स्कूल | स्कूल शब्द के उच्चारण से ही पवित्र भाव की अनुभूति होती है।

20220816 220142 | Shivira Hindi News

भारत की आत्मा गाँवो में बसती है तथा गाँव की आत्मा मंदिर व स्कूल में बसती है। प्रत्येक ग्राम, कस्बे, शहर इत्यादि में अनेक राजकीय व निजी स्थान होते है लेकिन जब हम ग्राम की स्कूल में प्रवेश करते है तो एक विशेष अनुभूति होती है। जब भी हम किसी विद्यालय में प्रवेश करते है तो सहज ही समझ मे आ जाता है कि हम स्कूल, विद्यालय को ” सरस्वती माता का मंदिर ” क्यो कहते है?

पवित्रता का आभास

किसी भी स्कूल में उपलब्ध मानवीय उपस्थिति में सर्वाधिक सँख्या छोटे-छोटे विद्यार्थियों की होती है। कम आयु के इन विद्यार्थियों का मानस बहुत पवित्र होता है। उनमें किसी प्रकार का स्वार्थ, लालच, निजी मत, निजी वाद नही होता है अतः वे पूर्णतया पवित्र भाव से जीवन जी रहे होते है। जब किसी स्थान पर पवित्र मानवीय उपस्थिति अधिक होती है तो उस स्थान पर हमको पवित्रता का स्वाभाविक रूप से एक अहसास होने लगता है।

ध्यान का केन्द्रीयकरण होने से वातावरण में शुद्धता

विद्यालय में विद्यार्थी कक्षाओं में एकत्र होकर विद्योपार्जन करते है। जब विद्यार्थी विद्या ग्रहण कर रहे होते है तो उनका पूरा ध्यान पाठ्य विषय पर होता है। ध्यान का केन्द्रीयकरण एक प्रकार की पूजा है। हम देखते है कि किसी भी धार्मिक स्थल पर ” ध्यान ” सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। ध्यान में मगन होकर ही व्यक्ति को प्रभु की उपस्तिथि का अहसास होता है।

कोई व्यक्ति जब किसी कार्य मे तल्लीन हो जाता है तथा ध्यानमग्न अवस्था मे पहुँच जाता है तब समय की मर्यादा नही रहती है। मनुष्य प्रकति के साथ एकाकार होने लगता है। जब मनुष्य का ध्यान परिवेश से हटकर उद्देश्य ओर केंद्रित हो जाता है तब वह समय के सर्वश्रेष्ठ दौर में होता है। विद्यार्थियों के विद्या प्राप्ति की अवस्था मे जब एक साथ अनेक विद्यार्थियों के ध्यान का केन्द्रीयकरण हो जाता है तो सम्पूर्ण वातावरण में एक विशिष्ट तारतम्यता उतपन्न हो जाती है इसी तारतम्यता के कारण विद्यालय के वातावरण में उतपन्न सकारात्मक कारकों से वातावरण में शुद्धता की अनुभूति होती है।

स्वार्थ रहित सहज ह्रदय रचते है स्वर्गिक स्तिथि

विद्यार्थियों में यह प्रवृत्ति होती है कि वे अपनी हर वस्तु को अपने मित्रों में शेयर करते है। अपने हर विचार को साँझा करते है। एक दूसरे की ह्रदय से मदद करते है। वे साथ बैठ कर भोजन करते है। अपने टिफिन में अपनी पसंद के भोजन को भी अपने मित्रों के साथ प्रेमभाव से शेयर करते है। इन प्रक्रियाओं में किसी प्रकार का स्वार्थ भाव नही होता बल्कि किये गए स्वतः त्याग में भी उन्हें आनन्द की अलौकिक अनुभूति होती है।

सामुहिक गतिविधियों से प्राप्त सहजता देती है निरपेक्ष जीवन

प्राचीन गर्न्थो में ” सत्संग ” का विशेष महत्व है। इसी प्रकार जब विद्यार्थियों द्वारा जब सामुहिक रूप से पठन, पाठन व उच्चारण इत्यादि द्वारा ” सामुहिक पाठ, अध्ययन, वाचन, वादन” इत्यादि क्रियाए की जाती है तब व्यक्तिगत के स्थान पर सामुहिक भाव उतपन्न होता बे। एक व्यक्ति जितना अधिक सामुहिक क्रियाओं में सलग्न होता है उतना ही अधिक उसमे सहजता का विकास होता है। जब किसी स्कूल में अधिकतम सहज गतिविधियों का आयोजन होता है तो विद्यार्थियों में निरपेक्षता का भाव विकसित होता है। निरपेक्षता की स्तिथि में ही पवित्रता का उदय होता है।

निश्चल हँसी, विनोद व आंनद का स्थान है हर स्कूल

स्कूल एक ऐसा स्थान होता है जहाँ पर दो कालांशो के मध्य, खेल मैदान पर, एक्टिविटी के दौरान, प्रार्थना सभा हेतु आते जाते, मध्यान्तर व अनेक स्थानों पर सामुहिक निश्चल हँसी के फव्वारे उपलब्ध होते है। छोटी आयु के विद्यार्थियों के अपने मजाक होते है। वे सकारण भी हँसते है व अकारण भी हँसते है। आपको इस हँसी में कोई बनावट, कोई मतलब, किसी उपहास, किसी गूढ़ार्थ का कभी अहसास नही होगा।

ज्ञानीजन कहते है कि ” आनंदित व प्रसन्न रहना भी एक प्रकार से भगवान की पूजा करना है। ” आप ही बताइए कि बच्चों से भला ज्यादा आनंदित इस भवसागर में कौन दूसरा है? ऐसे पवित्र आनंदित स्थान अर्थात स्कूल को हम मंदिर कहते है।

एक निवेदन

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