Battle of Haifa: Haifa Hero Major Dalpat Singh Devli

हाइफा का युद्ध: मेजर दलपतसिंह शेखावत देवली व साथियों के शौर्य की गाथा।

विश्व मे योद्धाओं ने बहुत सी चकित कर देने वाली जंग लड़ी है। ऐसी जंग जिसे देखकर देवता स्वर्ग से पुष्पवर्षा करते है, सभ्यताएं गौरान्वित होती है एवं इतिहासकार जिनका जिक्र स्वर्णिम अक्षरों में करते है। इसी प्रकार की जंगो को लड़ने के लिए माताएं अपने पुत्रों को अपना दूध पिलाती है एवं वीरांगनायें अपने पति को तिलक निकालकर युद्धभूमि के लिए विदा करती है।

ऐसी ही एक जंग मारवाड़ के रणबाँकुरे मेजर दलपत सिंह शेखावत ने लड़ी थी। इस जंग ने ना केवल तत्कालीन परिणाम बदल कर दिए थे बल्कि इजरायल, ब्रिटेन व भारत को सामुहिक रूप से गौरान्वित किया था। साधारण कदकाठी के इस वीर शिरोमणि को विश्व के श्रेष्ठतम फ्रंट फाइटर्स में सम्मिलित किया जाता है।

प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय ब्रिटिश की सँयुक्त सेना जिसमें ब्रिटेन, मैसूर लांसर्स व मारवाड़ की सेना सम्मिलित थी, को एक बेहद मुश्किल जमीनी युद्ध मे तुर्की सेनाओं से युद्ध लड़ना था। 23 सितम्बर 1918 को उस युद्व का एक बेहद अहम दिन था। ब्रिटिश भारत की इस सेना की कमान मेजर दलपतसिंह शेखावत की पास थी।

मेजर ने जब देखा कि शत्रु पक्ष बेहद मजबूत स्तिथी में था एवं तोपों से सुसज्जित था। उनकी तोपें आग उगल रही थी एवं उन तोपचियों का निशाना बड़ा सटीक व तोपो की मारक क्षमता बेहद खतरनाक थी। मेजर 600 घुडसवारों की पलटन का नेतृत्व कर रहे थे।

तब मेजर ने उन तोपों को शांत करने के लिए के लिए, तोपचियों को हलाक करने के लिए एवं इन तोपों के पीछे छुपी शत्रु सेना को नेस्तानाबूद करने के लिए युद्ध का परम्परागत, हौलनाक व खुरेंज कदम उठाया जिसे राजपुताना में “साका करना” कहा जाता है।

मेजर ने तमाम घुडसवारों को 2 किलोमीटर दूर कयामत बरसा रही तोपों पर बिजली की गति से एक साथ हमला कर दुश्मन को चकित करते हुए खत्म करने का आदेश दिया। मेजर के नेतृत्व में 600 घुडसवारों ने अपने हाथों में भाले व तलवार थाम कर शत्रु पर तेज, अचानक व हौलनाक चढ़ाई कर दी।

घुडसवारों के इस दल की तेजी दिल दहलाने वाली थी। उनके हाथों में तलवारें बिजली की मानिंद चमक रही थी। तोपों से शोले निकल रहे थे। वातावरण तोप के गोलों की आवाजों, घोड़ो की पदचापों व हथियारों की खनक से गुंजायमान हो रहा था। घुड़सवार तोपों की तरफ अग्रगामी थे उनके सीने शोलों से टकरा रहे थे। ऐसा विहंगम दृश्य देखकर वक्त रुक गया था। ऐसी भीषण टक्कर “ना भूतों ना भविष्यति” समान थी।

मेजर दलपतसिंह जी का तनबदन लहलुहान हो रहा था लेकिन शरीर पर लग रहे घाव की फिक्र रणबांकुरों का कहा होती है वे तो कंधे पर सर ना रहने पर भी युद्ध का मैदान नही छोड़ते है। मेजर व उनके वीरवर घुडसवारों ने चंद लम्हो में ही तोपों के सर पर पहुँच गए। उनकी तलवारों ने तोपचियों को खामोश कर दिया। शत्रु वीरता से लड़े लेकिन सर पर कफ़न बांधे दरिया के समान आगे बढ़ते मेजर व उनके घुडसवारों के सामने अधिक देर नही टिक सके।

इस अदभुत, हैरतअंगेज व दिल को दहला देने वाली जंग में मानो काल नृत्य कर रहा था। चारों तरफ बारूद की गंध पसरी थी व इस गन्ध में रक्तरंजित शवों से निकलते रक्त की नदी ने मिलकर रणभूमि को लहलुहान कर दिया था। मेजर व उनके साथियों ने मोर्चा फतह कर लिया था। दुश्मन नेस्तनाबूद हो चुका था। तोपों के मुँह खामोश हो गए थे। मेजर के साथियों ने विजय पताका फहरा दी थी।

मेजर के घुड़सवार शान से मोर्चा फतह कर बेस की तरफ लौट रहे थे। जंग जीत चुके जँगजुओ के चेहरे सूर्य के समान प्रकाशित थे लेकिन उनके ह्र्दयांचल में अपने साथियों के बिछडने की गहरी कसक शूल के समान चुभ रही थी। वे लौट रहे थे लेकिन 600 नही थे।

उन्होंने स्वर्णिम इतिहास रच दिया था। उनका नाम विश्व के श्रेष्ठ लड़ाकों में शुमार हो चुका था। उन्हें वह सम्मान मिल चुका था जिसके सामने सर झुक जाते है।

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