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एक अंग्रेजी ब्रांडेड "प्री प्राइमरी-स्कुल" बनाम हमारी देशी स्कुल यानी "पोशाल"।

एक अंग्रेजी ब्रांडेड "प्री प्राइमरी-स्कुल" बनाम हमारी देशी स्कुल यानी "पोशाल"।

कभी कभी दिमाग का दही हो जाता है जब हम एक ब्रांडेड प्राइमरी स्कूल के ब्रोशर व उसके ऑफिस से जानकारी प्राप्त करते है तो निम्नानुसार किस्म के जुमले सुनने को मिलते है। इन जुमलो के आधार पर वे अपनी हाई फीस को जस्टीफाइड भी करते है।
1. शानदार एसी रुम।
2. चित्रित दीवारे।
3. बहुरंगी फर्नीचर।
4. क्लोज्ड सर्किट टीवी।
5. ब्रेकफास्ट, लंच।
6. चटक रँगी गणवेश।
7. लग्जरी ऑफिस।
8. इलेक्ट्रॉनिक गेम्स।

9. सुपर कवर्ड टिफिन।
10. वेल ड्रेसड पियोन।
11. रंगीन पाठ्यपुस्तकें।
12. कोस्टली स्कुल बैग।
13. शानदार स्कुल वैन।
14. लशग्रीन गार्डन।
15. डेकोरेटेड बाथरूम।
16. टेबलेट बेस बुक्स।
17. योगा टीचर्स।
18. पीटीआई।
19. क्लीन कैम्पस।
20. टॉयज एन्ड गेम्स।
21. रेगुलर पीटीएम।
22. ऑनलाइन एडमिशन एंड सपोर्ट।
23. वेरियस एक्टिविटीज।
24. म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स।
25. सेल्फ डिफेंस प्रेक्टिस।
26. इनडोर गेम्स।
27. आउटसाइड पिक्निक्स।
28. साइंस एक्सपेरिमेंट्स।
29. एन्वायरमेंट अवेर्नेस।
30. लेस टीचर स्टूडेंट रेश्यो।
31. फ्लेक्सी कॅरिकुलम।
32. फोक कल्चर।
33. वेरियस सेरेमनी।
34. एक्सचेंज
टूर्स।
35. पेट एंड वाइल्ड लाइफ लव।
36. प्रेयर्स।
37. सांग एंड म्यूज़िक।
38. टीचर्स ट्रेनिंग्स एंड वर्कशॉप।
39. चाइल्ड फ्रेंडली एन्वॉयरमेंट।
40. इंग्लिश कंवेरसेशन।
41. प्रोजेक्ट बेस वर्क कल्चर।
42. हैंड्स क्राफ्ट्स।

उपरोक्त के अलावा वगैरा वगैराह। अब मैं आपको बतलाता है हमारे बचपन की पोशाल का जलवा। एक दस गुना अठरा का कमरा, नीचे पथरीला फर्श ऊपर गर्म अर्श। इस साइज़ में तकरीबन जमा पचास बच्चे। नो पंखा नो प्रॉपर वेंटिलेशन। फिक्स टाइम होल ईयर। मॉर्निंग में आठ से बारह बजे। बीच में इंटरवेल आधे घण्टे का।
हमारे पास पाटी और जेब में चंद बरते। पोशाल में सिंगल टीचर हमारे "गुरोसा"। उनके दिमाग में कॅरिकुलम, उनके दिल में मुहब्बत, उनके जिगर में जज्बा और उनके हाथ में "डंडा"। आज के दौर की मल्टीग्रेड व मल्टीलेवल टीचिंग तब भी उनके दिमाग में बिना किसी फॉर्मल ट्रेनिंग के सेट थी। आप उनसे किसी भी बच्चे के किसी भी विषय का जब चाहे परफॉर्मेंस जान सकते थे।
सुबह सुबह वे सबको पढ़ाते, हस्त लेख सुधराते, कंटिनियश अपग्रेडेड क्लास वर्क देते। अलग अलग हिंदी के अलावा, एक साथ सामजिक व अंत में गणित का सामूहिक पाठ। हो सकता है कि शिक्षाविदजन उनके "डंडाराम" पर एतराज रखे लेकिन न्यूनतम लागत पर तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का बेजोड़ उदाहरण वह व्यवस्था थी।
इन पोशालो में तब "नो स्कुल बेग", पर्सनल अटेंशन, एक्टिविटी, ग्रुप लर्निंग, एक पढ़ाये एक, ऑन स्पॉट सोल्युएशन, मिनिमम कोस्ट और स्टूडेंट्स सेफ्टी बिना किसी औपचारिक आदेश के शुमार थी।
अगले किसी आलेख में हम शिक्षा के लागत पक्ष पर भी चर्चा करेंगे। लागत पक्ष और उसके रिटर्न पर ।
सादर।