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विद्यालय में अनुशासन। अनुशासनहीनता के कारण, विद्यार्थियों के अनुचित आचरण, दायित्व, दण्ड व प्रयास।

विद्यालय में अनुशासन। अनुशासनहीनता के कारण, विद्यार्थियों के अनुचित आचरण, दायित्व, दण्ड व प्रयास।

विद्यालय में अनुशासन का वातवरण निर्माण-

संस्था में अनुशासन से तातपर्य संस्था के आचार- विचार की परंपराओं के निर्वाह, वर्जित आचार व्यवहार से बचने और सामान्य सामाजिक और नैतिक आचारों का पालन करने से है जिससे शांति, स्नेह, सहयोग, एकता, परस्पर आदर, मित्रता और कार्य करने का निर्बाध वातावरण बना रहे। संस्था में समुचित अनुशासन रखने का उत्तरदायित्व संस्थाप्रधान के नेतृत्व में सभी कर्मचारियों का है। संस्था में आचार विचार की ऐसी परम्पराएं डालनी चाहिए जिसके फलस्वरूप अनुशासन का वातावरण बना रहे। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अभिभावकों का सहयोग प्राप्त करना भी लाभप्रद रहेगा।

अनुशासनहीनता के कारण-

1. देश की वर्तमान परिस्तिथियाँ अपने आप ही छात्रों को उद्दंड एवम अनुशासनहीन बना रही है जिनसे निष्कर्ष निकलता है कि कुछ सीमा तक विद्यालय भी इस स्तिथि के लिए उत्तरदायी है, जो निम्नलिखित है-
(क) शाला स्टाफ का अनुशासनहीन होना।
(ख) कक्षा अध्यापन नियमित एवम प्रभावी नही होना।
(ग) शाला में लंबे समय तक प्रधानाध्यापक या अध्यापकों की नियुक्ति नही होना।
(घ) कक्षा कक्ष का छोटे होना या अभाव होना।
(ड) छात्रों की अवांछनीय गतिविधियों के बारे में माता-पिता या सरंक्षक को समय पर सूचना नही भेजना ।

विद्यार्थियों के अनुचित आचरण-

निम्नलिखित आचार-व्यवहार संस्था में अनुचित माने जाएंगे-
1. छात्रों का निर्धारित तिथि

के बाद भी विद्यालय शुल्क जमा नही करवाना।
2. बिना प्रार्थना पत्र लम्बे समय तक अनुपस्थित रहना।
3. आदतन निर्धारित समय पर विद्यालय नही आना और निर्धारित समय से पूर्व विद्यालय से पलायन कर जाना।
4. कक्षा में इतना शोर करना कि पडौसी कक्षा में व्यवधान पहुँचे।
5. सहपाठी, कर्मचारियों के साथ अभद्र व्यवहार करना।
6. दुश्चरित्रता की श्रेणी में आने वाला कोई आचरण करना।
7. विद्यालय में नशीली वस्तुओं का प्रयोग करना या प्रयोग करके आना।
8. नागरिक कानून में वर्जित कोई आचरण या व्यवहार करना।
9. संस्था के भवन , फर्नीचर एवम अन्य सामग्री को असुंदर बनाना या तोड़फोड़ करना।

अनुशासन दायित्व सामुहिक-

सामान्यतः यह अपेक्षा की जाती है कि

विद्यार्थी अध्ययन की अवधि में निश्चित आचार संहिता और विद्यालय के नियमों की पालना करेंगे। कभी-कभी विपरीत स्तिथि भी उतपन्न हो जाती है। प्रधानाध्यापक का दायित्व है कि वह सुधारात्मक रुख अपना कर स्तिथि पर नियंत्रण करे। वास्तविक दण्ड से दण्ड का भय अधिक प्रभावी होता है ।

अनुशासन भंग होने पर प्रयास-

अनुशासन भंग होने की स्तिथि में सर्वप्रथम निम्न प्रयास किये जायें-
1. अनुशासनहीनता से सम्बंधित छात्र को समझाकर अनुशासन बरतने के किये प्रेरित करना।
2. मौखिक या लिखित चेतावनी देकर अथवा माता-पिता को सूचित करके।

दण्ड-

गम्भीर मानी जा सकने योग्य परिस्थितियों में निम्नांकित प्रकार के दण्ड दिए जा सकेंगे।
(अ) अतिरिक्त कार्य- अतिरिक्त मानसिक या शारिरिक कार्य जो कक्षा

या संस्था के कार्य से सम्बंधित हो।
(ब) एकांत में उसके निषिद्ध कार्य को बतलाकर सुधार का प्रयास।
(स) छोटे अपराधों की या अनुशासनहीनता की स्तिथि में संस्था प्रधान द्वारा बनाये गए नियमो के अनुसार सम्बंधित अध्यापक या स्वयम संस्थाप्रधान द्वारा दिये जा सकेंगे।

दण्ड पर प्रतिबन्ध-

वर्तमान में विद्यालयों में शारीरिक व आर्थिक दण्ड को प्रतिबंधित कर दिया गया है। केवल बड़े एवम गम्भीर अपराधों की स्तिथि में एवम दोषी विद्यार्थी को सुधारने के लिए तथा विद्यालय वातावरण स्वस्थ बनाए रखने के लिए बहिष्कार/निष्कासन के आदेश संस्थाप्रधान की लिखित रिपोर्ट व अनुशंषा के आधार पर सक्षम अधिकारी द्वारा निकाले जा सकते है।