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बद्रीनाथ धाम यात्रा (Badrinath Dham Yatra in Hindi)

बहूनि सन्ति तीर्थानि, दिवि भूमौ रसासु च||
बदरी सदृशं तीर्थ न भूतं न भविष्यति||

महर्षि वेदयास द्वारा लिखित इस श्लोक का अर्थ है कि इस पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल में  बहुत सारे तीर्थ है लेकिन बद्रीनाथ धाम  की समानता करने वाला तीर्थ तीनो लोको में न है और भविष्य में न कभी होगा हिमाचल क्षेत्र में कहावत है की “जो जाये बद्री वो न आये ओदरी” अर्थात जो एक बार भी बदरीनाथ के दर्शन कर लेता है वह वापिस कभी माता के उदर यानी गर्भ में नहीं आता है अर्थात जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है।

बद्रीनाथ धाम यात्रा

यह श्लोक बद्रीनाथ धाम यात्रा की महिमा बताने के लिए अपने आप में सम्पूर्ण है। चार धामों में से एक धाम बद्रीनाथ धाम के बारे में जिसे बद्री विशाल भी कहा जाता है। यह मंदिर भगवान् विष्णु को समर्पित है जहां पर उनकी मूर्ति योगमुद्रा में पाई जाती है जो अपने आप में अद्भुत है। इसके साथ यहाँ पर उद्धव, भू देवी, श्री देवी, नारद, माँ लक्ष्मी, गणेशजी और कुबेरजी की मुर्तिया स्थापित है।

कहां पर स्थित है बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham Kahan Hai) :

भगवान विष्णु का यह प्रसिद्ध धाम उत्तराखंड के हिमालयी गढ़वाल क्षेत्र के बद्रीनाथ शहर में स्थित है जो की समुद्र तल से 10200 फीट की ऊंचाई पर है। जिस पर्वत पर बद्रीनाथ धाम स्तिथ है उसे नर नारायण पर्वत कहते है जो की अलकनंदा नदी के किनारे स्तिथ है। यह धाम चारो ओर से सुन्दर पर्वत की श्रेणियों और अलकनंदा की कल कलाहट सराबोर बहुत ही आकर्षक दिखाई देता है  जो की पर्यटकों को आकर्षित करने में काफी है। 

कब होते है भगवान
बद्रीनाथ के दर्शन ?  

वैसे तो भारत के सभी मंदिर साल भर खुले रहते  है लेकिन बद्रीनाथ भगवान का यह मंदिर केवल 6 महीने ही खुला रहता है। चौकिये नही इसका कारण है वहा पर होने वाली बर्फ़बारी क्योंकि सर्दी के 6 महिनो में इस धाम पर भयानक बर्फ़बारी होती है जिस कारण केवल 6 महीने ही इस मंदिर के कपाट खुले रहते है। बद्रीनाथ मंदिर के कपाट हर वर्ष अक्षय तृतीया को खुलते है और कार्तिक अमावस्या यानि दीपावली को कपाट बंद कर दिए जाते है। इन 6 महीनो में देशभर से श्रद्धालु दर्शन करने के लिये आते है और दर्शन कर पाने आप को धन्य मानते है l 

6 महीने देवता करते है सेवा :

 इस मंदिर में जब सर्दियों में कपाट बंद हो जाते है तब 6 महीने तक भगवान बद्रीनाथ की सेवा देवता करते है। इसका प्रमाण यह है कि जब वापिस 6 महीने बाद कपाट खोले जाते है तो 6 महीने पहले अंदर किया गया दीपक जलता रहता है और वहा पर साफ़ सफाई, ताजे पुष्प मिलते है जो कि अपने किआप में बहुत आशचर्यजनक है। इसलिए ऐसी मान्यता है की भगवान बद्रीनाथ  की सेवा छह महीने मनुष्य और छह महीने देवता करते है।  

कैसे पहुंचें बद्रीनाथ मंदिर (Badrinath Dham Kaise Jaye) :

हर हिन्दू मतावलम्बी की यह इच्छा होती है की वह जीवन में एक बार चार धामों की यात्रा अवश्य करे पहले धाम बद्रीनाथ पहुंचने के लिए आपको ऋषिकेश रेलवे स्‍टेशन पहुंचना होगा जहा से बद्रीनाथ 297 किमी दूर स्थित है। दूसरा हवाई रास्ते से जाने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट जॉली ग्रांट एयरपोर्ट

देहरादून में है जो कि बदरीनाथ से 314 किमी दूर है।  इन दोनों जगहों से बद्रीनाथ आसानी से पहुंचा जा सकता है।

बद्रीनाथ धाम की पौराणिक कथा (Badrinath Dham Story in Hindi) :

पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु से नाराज हो गयी।  इसके बाद माता लक्ष्मी अपने पीहर समुद्र के घर चली गईं इसके बाद भगवान विष्णु भी दुखी होकर नर-नारायण पर्वत के बीच तपस्या करने निकल पड़े। फिर कई सालों बाद देवी लक्ष्मी को अपनी गलती का ज्ञान हुआ, तो वे भगवान विष्णु को ढ़ूंढ़ने के लिए पृथ्वी की और प्रस्थान किया। इन्होंने देखा कि भगवान विष्णु  बर्फ से ढ़के हुए  पर्वतों के बीच बैठे तपस्या कर रहे थे और उन पर बर्फ गिर रही थी। माता लक्ष्मी यह सब देखकर दुखी हुईं और वे बदरी यानी बेर का पेड़ बन गईं और उन पर अपनी शाखाये फैला दी ताकी तप में लीन भगवान विष्णु पर बर्फ ना गिरे। वहीं जब श्री हरि का तप पूरा हुआ तो उन्होंने माता लक्ष्मी को बेर के वृक्ष के रूप में देखा। इससे भगवान विष्णु बहुत खुश हुए और उन्होनें कहा की भविष्य में इस स्थान को बद्रीनाथ धाम से जाना जाएगा। तब से आज तक उस स्थान को बद्रीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है और यही तीर्थ बदरी नारायण या बद्री विशाल के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ आज भी बद्रीनाथ क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में बद्री अर्थ बेर के पेड़ पाए जाते है। 

शिव पुराण की कथा के अनुसार पहले बद्रीनाथ धाम में भगवन शंकर तपस्या करते थे। एक बार जब भगवान नारायण  तपस्या के लिए कोई

स्थान ढ़ूढ रहे थे तो अचानक उन्हें यह स्थान दिखा तथा इस स्थान को उन्होंने ध्यान तपस्या के लिए सबसे उपयुक्त माना। श्री हरि यह जानते थे की यह जगह उनके आराध्य भगवान शंकर की तपस्या स्थली है। इसलिए उन्होंने एक युक्ति निकाली और भगवान शंकर से उनका धाम मांग लिया। भगवान  शंकर ने भगवन विष्णु को वह स्थान दे दिया और तब से भगवन  विष्णु यहां निवास करने लगे। तभी से यह शंकर भूमि श्री नारायणकी भूमि बद्रीनाथ धाम के नाम से जानी जाने लगी।

बद्रीनाथ धाम दर्शन करने योग्य स्थान :

तप्त कुंड: बद्रीनाथ मंदिर में प्रवेश करने से पहले, प्रत्येक श्रद्धालु तप्त कुंड में स्नान अवश्य करता है। तप्त कुंड एक प्राकृतिक गर्म पानी का स्रोत है, जिसमें अग्नि देवता का निवास माना जाता है। तप्त कुंड में पुरुषों और महिलाओं के लिए स्नान की अलग व्यवस्था है। हालांकि सामान्य तापमान 55 ° C तक रहता है, दिन के दौरान पानी का तापमान धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। इस कुंड का  औषधीय और धार्मिक महत्व है | यहाँ एक डुबकी भर लगाने से त्वचा रोग ठीक हो जाते है ऐसी श्रद्धालुओं की मान्यता है। 

ब्रह्मकपाल: यह वह स्थान है जहा पर श्रद्धालु अपने पूर्वजो का श्राद्ध या पिंड दान करते है ताकि उनके पूर्वजो की आत्मा को शांति मिल सके।  इस स्थान पर नारायण बलि का भी विधान किया जाता है ताकि भटक रही पूर्वजो की आत्मा शांत हो जाये।

वसुधारा जलप्रपात: वसुधारा जलप्रपात माना गाँव से 3 किलोमीटर दूर  प्रसिद्ध पर्यटन है। इस झरने का पानी 400 फुट की ऊँचाई से जमीन पर गिरता है। ऐसी मान्यता है कि जो हरी भक्त नहीं होते है या

पापात्मा या दुराचारी होते है उन पर वसुंधरा नहीं गिरती है और सच्चे भक्त इस धारा से सराबोर हो जाते है। 

व्यास गुफा : व्यास गुफा, माणा गाँव के पास  स्थित है यही पर  वेद व्यास मुनि ने महाभारत, 18 पुराण और वेदो का विभाजन किए था । प्राचीन ऋषि मुनियो  और योगियों से जुड़ी कई गुफाएं है  जैसे भीमा गुफ़ा, गणेश गुफ़ा, और मुचुकुंड गुफ़ा आदि l 

बद्रीनाथ धाम की आरती (Badrinath Dham Ki Aarti) :

पवन मंद सुगन्ध शीतल हेम मन्दिर शोभितम् |
निकट गंगाबहत निर्मल श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् ||
शेष सुमरन करत निशदिन धरत ध्यान महेश्वर |
श्रीवेद ब्रह्मा करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् ||
शक्ति गौरी गणेश शारद मुनि उच्चारणम् |
जोग ध्यान अपार लीला श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम् 
इन्द्र चन्द्र कुबेर धुनिकर धूप दीप प्रकाशितम् |
सिद्धि मुनिजन करत जै जै श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम्
यक्ष कित्रर करत कौतुक ज्ञान गन्धर्व प्रकाशितम् 
श्रीलक्ष्मीकमला चँवरडोलें श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम्
कैलाश में एक देव निरंजन शैल शिखर महेश्वरम्
राजा युधिष्ठिर करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् |
कोटि तीरथ भवेत् पुण्यं प्राप्यते फलदायकम् ||

चारो धामों को विस्तार में पढ़ने और जानने के लिए जाये, भारत के चार धाम

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