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| On 3 years ago

श्रेष्ठ समाज की अवधारणा।

श्रेष्ठ समाज की अवधारणा।

विश्व मे पिछड़ता भारत-

विश्व के 154 राष्ट्रों में जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, अवसर, शिक्षा इत्यादि आधारों पर हैप्पीनेस का आकलन किया गया। विश्व के सबसे सुखी राष्ट्रों में फिनलैंड एक नम्बर पर रहा। बहुत गम्भीर विषय है कि भारत का 133वा नम्बर है। हैप्पीनेस इंडेक्स में हमसे पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल इत्यादि एशियाई देश बहुत आगे है।

खुशियाँ कैसे लाये-

खुशियाँ किसी जादू के जोर से अथवा लोक-लुभावन नारों से नही आ सकती। हम विकास के समस्त बिंदुओं पर कार्य कर सकते है लेकिन सबसे पहले हमें एक श्रेष्ठ समाज की अवधारणा को समझना पड़ेगा व निर्माण हेतु प्रयास करना पड़ेगा।

व्यक्ति, परिवार व समाज अन्तरसम्बन्धित-

व्यक्ति, परिवार व समाज अन्तरसम्बन्धित इकाइयाँ है एवम् इनमे अन्तरक्रियाओं का सतत संचालन जारी रहता हैं। इनके व्यक्तिगत व सामूहिक रूप

से परीक्षण करने पर लगभग समान परिणामों की प्राप्ति होती हैं। इनके पृथक पृथक लंबवत उन्नयन से भी सामूहिक वर्टिकल उन्नयन की प्राप्ति सम्भव हैं।

समग्र आकलन सम्भव-

यह भी सत्य है कि पृथक इकाइयों के व्यवहार से उनके सामूहिक परिणाम की गणना कठिन है तथापि " अन्य तथ्य समान रहने पर" समग्र आकलन सम्भव प्रतीत होता हैं। विषय के विकास में हम यह अवधारणा स्थापित कर अग्रसर है कि व्यक्तिगत विकास ही समुह का विकास हैं।

व्यक्तित्व निर्माण में सबकी भूमिका-

एक समग्र विकसित सामाजिक परिदृश्य के मुल में श्रेष्ठ व्यक्तित्व निर्माण परमावश्यक हैं। व्यक्तित्व निर्माण हेतु परिवार, विद्यालय, सामाजिक परिवेश, शासन एवम् मीडिया अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं।

परिवार प्रारंभिक इकाई-

परिवार एक संस्था के रूप में बेहद शक्तिशाली, अत्यंत महत्वपूर्ण, अपार प्रेममय एवम् शिक्षा का प्रथम केंद्र हैं। परिवार की शिक्षा ने पितामह भीष्म, छत्रपति शिवाजी, महावीर कर्ण, महाराणा प्रताप समान कालजयी व्यक्तित्वों का निर्माण किया। परिवार में माता को ममता, पिता को क्षमता एवम् अन्य सदस्यों को सोहार्द से शिशु का पालन सुनिश्चित करते हुए त्याग, मुल्य रक्षा, परम्परा संवर्धन, संयम, एकता, स्वाभिमान सरीखे गुणों का विकास करते हुए उसे कठोरतम परिस्थितियों में जीवनयापन की योग्यता प्रदान करनी चाहिए।

शिक्षा केन्द्र ही आधार-

किसी भी समृद्ध समाज का आधार

उसके शिक्षा केंद्र, पहचान उसकी उसकी शिक्षा प्रणाली एवम् संवाहक उसके शिक्षक होते हैं। गुरु-शिष्य परम्परा के श्रेष्टतम उदाहरण द्रोण-अर्जुन, चाणक्य-चन्द्रगुप्त है। आक्रांताओ ने सामाजिक संरचना को नेस्तनाबूद करने हेतु ही नालंदा एवम् तक्षशीला के विश्वविद्यालयो, तिब्बत के मठों एवम् ग्रामीण भारत की पोशालो को नष्ट किया। शिक्षा केन्द्रो से अपेक्षा की जाती है कि वे योग्यतम भावी पीढ़ी का निर्माण करे। वर्तमान संदर्भो में हमारे राष्ट्र को अनुशासित, वैज्ञानिक द्रष्टीकोण से युक्त, रचनात्मकता से परिपूर्ण, शारीरिक दमखम वाली एवम् सदाशयता से परिपूर्ण युवा पीढ़ी की आवश्यकता है।

अनेकता में एकता-

प्रत्येक समाज में विभिन्नताओं का समावेश लाज़िमी है तथा हमारे राष्ट्र की प्रमुख विशेषता ही " विभिन्नता में एकता" है ! अनेक सदियो से यहाँ विभिन्न विचारधाराएँ सहपल्लवित हो रही है। भारतवर्ष में नस्ल, जाति, रंग, लिंग व भाषा की विभिन्नता इसका अवरोध नहीं अपितु इसके विकास का अवलंबन है। समाज के प्रमुख एवम् नेतृत्व प्रदान करने वाले दलों का उत्तरदायित्व है कि वे तत्कालीन लाभ की अपेक्षा राष्ट्र हितार्थ दीर्घकालीन लाभों को अधिमान प्रदान करे व सीमांत व्यक्ति तक के हितों की रक्षा हेतु सजग व प्रयासशील रहे।

लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ-

शासन की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था के लिए लोकतंत्र सर्वमान्य है एवम् हम इसी व्यवस्था में जी रहे हैं। कुछ खामियों के बावजूद इस

श्रेष्ठतम व्यवस्था में मानव जीवन सुरक्षित एवम् सरंक्षित रहता है। शासन को सर्वहारा एवम् सीमांत वर्ग के विकास हेतु सदैव प्रयासशील रहना चाहिए परन्तु योग्यता, कुशलता एवम् विविधता को उचित स्थान व सम्मान सदैव प्रदान करना चाहिए।

मीडिया आज लोकतंत्र का चौथा खम्भा-

प्राचीन युग में शासक लोकमत के आधार पर निर्णयन प्रक्रिया पूर्ण करते थे एवम् वर्तमान युग में मीडिया लोकमत निर्माण में अत्यंत व्यापक भूमिका निर्वाह कर रहा हैं। मीडिया ने स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाई थी। आज भी मीडिया अत्यंत सम्मानित एवम् लोकतंत्र के चौथे खम्भे के रूप में प्रतिष्टित हैं। मिडिया को अपनी भूमिका के प्रति संवेदनशील रहकर सकारात्मक माहोल की स्थापना कर समाज, संस्कृति, पर्यावरण एवम् सभ्यता के प्रति जिम्मेदार रहना अपेक्षित हैं।

सामूहिक प्रयास ही समृद्ध विकास का आधार हैं।
सादर,