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क्या आप एक शिक्षक हैं ? जरूर पढ़िए | Are you a teacher ? Must Read

क्या आप एक शिक्षक है ? Are you a teacher ? अगर आपका उत्तर है कि " हाँ " तो इस आलेख को बार-बार पढ़ना चाहिए क्योंकि इस आलेख में हम एक शिक्षक यानी अध्यापक के पेशे से सम्बंधित कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्यों को आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है। आइये, जानते है कि शिक्षा आयोग शिक्षक अर्थात अध्यापक के बारे में क्या कहता है ?

"इसमें सन्देह नहीं की शिक्षा के स्तर और राष्ट्रीय विकास में शिक्षा योगदान को जितनो भी बातें प्रभावित करती हैं उनमें शिक्षकों के गुण, क्षमता और चरित्र सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।

शिक्षा आयोग

शिक्षक | Teacher

प्राचीन काल से ही विद्यालय में अध्यापक का महत्व प्रत्यधिक रहा है । अध्यापक राष्ट्रनिर्माता एवं प्रगामी पीढ़ियों तथा भावी नागरिकों का निर्माता माना जाता है। राजा से लेकर साधारण नागरिक तक सभी व्यक्ति इनका आदर करते थे प्राचीन गुरुकुलों के स्थान पर अब विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में छात्रों को अध्यापकों द्वारा शिक्षा प्रदान की जाती है।

इस प्रकार विद्यालय में अध्यापक का महत्व बहुत अधिक होता है। विद्यालय की उन्नति अवनति भले ही प्रधानाध्यापक पर निर्भर हो परन्तु इसका वास्तविक आधार विद्यालय के अध्यापक होते हैं। अध्यापक के ही उत्तरदायित्व एवं कर्त्तव्य ऐसे है जिनकी पूर्ति होने पर ही विद्यालय का कार्यक्रम उचित प्रकार से चल सकता है।

एक शिक्षक। Www.shivira.com

अध्यापकों का कर्तव्य न तो विद्यालय भवन के स्थान तक और न कक्षाओं में पढ़ाने के लिए विद्यालय खुला है, उस समय तक ही सीमित है। अध्यापक को कर्तव्य पालन के लिए उसे प्रत्येक समय समस्त स्थानों पर समस्त आज्ञाओ को जो संस्था प्रध द्वारा दो जाती है. माननी होगी। जो कार्य विद्यालय से संबंधित न हो. उनके द्वारा नहीं कराया जा सकता। विद्यालय के लिए चन्दा या दान प्राप्त करने के हेतु अध्यापको का साथ लेने के लिए उनको बाध्य नहीं किया जा सकता। स्वेच्छा से अध्यापक इस कार्य में सहयोग प्रदान कर सकते हैं।

किसी भी विद्यालय की प्रसिद्धि में वहाँ के अध्यापको की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। वह छात्रों को शिक्षा देसे वाला अध्यापक ही नहीं अपितु वह छात्रो का मित्र पथ-प्रदर्शक व शुभ चिन्तक भी होता है। विद्यालय का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व भले ही प्रधानाध्यापक का हो एवं विद्यालय की प्रसिद्धि भले ही प्रधानाध्यापक के कारण प्रकी जातो हो किन्तु वास्तव में अध्यापको की भूमिका को अनदेखी नहीं किया जा सकता ।

विद्यालय में अध्यापक का कार्य केवल पुस्तकीय ज्ञान ही प्रदान करना नहीं होता हैऋषितु छात्रों का सर्वागीण विकास करना एवं योग्य नागरिक बनाना है । अध्यापक का प्रभाव छात्रों पर निश्चित रूप से देखा जा सकता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से छात्र अध्यापक से सीखता है। विद्यालय में अलग अलग विषय के अलग अलग अध्यापक होते है। उनकी योग्यता अनुभव क्षमता, विचारों एवं कार्य पद्धति में भिन्नता होती हैं। उनकी रूचियो में भी भिन्नता होती हैं एवं उनका एक अलग दर्शन होता हैं । इन सभी भिन्नताओ के होते हुए सभी अध्यापको में कुछ गुण समान भी होते हैं। एक सफल अध्यापक में कुछ विशेष गुण एवं योग्यताएं होती है जो निम्न हैः

शिक्षक एक अच्छा व्यक्ति होना चाहिए | Teacher must be a good person

एक सफल अध्यापक बनने के लिये यह आवश्यक है कि वह पहले एक अच्छा व्यक्ति हो । एक अच्छे व्यक्ति में जो गुण होने चाहिये वे गुण एक सफल अध्यापक में भी होना अपेक्षित है। एक अच्छे व्यक्ति के अपेक्षित मुख्य गुण निम्न है: -

  • उच्च चरित्र
  • आत्म नियन्त्रण
  • सहयोग की भावना
  • दूरदर्शिता
  • धैर्यवान
  • आशावादी
  • आत्म सम्मान
  • प्रजातान्त्रिक भावना में विश्वास रखने वाला
  • समय की पाबन्दी
  • बुद्धिमान
  • रचनात्मक दृष्टिकोण
  • संकीर्णता की भावना नहीं होना
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शिक्षक विषय का ज्ञाता होना चाहिए | The teacher should be knowledgeable of the subject

सफल अध्यापक के लिये अपने से सम्बन्धित विषय का ज्ञाता होना आवश्यक है । अध्यापक का मुख्य कार्य अपने विषय का शिक्षण कराना ही होता है एवं यदि वह अपने विषय का ज्ञाता नहीं है तो वह सफल अध्यापक नहीं बन सकता । विषय का पूर्ण ज्ञान न होने पर वह छात्रों का विश्वास प्राप्त नहीं कर सकता एवं सहयोगी अध्यापकों एवं प्रधानाध्यापक की दृष्टि में भी उसकी साख अच्छी नहीं होगी। विद्यालय में वह अपना अच्छा स्थान नहीं बना सकेगा । अतः आवश्यक है कि सफल अध्यापक को विषय का पूर्ण ज्ञाता होना चाहिये ।

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कई बार पाठ्यक्रम में परिवर्तन हो जाने से अध्यापकों को कुछ असुविधा हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में अध्यापक के लिये यह आवश्यक है कि नय पाठ्यक्रम के अनुसार अधिक समय अध्ययन के लिये देकर उस विषय की पूर्ण तैयारी करें एवं प विषय

का ज्ञाता बने रहना चाहिये। इसके लिये उसे पहले की तुलना में कुछ अतिरिक्त समय तो देना ही होगा। किन्तु इससे विषय पर पूर्ण तैयारी करे अपने विषय । का ज्ञात बने रहना चाहिये । इससे विषय पर पूर्ण नियन्त्रण हो जाता है। इसके अतिरिक्त अध्यापक को अपने ज्ञान में वृद्धि करने के लिए निरन्तर अध्ययन से जुड़ा रहना चाहिये । उसे हमेशा अपने अनुभवों एवं ज्ञान में वृद्धि करते रहना चाहिये ।

शिक्षक शिक्षण कला का ज्ञाता होना चाहिये | The teacher should know the art of teaching

अध्यापक के लिये विषय का ज्ञाता बनना तो आवश्यक है ही किन्तु इसके साथ उसे शिक्षण कला का ज्ञाता भो होना चाहिये। अध्यापक को विभिन्न शिक्षण कलाओं का पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिये एव विद्यालय के छात्रों के स्तर, क्षमता, आदतों एव रूचियों के आधार पर उचित शिक्षण कला से सम्बन्धित विषयका शिक्षण कराना चाहिये। अलग अलग कक्षाओं एवं विषय के लिये कुछ भिन्नताएं भी हो सकती है। को को छात्रों से स्नेह करना चाहिये। उन्हें शिक्षण की रोचक बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये । जिससे छात्र पढ़ने में अधिक रूचि ले सके। प्रयत्न यह होना चाहिये कि जो शिक्षण कक्षा में कराया जाता है वह छात्रों को याद भी हो । दूसरे दिन शिक्षण कराते समय पहले दिन कराये गये शिक्षण के सम्बन्ध में छात्रों से कक्षा में प्रश्न करने चाहिये। इसके अतिरिक्त शिक्षण के दौरान पुस्तकीय उदाहरण के साथ साथ इस प्रकार के उदाहरण देने चाहिये जो कि सदैव उनके दैनिक जीवन में देखने को मिल सकते हैं। चार्ट, नक्शे श्रादि सहायक सामग्री का समय समय पर उपयोग किया जाना चाहिये। आवश्यक हो तो कक्षा-कक्ष के बाहर फैक्ट्री, उद्योग, बैंक अथवा ऐसे सम्बन्धित स्थानों पर ले जा कर विषय को अधिक रूचिकर बनाया जा सकता है।

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कई बार एक विद्यालय में एक ही विषय के दो या इससे अधिक अध्यापक होते है किसी एक अध्यापक के शिक्षण से छात्र अधिक सन्तुष्ट होते हैं। ऐसी स्थिति में उस विषय के अन्य अध्यापक को यह विचार करना चाहिये कि ऐसा क्यों हो रहा है। सभी कारणों से अवगत हो कर उसे अपने में आवश्यक सुधार कर अधिक प्रभावी शिक्षण प्रदान करना चाहिये । नव नियुक्त अध्यापकों से प्रायः छात्र पूर्ण सन्तुष्ट नहीं होते हैं । अतः नये अध्यापकों के लिये यह आवश्यक है कि विषय का ज्ञाता एव शिक्षण कलाओं का ज्ञाता होने के पश्चात् भी उसे यह देखना चाहिये कि उस विद्यालय के छात्रो का स्तर क्या है, अन्य अध्यापक किस प्रकार शिक्षण करा रहे है व विद्यालय में अन्य सुविधाएँ आदि की स्थिति क्या है। इन सभी तथ्यों पर पूर्ण विचार कर अन्य अध्यापको की शिक्षण विधि के अनुसार शिक्षण करते हुए समय-समय पर नये प्रभाव को शामिल कर शिक्षण कार्य कराना चाहिये। उसे विद्यालय में कार्यरत अध्यापकों से सहयोग एवं मार्ग दर्शन प्राप्त करते रहना चाहिये ।

शिक्षक को सहयोग की भावना रखना चाहिए | The teacher should have a sense of cooperation and sympathy

अध्यापक छात्रों को मात्र पढाने वाला अध्यापक ही नहीं अपितु वह उसका सहयोगी व पथ प्रदर्शक भी होता हैं। सहयोग व सहानुभूति की भावना से छात्रों का विश्वास अध्यापको में बनता है एवं इससे अध्यापक के शिक्षण में छात्र अधिक रूचि लेते हैं। यदि किसी कक्षा के छात्रों को यह विश्वास यो जाय कि अध्यापक विशेष उनके प्रति सहयोग व सहानुभूति पूर्वक व्यवहार नहीं रखता है तो अध्यापक की उत्तम शिक्षा भी व्यर्थ सिद्ध हो जाती हैं। अतः अध्यायक का छात्रों के प्रति सहयोग एवं सहानुभूति पूर्वक व्यवहार होना आवश्यक हैं।

सहयोग एवं सहानुभूति पूर्वक व्यवहार का अर्थ छात्रों को सुविधा देने से नहीं है जिसके लिये वह हक (अधिकार नहीं रखते। छात्रों की समस्या को समय समय पर सहयोग व आवश्यक मार्ग दर्शन देने से हैं जिससे छात्र के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन हो सके एवं पढ़ाई की तरह वह पहले की तुलना में अधिक ध्यान दे सके एवं सफलता प्राप्त कर सके ।

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सफल अध्यापक को छात्रों के साथ सहयोग एवं सहानुभूति पूर्वक व्यवहार तो रखना ही चाहिए किन्तु इसके प्रतिरक्त उसे सभी अध्यापको एवं विद्यालय के अन्य स्टॉफ सदस्यों के साथ भी सहयोग एव सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार रखना चाहिए। अपने से वरिष्ठ सहयोगियो से आवश्यक सहयोग एवं मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए। अपने से कनिष्ठ सहयोगियों को आवश्यकतानुसार एवं उचित मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए।

कई बार ऐसा देखने में आता है कि विद्यालय में नव नियुक्त अध्यापक संस्था प्रधान के निर्देशानुसार कार्य करते है किन्तु विद्यालय के कुछ पुराने अध्यापक प्रधानाध्यापक के आदेशानुसार

कार्य नहीं करते है। अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर निर्धारित मानदण्ड व निर्देशो की पालना नहीं करते है व प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सदैव यह प्रयत्न करते है कि अन्य नए एवं पुराने अध्यापक भी उनके इस प्रकार के कार्यों में साथ दे । इस प्रकार की व्यवस्था बनाये रखकर ऐसे अध्यापक सदैव कोई न कोई तर्क के आधार पर अपना प्रभाव बनाये रखने का प्रयास करते हैं। नये अध्यापकों को ऐसी स्थिति में सदैव सहयोगी अध्यापकों का आदर करते हुए संस्था प्रधान के निर्देशों का पालन करते रहना चाहिये। अन्य अध्यापकों को भी चाहिये कि वह सहयोग व सहानुभूति पूर्वक कार्य करें एवं अपने प्रभाव को रचनात्मक कार्यों को पूर्ण करने एवं विद्यालय विकास की गति को बढ़ाने में लगावें ।

विद्यालय में अध्यापकों अथवा स्टाफ सदस्यों के बीच कभी-कभी किसी कारण से आपसी मतभेद हो जाता है। यदि स्टॉफ के कुछ सदस्यों के बीच आपसी मतभेद हो जाय तो सफल अध्यापक का प्रयास यह होना चाहिये कि कारणों का पता लगाकर तर्कसंगत एवं सही दृष्टिकोण रखकर आपसी मतभेदों को समाप्त कराने अथवा कम कराने में अपना सहयोग प्रदान करें।

शिक्षक में नेतृत्व शक्ति अत्यावश्यक हैं | Leadership power is essential in the teacher

सफल अध्यापक में नेतृत्व शक्ति का होना आवश्यक है । कार्य के दौरान एवं विद्यालय के विभिन्न सह-शैक्षिक कार्यक्रमों एवं आयोजनाओं में अपनी कुशलता का परिचय देने के लिये नेतृत्व शक्ति का भी होना आवश्यक है। अध्यापक को शिक्षण अध्यापक को मूल रूप से छात्रों का नेतृत्व करना होता है। छात्रों का नेतृत्व करने के दौरान विभिन्न छात्रों की योग्यताओं, आदतों, क्षमताओं, स्वास्थ्य, पारिवारिक स्थिति, विद्यालय में उपलब्ध साधन और छात्रों की समस्याओं आदि का भी पूरा ज्ञान होना आवश्यक है ताकि सभी छात्रों को सही नेतृत्व प्रदान कर सके। कई बार कक्षाओं में कुछ छात्र कक्षा शिक्षण में पूरा ध्यान नहीं देते हैं कार्य समय पर करके नहीं लाते हैं या याद करने का कार्य नहीं कर पाते हैं या छात्र कक्षा में रुचि से नहीं बैठ रहे हैं। इस प्रकार की स्थितियों में सभी छात्रों से एक समान व्यवहार करना उचित नहीं। अलग-अलग छात्रों के अलग-अलग कारण हो सकते हैं। एक छात्र इसलिए गृहकार्य पूर्ण नहीं करके ला पाया है क्योंकि घर पर उसकी माँ बीमार है एवं उसे भी देखभाल के लिये पूरा समय देना पड़ता है। दूसरा छात्र भी गृहकार्य करके नहीं ला रहा है क्योंकि उसे खेलों में अधिक रूचि है एव पढ़ाई में कम यही वह स्थितियां है जहां छात्रों को सफल नेतृत्व प्रदान करना होता है । इस प्रकार की स्थिति में सम्बन्धित छात्रों के सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर उचित मार्गदर्शन प्रदान कर सभी छात्रों का सही नेतृत्व करना होता है । छात्रों को सही नेतृत्व प्रदान करने के लिये यह आवश्यक है कि स्वयं अध्यापक को अपना आदर्श व्यवहार रखना चाहिये।

अध्यापक को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिये कि छात्र कोई मशीन नहीं है कि उसे जिस तरह चाहे, उसका संचालन कर सकते हैं। पुस्तकों से, घर-परिवार से, समाज से, अन्य से एवं अध्यापक से सीखता है छात्र अध्यापक जब छात्रों का नेतृत्व करता है तो उसे आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करना होता है। छात्रों को समय पर विद्यालय आने, विद्यालय ड्रेस में आने समय पर अपना लिखित कार्य एवं याद करने का कार्य पूर्ण रखने, अनुशासन में रहने एवं विभिन्न सह-शैक्षिणक कार्यक्रमों में रूचि से कार्य करने के लिये प्रावश्यक निर्देश एवं सुझाव प्रदान करता है। किन्तु यदि अध्यापक स्वयं समय पर विद्यालय नहीं आता है. यदि वह कक्षा अध्यापक है। तो समय पर कक्षा में उपस्थिति नहीं लेता हैं, अपने से सम्बन्धित कालांश में देरी से जाता है, प्रभावी शिक्षण प्रदान नहीं करता है, जांच कार्य के प्रति रूचि नहीं रखता है, अपना कार्य समय पर पूर्ण नहीं करता है, अध्यापकों के बीच आपस में मतभेद एवं झगड़े छात्रों के समक्ष होने लग जाते हैं तो अध्यापक छात्रों को सफल नेतृत्व प्रदान नहीं कर सकेगा । कारण स्पष्ट है। अध्यापक की कथनी और करनी में अन्तर है। वह स्वयं अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह सही प्रकार से नहीं कर रहा है तो वह सही नेतृत्व भी नहीं कर सकेगा। प्रतः सहीं नेतृत्व के लिये आवश्यक है कि अध्यापक का स्यय का एक आदर्श व्यवहार होना चाहिये ।

एक शिक्षक को अवश्य ध्यान रखना चाहिए | A teacher must take care

सफल प्रध्यापक को विद्यालय से सम्बन्धित विशेष कार्यों की पूरी-पूरी जानकारी होनी चाहिये एवं उसे सही प्रकार से पूरा करना चाहिये जो कि मुख्य-मुख्य निम्न हैं :

विद्यालय समय | school hours

सफल अध्यापक को इस बात की पूरी जानकारी होनी चाहिये कि विद्यालय का समय मात्र विद्यालय में प्रार्थना की घन्टी लगने से लेकर छुट्टी की घन्टी तक ही सीमित नहीं होता

है बल्कि विद्यालय के शैक्षिक सह-शैक्षिक एवं भौतिक क्षेत्र के लिये उसे इस समय से प्रतिरिक्त समय भी देना चाहिये। यह अतिरिक्त समय देकर वह विद्यालय के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहा है एवं अपनी ड्यूटी पूरी कर रहा है।

छात्र उपस्थिति | student attendance

कक्षा अध्यापक तो अपनी कक्षा के छात्रों की उपस्थिति का रेकॉर्ड रजिस्टर में रखता ही है किन्तु सफल अध्यापक को यह ध्यान रखना चाहिये कि उसकी कक्षा में कुल कितने छात्र हैं एवं सामान्यतः कितने छात्र कक्षा में उपस्थित रहते हैं। यदि कुछ छात्र अनियमित रहते हैं तो ऐसे छात्रों का रेकॉर्ड रखना चाहिये एवं पूर्ण स्थिति प्रधानाध्यापक के समक्ष रखकर अभिभावकों को भी इसकी पूरी जानकारी देनी चाहिये। मात्र जानकारी देना ही अध्यापक का कार्य नहीं होता है, अध्यापक को अनियमित छात्रों को पहले अलग से बुला कर समझाने का प्रयास करना चाहिये. उसे नियमित रूप से कक्षा में रहने एवं अपने से सम्बन्धित कार्य पूर्ण करने के लिये आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए। यदि फिर भी कोई सुधार न हो तो प्रधानाध्यापक एवं अभिभावकों को वस्तुः स्थिति से अवगत कराना चाहिये।

कक्षा टेस्ट | class test

अध्यापक को अपने से सम्बन्धित कक्षा एवं विषय के छात्रों का टेस्ट लेना चाहिए एव दिए गए अंको को अपनी एक पृथक डायरी में नोट रखना चाहिए जिससे कि अध्यापक समय समय पर विश्लेषण कर छात्रों को आवश्यक मार्ग दर्शन प्रदान कर सकें। इस प्रकार के रेकाड अपने पास रखकर एवं विश्लेषण कर अध्यापक छात्रों के शैक्षिक स्तर को जानकारी रहती है एवं अधिक सुधार लाने के लिए वह विशेष शिक्षण अथवा मार्ग दर्शन छात्रों को प्रदान कर सकता है।

लिखित कार्य की जांच | written work check

माध्यमिक विद्यालयो तक तो प्रायः लिखित कार्य भी किया जाता है एक समय समय पर जांच कार्य भी किया जाता है। सीनियर कक्षाओ में प्राय: ऐसा देखा जाता है कि लिखित कार्य पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है। अध्यापक को लिखित कार्य का समय समय पर जांच करते रहना चाहिए एवं यह भी ध्यान रखना कि कक्षा में कौन 2 से छात्र समय पर जाँच नहीं कराते हैं। ऐसे छात्रों के लिये आवश्यक माग दशन देकर उनसे कार्य पूर्ण कराना चाहिये। लिखित कार्य की जाँच करते समय अध्यापक इस बात पर ध्यान दें कि छात्र लिखित कार्य के साथ याद करने का भी कार्य करते हैं। जांच के पश्चात् अपने हस्ताक्षर के साथ दिनांक भी लगाव ।

स्टॉपगेप की व्यवस्था | stopgap arrangement

विद्यालय में सभी अध्यापकों को कक्षा शिक्षण हेतु निर्धारित कालांशी में जाना होता है। विद्यालय में ऐसी स्थिति अक्सर आती रहती है जब विद्यालय में एक या उससे अधिक अध्यापक अवकाश पर रहते हैं। अध्यापक जब अवकाश पर रहते है तो उन अध्यापकों के कालांशो में अन्य अध्यापकों को उनके कालांशों में भेजा जाता है।। इसी व्यवस्था को स्टॉपगेप व्यवस्था कहते है। इस हेतु एक रजिस्टर रखा जाता है एवं आवश्यकतानुसार व्यवस्था कर अध्यापको को उस दिन अतिरिक्त रूप से किसी कक्षा में जाने के लिए निर्देश दिए जाते हैं । प्राय: अध्यापक इसे समझते हैं। कई अध्यापको का यह कहना होता है कि यह कार्य तो केवल पी.टी.आई. को करना चाहिए अथवा लाईब्रेरी में छात्रों को भेज देना चाहिए या कुछ भी किया जाय किन्तु उन्हें स्टापगेप में नहीं भेजा जाय । स्टापगेप के प्रभारी से सम्पर्क कर कुछ अध्यापक यह भी प्रयास करते हैं कि उनको इस कार्य के लिए कम से कम लगाया जाय। कई बार कुछ अध्यापकों को यह शिकायत रहती है कि उन्हें ही सदैव इस कार्य के लिए लगाया जाता है।

सफल अध्यापक को यह ध्यान होना चाहिये कि विद्यालय की व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्टॉपगेप की व्यवस्था आवश्यक है। स्टॉपगेप की व्यवस्था के अन्तर्गत अध्यापक को उस निर्धारित कक्षा में जाकर उस विषय से सम्बन्धित शिक्षण कार्य करवाना चाहिये अन्यथा छात्रों को नैतिक शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा एवं अन्य उपयोगी बातों की जानकारी देनी चाहिए जिससे विद्यालय एवं कक्षा दोनों को ही व्यवस्था सुचारु रूप से सम्पादित हो सके।

शिक्षक को स्वयम से सम्बन्धित परियोजना का कार्य | Project work related to teacher's self

अध्यापक को अपने से सम्बन्धित परियोजना का कार्य पूर्ण लगन से चाहिए। अध्यापक को इसके लिए अपने सहयोगी अध्यापकों के साथ मिलकर इसे पूरा करना प्रभावपूर्ण तरीके से पूर्ण करने के लिए योजना तैयार करनी चाहिए। योजना के अनुसार ही निर्धारित समय में कार्य पूर्ण करना चाहिए। जैसे उदाहरण के लिए किसी अध्यापक को प्रार्थना सभा की व्यवस्था हेतु परियोजना प्रभारी बनाया जाता है तो उसे अपने सहयोगी अध्यापकों के सहयोग से इस प्रकार प्रभाव पूर्ण तरीके से कार्य करना चाहिए जिससे यह स्पष्ट लगे कि अध्यापक ने अपनी पूर्ण क्षमता एवं लगन से यह कार्य किया हैं। इसके लिए उसे निर्धारित समय

से पूर्व विद्यालय प्रान सकता है। विद्यालय की प्रार्थना सभी को याद कराना, लाइनों में सभी कक्षाएं प्रार्थना स्थल पर आये, प्रार्थना सभा में समाचार आदि की व्यवस्था के लिए आवश्यक कार्यक्रम पूर्व से निर्धारित कराना, छात्रों को प्रार्थना सभा के संचालन के लिए तैयार कराना, धावश्यक सूचनाएं देना एवं प्रार्थना सभा में व्यवस्था के दौरान पूर्ण समय तक छात्रों को अनुशासन में रखना आदि होता हैं। इसके लिए सहयोगी अध्यापक कक्षा अध्यापकों एवं सभो अध्यापकों को भी पूर्ण सहयोग प्रदान करना चाहिए ।

शिक्षक द्वारा स्वयं का मूल्यांकन | Self assessment by the teacher

सफल अध्यापक को अपने द्वारा किए जाने वाले शैक्षिक एवं सह-शैक्षिक कार्य का प्रतिमाह स्वमूल्यांकन करना चाहिये। इसके लिए अध्यापक अपने आप से प्रश्न करें एवं स्वयं ही उत्तर देकर स्वमूल्यांकन कर उसे अपने में आवश्यक सुधार करना चाहिए। स्वमूल्यांकन के कुछ प्रश्न निम्न हो सकते हैं:

  • आप समय पर विद्यालय आते हैं ?
  • आप समय पर अपनी कक्षा में जाते हैं ?
  • आप सदैव पूर्ण तैयारी के साथ प्रभावी शिक्षण कार्य कराते हैं ?
  • आप नियमित रूप से अध्यापक डायरी का उपयोग करते हैं
  • आपने अपनी शैक्षिक एवं सहशैक्षिक योजना समय पर पूर्ण विचार कर प्रस्तुत की हैं?
  • सह शैक्षिक योजना के अनुसार कार्य किया जा रहा हैं?
  • समय समय पर लिखित कार्य की जांच की जाती हैं ?
  • छात्रों में आवश्यक सुधार हो रहा हैं ? यदि नहीं तो इसके लिए आप क्या शैक्षिक कार्य कर रहे हैं ?
  • सभी सहयोगी अध्यापकों के साथ ग्रापके सम्बन्ध कसे हैं?
  • अध्यापकों के बीच श्रापसी मतभेद होने पर आप मतभेदों को दूर करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं
  • प्रधानाध्यापक अथवा प्राचार्य के सुझावों को स्वीकार कर उसी के अनुसार अपने में आवश्यक सुधार करते हैं।
  • प्रधानाध्यापक अथवा प्राचार्य के सुझावों से सहमत न होने पर आप अपना तर्क स्पष्ट कर अपनी बात को प्रधानाध्यापक अथवा प्राचार्य से स्वीकार कराने का प्रयास करते हैं।
  • आप शिक्षा विभाग के निर्धारित नियमों एवं निर्देशों की पालना करते हैं?
  • छात्र, अभिभावकों, समाज एवं उच्च अधिकारियों के प्रति आप अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह कर रहे हैं ?
  • स्वमूल्यांकन कर क्या आप अपने में सुधार करते हैं ?

सारांश | Summary

संक्षेप में कहा जा सकता है कि विद्यालय में अध्यापक का महत्व प्रत्यधिक होता है। विद्यालय की सफलता या असफलता इस पर निर्भर करती हैं कि विद्यालय के अध्यापक कितने योग्य हैं। विद्यालय में योग्य अध्यापक हैं और प्रधानाध्यापक योग्य नहीं हैं तो विद्यालय को बहुत अधिक सफलता तो नहीं मिल सकती किन्तु कुछ सफलता तो मिलती ही हैं। इसके अतिरिक्त यदि विद्यालय में प्रधानाध्यापक बहुत योग्य हैं। किन्तु अध्यापक योग्य नहीं हैं तो प्रधानाध्यापक के द्वारा कितने ही प्रयास करने के पश्चात् भी विद्यालय को सफलता नहीं मिल सकती । विद्यालय में शिक्षा के स्तर में वृद्धि के लिए अध्यापक का महत्व अधिक होता है। अध्यापक के गुण, क्षमता एवं चरित्र से अध्यापक, एक आदर्श अध्यापक की श्रेणी में आ जाता है ।

विद्यालय में छात्रों का विकास करने का कार्य अध्यापक द्वारा किया जाता है। वह छात्रों को शिक्षा देने वाला मात्र अध्यापक ही नहीं होता है, अपितु वह छात्रों का मित्र, पथ-प्रदर्शक एवं शुभ चिन्तक भीं होता हैं। उसे अपने विषय का ज्ञाता, विभिन्न शिक्षण कलाओं का ज्ञान एवं निरन्तर अध्ययन करते रहने के अतिरिक्त उसे प्रजा तान्त्रिक आधार पर छात्रों का नेतृत्व करना होता है अतः उसका आदर्श व्यवहार होना चाहिये। उसे अपने से सम्बन्धित कार्य समय पर पूर्ण रख कर सभी सहयोगी अध्यापकों से सहयोग व सहानुभूति पूर्वक व्यवहार रखकर, प्रधानाध्यापक के आदेशों/ निर्देशों का पालना कर एवं सभी का विश्वास प्राप्त करना चाहिये। अपने कार्यों का स्वमूल्याकन करते हुए अपने में आवश्यक सुधार करते रहना चाहिये