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| On 3 years ago

मेरा संघर्ष, तेरा संघर्ष , क्यूँ नही बन सकता "साँझा संघर्ष" ?

मेरा संघर्ष मेरी जाति और मेरे धर्म तक ही सीमित है। अगर आपको एतराज है तो अपने एतराज को रखिये अपने पास।बस कुछ ऐसी ही धारणा बनने लगी है आज सम्पूर्ण राष्ट्र में। अगर संघर्ष है तो वह सांझा क्यों नहीं ? क्यों मेरा संघर्ष आपके संघर्ष से जुदा है और क्योंकर मुझे आपके संघर्ष से कोई राब्ता नही?

हालियाँ अनुभव-
ऐसा अनुभव अभी पिछले दिनों हुआ जब एक वर्ग अपने हितों के लिए देश की सड़कों पर निकल आया था। छोटे-बड़े दंगे भी हुए और

जम के अफरा-तफरी भी मची। जिन लोगों के साथ जीवन जिया वो सड़क पर अचानक से अजनबी लगने लगे और बात कड़वी जरूर है पर सच है कि एक डर का भी अहसास हुआ।

हकीकत की बात-
अगले दिन जब फिर उसी चौपाल पर साथ बैठे और उन्हें उनकी हरकतों का उलाहना दिया तो मेरे बचपन के साथी ने खीसें निपोरी और बताया कि वो कोई और थे। ऐसा क्यों? हाथ मे लट्ठ लिए सार्वजनिक सम्पतियों को नुकसान पहुँचाने वाले हमेशा कोई और क्यो होतें है? क़्या वो "टेरर परमिट" पर देश मे घुसे सैलानी होते है?

काली परछाइयाँ -
कल हम भी सड़क पर होंगे और जब कोई पीड़ित उलाहना देगा तो हम भी खीसें निपोरते और "कोई और थे" का राग अलापते हुए मिलेंगे। ये दौर ऐसे ही गुजरेगा और आने वाले वक्त में जब इस वक्त का इतिहास लिखा जाएगा तो आज के कालखंड को "दोहरे-तिहरे मुखोटों" वाले लोगों का काल साबित किया जाएगा।

लोकमत-
हम विचार कुछ करते है, स्वजन समूह में कुछ और व्यक्त करते है और समग्र समूह में कुछ

तीसरा व सर्वप्रिय स्टेटमेंट जारी करते है। आखिर हमारी कौनसी मजबूरी है जो हमें सत्य तक नही बोलने देती। हम क्यों लाचार होने लगते है।

आज हमारे देश की इंटरनेशनल सामुदायिक रेटिंग बहुत कमजोर है। हम चाहे खुद को विश्वगुरु कहते फिरे लेकिन जब हम विदेशी मीडिया का हमारे प्रति विकसित दृष्टिकोण जानेंगे तो हमारी आत्मा ग्लानि से भर जाएगी।

बिगड़ती फिज़ा-
विदेशी मीडिया धार्मिक अंधता के मामलों में हमारी तुलना सीरिया जैसे देशों से कर रहा है। हमारी सरज़मीं को "बलात्कारियों की जमीन" कहने से नही बाज आ रहा है,

और यह पूर्ण नहीं तो कुछ हद तक तो सत्य भी होगा और हमारी श्रेष्ठ संस्कृति इस दाग को कदापि सहन नही कर सकेगी।

निराकरण-
वक्त आ गया है कि हम रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें ,अपने दिमाग से सोंचे, अपने दिल की सुने औऱ अपने कदमों पर चले। कोई यह नही कह सके कि उसका संघर्ष उसकी जाति और धर्म तक सीमित है। आइये , मेरे संघर्ष और आपके संघर्ष को एक बनाये मिलजुल कर करते है "साँझा सँघर्ष"!!