BEWILDERED: Status of Puzzle-Headed, Situation, Illustration, Losses and Process to Overcome.

किंकर्तव्यविमूढ़: मैं क्या करूँ क्या नही करू? स्तिथी, उदाहरण, इससे नुकसान, निवारण।

किंकर्तव्यविमूढ़ शब्द का शाब्दिक अर्थ है-
भौंचका रह जाने अथवा विभृम/ दुविधा की स्तिथि जिसमें सम्बंधित यह निर्णय ना कर सके कि उसे करना क्या है? अंग्रेजी भाषा मे इससे सम्बंधित शब्द है Puzzle-headed अथवा Bewildered कह सकते है।
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आज के तनाव भरे दौर, भागादौड़ी व गला काट प्रतिस्पर्धा के दौर में यह स्तिथी सामान्य है कि व्यक्ति उलझ कर रह जाता हैं। इस उलझन भरी स्तिथी में व्यक्ति या तो अनिर्णीत रहकर स्वयं को हालात के भरोसे छोड़ देता है अथवा अचानक गलत निर्णय लेकर हानि उठा लेता है।

किंकर्तव्यविमूढ़ स्तिथी का एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण।

विश्व के सबसे महान धर्मयुद्ध “कुरुक्षेत्र” में जब कौरव-पांडवों के सेना आमने-सामने हुई व रणभेरी बज उठी तब विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के मन मे विभृम उतपन्न हो गया। उन्होंने श्री कृष्ण को निवेदन किया कि वे रथ को दोनो सेनाओं के मध्य में ले जाकर खड़ा करे। शत्रु पक्ष में अपने ही नाते-रिश्तेदारों व सगे-सम्बन्धियों को देखकर उनका मन व्याकुल हो गया।
युद्ध मे दोनों पक्षो के मध्य होने वाली अवश्यसंभावी मानवीय क्षति की कल्पना करके उनका मन विचलित हो गया। अर्जुन युद्ध लड़ने-नही लड़ने के प्रश्न में उलझ गए। उनका शरीर निढाल होने लगा व उनके मानस में अनेक कल्पनाओं का जन्म होने लगा। इसी शक्तिहीनता की स्तिथि में उनका धनुष “गांडीव” उनके हाथ से गिर गया व वे नतमस्तक होकर श्रीकृष्ण के सम्मुख जमीन पर बैठ गए।
इसी स्तिथी को “किंकर्तव्यविमूढ़” स्तिथी कहा जाता है। इसके पश्चात जब श्रीकृष्ण ने अपनी देववाणी में उन्हें उनका कर्तव्य समझाया तब अर्जुन को अपने जीवन की राह मिली। कुशल मार्गदर्शन के कारण ही अर्जुन ने तत्कालीक मानसिक स्तिथी से मुक्ति पाकर “कर्म” किया व आज अर्जुन की ख्याति विश्व में एक उदाहरण हैं।

किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति से नुकसान।

आज सैकड़ो उदाहरण हमारे सामने है जिनमे योग्य मार्गदर्शन के अभाव में एवम निर्णय प्रक्रिया के दोष के कारण हमारे समाज मे अधिकाँश लोग कभी ना कभी किंकर्तव्यविमूढ़ स्तिथी में होते है।
किंकर्तव्यविमूढ़ स्तिथी के चलते हमारे समाज को बहुत हानि का सामना उठाना पड़ता है। अतः परिवार, सामाजिक संस्थाओं विशेषकर विद्यालयों, सलाह व परामर्श केंद्रों, चिकित्सकों, अध्यापकों, मनोवैज्ञानिकों, एनजीओ इत्यादि का यह परम पुनीत कर्त्तव्य है कि वे इस प्रकार की मानसिकता वाले व्यक्तियों की पहचान करें एवम उन्हें उचित मार्गदर्शन प्रदान करें।

किंकर्तव्यविमूढ़: स्तिथी का निवारण।

जब आप जीवन मे स्वंय को इस स्तिथी में पाए तो निम्नानुसार कार्य आरम्भ कर स्तिथि में सुधार करें-
1. बेसिक्स की अनुपालना करें- किंकर्तव्यविमूढ़ स्तिथी में एक व्यक्ति को बेसिक्स रूल्स को अविलंब फॉलो कर लेना चाहिए। आप चाहे किसी भी प्रोफेशन में हो बेसिकस को फ़ॉलो करने से आपकी स्तिथी में सुधार होगा। जब कोई खिलाड़ी आउट ऑफ फॉर्म हो जाता है तब रिहैबिलिटेशन सेंटर में उसके कोच भी उसके बेसिकस पर कार्य करते हैं।
2. अपनी प्राथमिकता का चयन करें- इस स्तिथी में आपको सबसे पहले अनिवार्य, आवश्यक व करणीय कार्य की सूची बना लेनी चाहिए केवम सबसे पहले अनिवार्य कार्य आरम्भ कर देने चाहिए ताकि आप अपना अस्तित्व बचा सके केवम अस्तित्व बच जाने पर आवश्यक कार्य पूर्ण कर लेने चाहिए।
3. कार्य आरम्भ करें- किंकर्तव्यविमूढ़ स्तिथी से निकलने हेतु आवश्यक है कि हम “एक कार्य रोजाना” करना आरम्भ करें। आरम्भ में हम आसान कार्य आरम्भ करे ताकि आत्मविश्वास में क्रमशः वर्द्धि हो सके। सिर्फ बकाया/शेष कार्यो के बारे में सोचने से नकारात्मका बढ़ती है जबकि प्रत्येक छोटे से छोटा काम भी जब पूर्ण होता है तो आत्मविश्वास में वर्द्धि करता है।
4. अपनी उपलब्धियों पर गर्व करें- जब आप किंकर्तव्यविमूढ़ स्तिथी में है तो अपने जीवन के ख़ुशगवार समय व अर्जित सफलताओं/उपलब्धि के बारे में सोचे। इससे आपको अच्छा फील होगा तथा वर्तमान मुश्किलों से झुंझने व उन पर जीत की शक्ति का संचरण होगा।
5. बुरी आदतों से बचे- किंकर्तव्यविमूढ़ स्तिथी में सबसे बुरी आशंका यह होती है कि व्यक्ति गलत राह पर चलना आरम्भ हो जाता है। इन बुरे व्यसनों से किंचित भी लाभ नही होता अपितु व्यक्तिगत प्रतिष्ठा भी कार्यक्षमता पर ग्रहण लग जाता है।

एक शिक्षक हेतु करणीय कार्य-

वास्तविक जीवन मे एक शिक्षक को माध्यमिक कक्षा के विद्यार्थियों में यह स्तिथी अधिक मात्रा में मिलेगी। माध्यमिक स्तर के पश्चात एक विद्यार्थी को संकाय चयन करना होता है। इस समय वह बहुत अनिर्णय की अवस्था मे होता है।
एक शिक्षक को उसकी सहायता हेतु कक्षा दशम के पश्चात विभिन्न संकाय व उन संकायों से सम्बंधित रोजगार अवसर को ध्यान में रखकर उस विद्यार्थी की क्षमता के अनुरूप विषय चयन में सहायता करनी चाहिए।

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