Anthropology of Religion: Pseudo Rituals are real damage to any religion.

Anthropology of Religion: Pseudo Rituals are real damage to any religion.

धर्म का मानव विज्ञान: झूठे रीति-रिवाज ही धर्म हेतु सबसे बड़ा खतरा है।

पाखण्ड की कसौटी पर धर्म को तौलने का प्रयत्न ही कुचेष्टा है।

धर्म: करता है प्रकाशमान

ईश्वर महान है व मनुष्यों ने श्रेष्ठ समाज निर्माण हेतु धर्म का निर्धारण किया है। धर्म को अनगिनत तपस्वियों व मनस्वियों ने परिभाषित किया है। प्रत्येक धर्म के मूल में तत्कालीक परिस्थितियों के अनुरूप आचरण, व्यवस्था व व्यवहार निर्धारित किये गए है।

धर्म धारित करने वाले को प्रकाशमान करता है, ऊर्जावान करता है एवम सुखद/सार्थक/समृद्धशाली जीवन प्रदान करता है । धर्म के द्वारा ही समाज हेतु निर्धारित व्यवस्था क्रमशः अनुशासन का स्वरूप धारण करती है एवम समाज स्वानुशासित होकर सनातन स्वरूप को प्राप्त होता है।

अतिरेक भाव उतपन्न करता है अव्यवस्था।

मानव में जब अतिरेक का भाव विकसित होने लगता है तब वह व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास आरम्भ करता है एवम सामाजिक कठोरता नही होने पर व्यवस्था भंग करने का तथा स्वयम के अनुसार परिभाषित करने का कुचक्र आरम्भ हो जाता है।

अतिरंजनापूर्ण व्यवहार पाखंड का जनक है।

धर्म को अतिरंजित करने एवम स्वयम की परिभाषाओं के प्रति कठोर अनुग्रह रख कर श्रेष्ठी समाज नए मानदंड स्थापित करने लगता है एवम सत्ताभोगी अनुचर वृहद स्तर पर अनुपालना सुनिश्चित करते हुए पाखंडों की श्रंखला निर्मित करने लगते है।

यह पाखंड धर्म के मूल सिद्धांतों व भावना से किसी भी स्वरूप में स्वीकार्य नही है। इन पाखंडों ने स्वयम धर्म को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। आज धर्म से किसी भी विचारक अथवा सुधारक को कोई एतराज नही है बल्कि उनके प्रश्न तो पाखंडों से है।

पाखंड की आड़ में मनुष्यता का हनन।

इन पाखंडों ने अनावश्यक व्यय सामान्य व्यक्ति पर डाल दिये है एवम इन पाखंडों की आड़ में ही अनेक दुष्टजन कपितय रूप से फल-फूल रहे है। तत्कालीक मौद्रिक लाभ ने इनकी आंखों पर काली पट्टी बांध रखी है।

मूल धर्म मे सिद्धान्त रूप में बहुत ही कम गतिविधियों अथवा क्रियाओं का विवरण होता है जिसकी अनुपालना बहुत सरल, धर्मोक्त व हितकारी होती है। इन गतिविधियों/क्रियाओं की अनुपालना से मनुष्य जीवन पूर्णता की तरफ अग्रसर होता है।

पाखंडों पर रोक एक सामाजिक आवश्यकता।

व्यवसाय व व्यवस्था द्वारा इन धार्मिक गतिविधियों का दूषित विरूपण करके इन्हें मौद्रिक व व्यापारिक बना दिया है जिसके परिणामस्वरूप धर्मावलंबियों को बहुत व्यय करना पड़ता है एवम निरन्तर अपव्यय के कारण उनमें निरपेक्ष भाव जागृत होने लगता है जो कि अंततः नकारात्मक भाव जागृत कर देता है।
आज यह परमावश्यक है कि समस्त धर्माचार्य इस विषय को गम्भीरता से लेकर धर्म संसद, परिषद एवम उचित मंच पर उठाकर इन पाखंडी क्रियाओं पर कठोर निषेध स्थापित करें।

पाखंड उन्मूलन में सबकी अहम भूमिका।

एक साधारण नागरिक से भी अपेक्षित है कि वह मौलिक धार्मिक प्रतिबद्धता एवम सामाजिक दिखावों में घुली बारीक सीमा रेखा को पहचान करकर स्वयं को लोकमत व सामाजिक प्रतिष्ठा से निर्लिप्त रहकर पाखंडों का परित्याग सुनिश्चित करे।

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