृत भूमिका हैं। भाषा शिक्षक को विद्यार्थियों में निहित स्थानीय उच्चारण को परिमार्जित करते हुए सही व स्टेंडर्ड स्तर तक लाना प्रथम चुनोती होता हैं क्योकि सही उच्चारण के अभाव में सही लेखन कठिन होता है।

भाषा को उचित मानदंड स्तर पर स्थापित करने के पश्चात भाषाई सौंदर्यकरण सतत सामूहिक व एकल प्रयास से सम्भव है। इस हेतु विद्यालय में संचालित पाठ्यक्रम से इतर प्रयास अपेक्षित हैं। कक्षा शिक्षण के साथ ही हमें पुस्तकालय का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना होगा।

विद्यालय में प्राथमिक स्तर पर सुलेख व श्रुतिलेख, उच्च प्राथमिक स्तर पर कविता-

कहानी संग्रह, प्रतियोगिताएँ , वैचारिक अभिव्यक्ति इत्यादि को प्राथमिकता प्रदान करनी चाहिए। उच्च स्तर पर स्वाध्याय, लेखन, अभिव्यक्ति, शोध-अनुसंधान, समूह-अधिगम, प्रकाशन का विकास होने लगता है।

भाषा के सौंदर्यकरण से समाज की मानसिकता व सम्प्रेषण दोनों में सकारात्मक परिवर्तन प्राप्त होते हैं व समाज समृद्धि की तरफ अग्रसर होता हैं। भाषा के विकास के क्रम में ही सामाजिक विकास की रचना बनती है।

आज भाषा को लेकर विश्व मे अनेक शिक्षाविदों अपनी चिंता प्रकट कर रहे है। इंटरनेट के विकास के साथ ही भाषाओं के साथ अनेक प्रकार के अवांछित प्रयोग हो रहे है। इंटरनेट की स्वयं की एक अलग भाषा विकसित हो रही है। इस नई भाषा को स्लेंग कहा जाने लगा है।

आज एक शिक्षक का यह उत्तरदायित्व बन गया है कि विद्यालय गतिविधियों में भाषाई शुद्धता पर पूर्ण ध्यान प्रदान करे। भाषा शिक्षको को हर समय भाषाई शुद्धता पर ध्यान केंद्रित रखते हुए भाषा का लगातार विकास सुनिश्चित रखना है क्योंकि इसी से हमारी संस्कृति, संस्कार व समृद्धि जुड़ी है।

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  • वास्तव में विद्यालय के शिक्षकों हेतु भाषा पर निपूणता अत्यंत आवश्यक है , उसके बिना अच्छे शिक्षक की कल्पना नही की जा सकती है ।।