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| On 2 years ago

An absolute prayer for nothing in front of God.

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एक निष्काम प्रार्थना।

सबका साथ, सबके साथ।

आनंद ही वास्तविक जीवन है एवम बचपन ही वह अवस्था है जिसमे सच्चा आनंद प्राप्त होता है क्योंकि निर्लिप्तता, निष्कामता व निरुदेश्यता वह अवस्था है जो सन्तो के अलावा एक छोटे बच्चे को ही सुलभ हो सकती है।

आज के आधुनिक युग में जब सांसारिक मृगतृष्णा में उलझा मानव स्वयम के लिए भी दो-चार पल नही निकाल सकता तो किस प्रकार वह रिश्तों को सहजने व समाज के हितार्थ समय निकालेगा?

आज वह सामाजिक गतिविधियों में सलग्न होता भी है तो बहुत से निजी एजेंडो को साथ मे लेकर चलता है।वक्त के साथ दौड़ते-दौड़ते जब कदम थक जाते है व उसे जीवन की निस्सारता का ज्ञान होने लगता है तब तलक बहुत देर हो चुकी होती है व उस कदरन थकी हुई शख्सियत को दुनिया हाशिये पर डाल देती है।

अनेक सोशल इंजीनियर अब मानने लगे है कि सच्चे, सामाजिक व दूसरों का हित देखने वाले लोग वृद्धावस्था में बड़े परेशान रहते है क्योंकि दूसरों की मदद में वह अपने अधिकतम संसाधनों का विनियोग करके उस रीते कुँए जैसे हो जाते है जहाँ ना तो कोई पानी भरने आते है ना ही पूजा करने , कुछ शरारती बच्चे अवश्य उसमे मुहँ डालकर अपनी आवाज की प्रतिध्वनि सुनबकर अवश्य आनंदित होते है।

एक पूर्व आलेख में लेखक ने निवेदन भी किया था कि यदि आप जीवन मे आनंदोत्सव कायम रखना चाहते है अपने दिल के भीतर "एक छोटे बच्चे" को सदैव जीवंत रखे। अपने दिल मे बसे छोटे से बच्चे की आवाज को दुनियावी ज्ञान के भार से कुचले नही।

जिस प्रकार एक बच्चा अपनी प्रार्थना में कुछ भी नही मांगता बस हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। बिना किसी आग्रह, पूर्वाग्रह व दुराग्रह के एवम अपनी माँग पर कोई इसरार नही करता। अपना सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ कर जीवन जीता है। ऐसी प्रार्थना हमे भी मिल सकती है।
बस प्रयास चाहिए वह भी थोड़ा सा।
सादर।
सुरेन्द्र सिंह चौहान।