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| On 3 years ago

"रामसेतु" तो प्रत्यक्ष मौजूद है। इस पर विवाद कैसा? यह मात्र क्षेत्रीय अस्मिता ही नही अनुपम विश्व धरोहर है। पढ़िए सम्पूर्ण आलेख।

भारत और श्रीलंका को प्राचीन समय मे जोड़ने वाले इस राम

सेतु को व्यर्थ ही अन्य नामो से पुकारने का प्रयास किया जा रहा है। इस सेतु के अवशेष स्पष्ट रूप से रामेश्वरम से श्रीलंका के मध्य आज उपलब्ध है।

"गल्फ ऑफ मन्नार" और "पाक जलडमरूमध्य" को विभक्त करने वाले इस सेतु की लंबाई करीबन 50 किलोमीटर है। ऐसा कहा जाता है कि 15वी शताब्दी तक इस सेतु पर पैदल आवागमन सम्भव था। लगातार आने वाले तुफानो और जल स्तर अभिवर्द्धन के कारण अब इसके माध्यम से आवागमन सम्भव नही रहा है।

वाल्मीकि रचित "रामायण"के अनुसार इसे श्रीराम के वीर सैनिकों ने वीर नल के निर्देशन में इसे तैयार करके "सीता माता"की मुक्ति हेतु युद्ध मे विजय प्राप्त की थी। 1804 ईसवी में एक ब्रिटिश नक्शानवीस ने सर्वप्रथम आधुनिक रूप से इसके नक्शे को तैयार किया था। इससे पहले अलबरूनी के साहित्य में भी इस सेतु का उल्लेख किया गया है।

इस सेतु की आयु का आकलन रेडियो कार्बन

डेटिंग विधि से करने पर इसकी निर्माण अवधि 8 हजार से 14 हजार वर्ष पूर्व की आंकी गयी है। भारतीदशन विश्विद्यालय, तिरची के प्रोफेसर श्री रामास्वामी के द्वारा सम्पादित वैज्ञानिक परीक्षण में इस समयावधि को 3500 वर्ष माना गया है।

नासा,अमेरिका द्वारा जारी 2002 के टेलिस्कोपिक चित्रों के माध्यम से हुए अध्ययन के अनुसार रामसेतु नामक यह सरंचना प्राकृतिक रूप से निर्मित नही होकर एक मानवनिर्मित सरंचना है।

सरंचना के निर्माण के क्रम में पुरातन धर्मशास्त्र "रामायण" में इसके निर्माण का कारण व महत्व की जानकारी उपलब्ध है अतः आज हम सविनीत भाव से हमारे गौरवशाली इतिहास एवम हमारे पूर्वजों द्वारा सम्पादित अतिविशिष्ट कार्य पर स्वयम को कृतार्थ अनुभव करते है।

इस सेतु के निर्माण क्रम में पत्थर के पानी पर तैरने की बात कुछ लोगो को अवश्य अतिश्योक्ति लग सकती है परंतु वैज्ञानिक दृष्टि इसके पक्ष में है। इतिहासकार और पुरातत्वविद प्रोफ़ेसर माखनलाल कहते हैं, "इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कोरल और सिलिका पत्थर जब गरम होता है तो उसमें हवा कैद हो जाती है जिससे वो हल्का हो जाता है और तैरने लगता है. ऐसे पत्थर को चुनकर ये पुल बनाया गया था"।

आज भी रामेश्वरम में ऐसे अनेक कुंड है जहाँ पर आपको स्थानीय व्यक्ति पत्थर को पानी पर रोक कर बता देते है। अब सामान्य व्यक्ति के मत में यह निश्चित है कि यह रामसेतु है व इसे श्री राम जी के कालखंड में निर्मित किया गया था।लेकिन, एक विवाद इसे लेकर भी बनाया गया है। विवाद साल

2005 में उस वक्त उठा जब सरकार ने 12 मीटर गहरे और 300 मीटर चौड़े चैनल वाले "सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट" को हरी झंडी दी।

ये परियोजना बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के बीच समुद्री मार्ग को सीधी आवाजाही के लिए खोल देती लेकिन इसके लिए 'रामसेतु' की चट्टानों को तोड़ना पड़ता। प्रोजेक्ट समर्थकों के मुताबिक, इससे जहाज़ों के ईंधन और समय में लगभग 36 घंटे की बचत होती क्योंकि अभी जहाज़ों को श्रीलंका की परिक्रमा करके जाना होता है। प्रोजेक्ट के पक्ष-विपक्ष में काफी कुछ कहा जा सकता है।

"रामसेतु" एक वृहद प्रश्न है एवम इसको तोड़ने से पूर्व अनेको प्रश्नों का उत्तर देना लाजिमी है। मोटे तौर पर "रामसेतु" को बनाए रखने के पक्ष में निम्न बिंदु अत्यावश्यक है-

1. रामसेतु हटा कर दूरियां को कम करने हेतु बनाये जाने वाले चैनल की लागत कितनी होगी और कितने वर्षों में इसका प्रतिफल प्राप्त होगा?
2. रामसेतु विश्व मे मानव निर्मित सबसे पुरातन सरंचनाओं में से एक है। जिस प्रकार चीन "चीन की दीवार" का सरंक्षण कर रहा है क्या उसी प्रकार हम इस ऐतिहासिक सेतु को सरंक्षण प्रदान कर सकते है।
3. जिस प्रकार हिमालय ने सदियों से हमे सुरक्षा प्रदान की है उसी प्रकार से रामसेतु भी हमे समुद्री सीमा पर सुरक्षा प्रदान कर रहा है। इसकी वजह से कोई दुश्मन पोत हमारे नजदीक नही फटक सकेगा।
4. रामसेतु सुरक्षित रहे व हमारी आवश्यकता भी पूर्ण हो सके, यह एक तकनीकी प्रश्न है व हम भारतीय तकनीशियनों, इंजीनियरों व विशेषज्ञों से इसका उत्तर अपेक्षाकृत रखते है।
5. इस सेतु के विनाश से अनेक जलीय जन्तुओ, प्रजातियों का जीवन संकट में पड़ सकता है।
6. श्रीलंका हमारा निकटतम मित्र है एवम रामसेतु के हटने से बिगड़ने वाले पारिस्थिकीय परिवर्तन से जलस्तर बढ़ने से श्रीलंका के समक्ष भविष्य में गम्भीर प्रकार के संकट उपस्थित हो सकते है।
7. यह भी मत है कि इस क्षेत्र विशेष में अनेकानेक प्रकार के विशिष्ट पदार्थ सम्भवतः उपलब्ध है एवम अनावश्यक ऊर्जा संचरण से कुछ विशिष्ट प्रकार के परिवर्तन भी सम्भव है।
8. यह एक अनुपम धरोहर है एवम आधुनिक सम्पन्न विश्व को इसे इसके मूल स्वरूप में लौटाने के बारे में गम्भीरता पूर्वक मनन व विश्लेषण करना चाहिए।

आज वास्तविक चराचर जगत में राम का नाम ही प्रत्येक मनुष्य को एक दूसरे से जोड़ता है। व्यक्तियों के अंतर्क्रिया पूर्ण समाज मे रामनाम ही एक सेतु है। इस रामसेतु की सुरक्षा व संवर्धन आज के विश्व की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।