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| On 3 years ago

शिक्षा का भारतीयकरण। शिक्षा व्यवस्था किसका दायित्व?

शिक्षा का भारतीयकरण।

साधो। बात तो बहुत सीधी-साधी हैं परन्तु इसे अनावश्यक रूप से ना जाने क्यों किलिष्ट बना दिया गया हैं।

शिक्षा व्यवस्था कैसी हो?

आप ही बताइये कि भारत की शिक्षा व्यवस्था या प्रणाली या पाठ्यक्रम कैसा होना चाहिए? अपना या पराया, भारतीय या अभारतीय? निश्चित रूप से आपका जबाब होगा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, प्रणाली और पाठ्यक्रम भारतीय होने चाहिए। इस मूल बिंदु पर हम सभी सहमत हैं। अब जब हमने ये तय कर लिया हैं कि हमारी शिक्षा भारतीय हो, तो ये होकर रहेगा।

अब प्रश्न ये उठता हैं कि कोनसी व्यवस्था या प्रणाली या पाठ्यक्रम भारतीय है? इसका प्रत्यक्ष उत्तर हैं कि जो व्यवस्था, प्रणाली या पाठ्यक्रम भारतीय सिद्धान्तों पर आधारित हो वह भारतीय हैं। जैसे जो रस आम से बना है वो आमरस वैसे ही जो भारतीय सिद्धान्तों से निर्मित हो भारतीय।

अब तो बस मामूली काम शेष है कि हम भारतीय सिद्धान्तों या तत्वों को फटाफट पहचान ले और उसके आधार पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था निर्धारित कर लेवे तो बस हो जाएगा -शिक्षा का भारतीयकरण।

हालाँकि आप सभी अवगत है, फिर भी सुविधा हेतु में कुछ भारतीय सिद्धान्त आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

भारतीय सिद्धान्त

1 धर्म सत्ता का सर्वोपरी होना- किसी भी समाज में 4 सत्ता होती हैं। धर्म, ज्ञान, राज्य और अर्थ सत्ता। भारतीय समाज में आदिकाल से धर्मसत्ता प्रधान रही हैं। धर्मसत्ता के आधार पर ज्ञानसत्ता, ज्ञानसत्ता के आधार पर राज्यसत्ता और उसके आधार पर अर्थसत्ता कार्य करती हैं। भारतीय जनमानस सदैव धर्मसत्ता को प्रधान मान उसी के अनुरूप जीवन व्यवस्था एवम् जीवन शैली का पालन करते आये हैं।

2. परिवार न्यूनतम इकाई- भारत में समाज की मूल इकाई परिवार को माना गया हैं। हम परिवार से समाज, समाज से राज्य एवम् राज्य से भारतवर्ष के निर्माण की प्रक्रिया को जीते आये हैं। परिवार निर्माण के लिए ही समस्त संस्कारो की स्थापना की गई हैं। विवाह संस्कार की स्थापना ही परिवार निर्माण हेतु हैं। परिवार समाज की मूल इकाई हैं।

3. पूर्ण ज्ञान- हम भारतीय मूलस्वरूप में ज्ञान को पूर्ण स्वरूप में प्राप्त कर उसके माध्यम से मोक्ष प्राप्ति ही जीवन का सार मानते हैं। हम ज्ञान को अलग अलग करके नहीं अपितु प्रत्येक ज्ञान को दूसरे ज्ञान के पूरक स्वरूप देखते हैं। हमारे ज्ञानप्राप्ति का मूल उद्देश्य ही "स्वयम मोक्षाय एवम् जगत हिताय" हैं।

उपरोक्त सिद्धान्त मूल भारतीय सिद्धान्त हैं। इन सिद्धान्तों को अगर आधार बनाकर भारतीय शिक्षा व्यवस्था बनाई जाय तो ये हो गया भारतीय शिक्षा का भारतीयकरण। इसमें मुश्किल क्या है? चाहे सत्ता कोई भी हो? चाहे काल कोई भी हो? बस इन सिद्धान्तों का अपनाना मात्र हैं।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था

आइये। कसोटी पर कसते हैं वर्तमान व्यवस्था को। क्या वर्तमान शिक्षा व्यवस्था भारतीय हैं?

आज हम वर्तमान परिपेक्ष्य में शिक्षा व्यवस्था को देखे तो पाते है कि आकड़ों की दौड़ में हमने बहुत प्रगति की हैं। साक्षरता दर का विकास हुआ हैं, अनेक तरह के विश्वविद्यालय खुल गए हैं, विशेषज्ञ पाठ्यक्रम संचालित हैं, चमचमाते शैक्षिक गलियारों में सुटबूट धारी प्राध्यापक एवम् बेशुमार विद्यार्थी विचरण कर रहे हैं, सुनने में आया हैं कि अमेरिकी प्रेजिडेंट भी भारतीय विद्यार्थियो का लोहा मानने लगे हैं, विश्व के टॉप के संस्थानों में भारतीयो की तूती बोलती हैं। प्रथम दृष्टि में सब कुछ सुखद हैं।

जब सब कुछ ठीक प्रतीत हो रहा हैं और उस पर आंकड़ो से भी सिद्ध हो रहा है तो फिर वर्तमान व्यवस्था और उसके परिक्षण क्यों? क्यों आवश्यकता हैं कि हम वर्तमान शिक्षा का परिक्षण करे और आवश्यक हो तो इसका भारतीयकरण करे। क्या लाभ होगा शिक्षा के भारतीयकरण का?

साधो, आप बताइये कि क्या आप नहीं चाहते कि हमें उच्च जीवनशेली प्राप्त हो? जीवन में मानवीय मूल्यों का दर्शन हो? परिवार में त्याग, स्नेह, प्रेम दिखे? हम इसी जीवन में पूर्णता को अनुभव करे?

आज चारो तरफ दीखते विकास की ओट में मानवता सिसकियां भर रही हैं। आप शिक्षा के विकास के आंकड़ो के साथ ही अन्य आंकड़े भी देखे। आप शैक्षिक लोन के

आंकड़े देखे।इन लोन से पढ़ने वालो के कपितय मिलने वाले पेकेज़ों को देखे। किसानो की आत्महत्याओं को देखे। अस्पतालों में दर्ज मानसिक अवसादों एवम् आत्महत्याओ की संख्या को देखे। वर्गों के बीच पसरी आर्थिक असमानता को देखे। टूटते परिवारों को देखे। तलाक दर की वृद्धि को देखे। सिंगल पैरेंट चिल्ड्रन को देखे। घोर असंतोष से उपजे नक्सलवाद और आतंकवाद को देखे। पर्यावरण के हालात को देखे। बढ़ते बलात्कार की घटनाओ को देखे। एक विद्धवान ने तो यहाँ तक कहा हैं कि समाज में हो रहे समस्त उपद्रवों का केंद्र बिंदु ही शिक्षालय हैं।

इतिहास को भी देखे-

ये हालात क्यों हैं? इसको जानने हेतु हमें थोडा इतिहास को देखना पड़ेगा। भारतवर्ष अनेक राष्ट्रो का समूह रहा हैं। प्रत्येक राज्य की अपनी सीमाये थी। राजा महाराजा शासन करते, आपस में युद्ध करते, शासक बदलते परंतु आम जनता का इससे कोई ज्यादा सरोकार नहीं था। प्रजा अपने नियमों के आधार पर जीवन बिताती और ये नियम राज्य द्वारा नहीं अपितु धर्म सत्ता द्वारा निर्धारित थे। पाप नगण्य था, जीवन सरल था क्योकि जनता के मानस में था कि उनके गलत कार्यो को कोई देखे नहीं देखे पर भगवान देख रहा हैं। आम आदमी धार्मिक आस्थाओ के कारण धर्ममय जीवन व्यतीत करता था। आमजीवन में राजकीय दखल नहीं के बरोबर था, इसीलिए तो आमजनता कहती थी कि "कोउ नृप हो, हमें क्या हानि"। समय के साथ अनेक विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन से राज्य सत्ता का समाज में हस्तक्षेप बढ़ा। कर के माध्यम से अर्थ सत्ता पर राज्य ने ध्यान दिया। इसके बावजूद भी सत्ता निर्धारित क्रम में रही। अर्थसत्ता राज्यसत्ता के, राज्यसत्ता ज्ञान सत्ता के एवम् ज्ञानसत्ता धर्मसत्ता के आधीन रही। समाज में जीवन संतोष निरंतर जारी रहा। विदेशी आक्रमणकारी या तो धन लूट कर वापस चले गए या कुछ यहाँ बसकर यहाँ के हो गए। कुछ आक्रमणकारियों के काल में उन्होंने धर्मसत्ता के स्थान पर राज्य सत्ता को प्राथमिकता प्रदान की। इस काल में रक्त की नदियां बही। जब विदेशी आक्रांताओ ने शांति व्यवस्था करने और इस महान भारतवर्ष का हिस्सा बनने के लिए प्रयास किये तो धर्मसत्ता पुनः स्थापित हुई।

शिक्षा पर अंग्रेजों का असर

तत्पश्चात अंग्रेज भारतवर्ष में दाखिल हुए। ये मूलतः व्यापारी थे और इनका प्राथमिक उद्देश्य अधिकाधिक लाभार्जन करना था। इन्होंने व्यापार की अधिकतम सफलता हेतु ही हमारी राज्य व्यवस्था को काबिज़ किया। राज्यसत्ता पर काबिज़ होने के पश्चात भी जब इनके मनमाफिक मुनाफा इन्हें

प्राप्त होता नहीं दिखा तो उन्होंने लाभार्जन को अधिकतम करने हेतु हमारी सामजिक व्यवस्था पर नियंत्रण करना आरम्भ किया।

अंग्रेजो ने शिक्षा पर प्रहार कर हमारी सामजिक बुनियाद हिला दी। हमारी ज्ञानसत्ता जो की धर्मसत्ता के आधीन थी, उसे अर्थसत्ता के आधीन कर दिया। सत्ता का क्रम उल्टा हो गया। धर्म से ज्ञान, ज्ञान से राज्य और राज्य से अर्थ सत्ता संचालन का चक्र टूट गया। अब अर्थसत्ता प्रमुख सत्ता बन गयी। अर्थसत्ता के अनुसार राज्य सत्ता और राज्य सत्ता के अनुरूप ज्ञान सत्ता कार्य करने लगी। धर्मसत्ता को दरकिनार कर दिया गया।

आज हमें यदि शिक्षा का भारतीयकरण करना हैं तो धर्मसत्ता को पुनः प्रतिष्टिथ करना होगा। हम जितना अधिक धर्मसत्ता की स्थापना करेंगे उतना अधिक शिक्षा का भारतीयकरण होगा।यह आनुपातिक होगा।

शिक्षा व्यवस्था किसका दायित्व?

धर्मसत्ता को स्थापित कोन करे? यह किसका दायित्व हैं? इसका सीधा सादा उत्तर हैं कि यह गुरुत्तर दायित्व शिक्षक का हैं। शिक्षक से भी अधिक आचार्य का हैं। आचार्य से भी अधिक गुरु का हैं। हमें यह भी तय करना होगा कि हमारे राष्ट्र में शिक्षक का रूपांतरण गुरु पद में हो जाए। शीघ्रतिशीघ्र हो जाय। गुरु सर्वोत्तम पद हैं और हमारी भारतीय व्यवस्था में उच्च पद के साथ दायित्व जुड़ता हैं। ये हमारा दायित्व हैं कि हम एक शिक्षक के रूपए हमारी क्रमोन्नति गुरु रूप में कर धर्मसत्ता की स्थापना करे।

आइये। हम धर्मसत्ता की स्थापना कर सम्पूर्ण व्यवस्था का भारतीयकरण करे, विशेष रूप से शिक्षा का। वो भी आज, अभी। क्योकि कल आने तक विलम्ब होगा।

(इंदुमती काटदरे से वार्ता)