Categories: Biographies

Bhagat Singh Jayanti 2021 | जानें Shaheed Bhagat Singh का इतिहास व ज़िन्दगी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य !!

Bhagat Singh भगत सिंह - शहीद भगत सिंह भारत के सबसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से एक महान विभूति है। जो मात्र 23 वर्ष की उम्र में इन्होंने अपने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।  आजादी की लड़ाई के समय भगत सिंह नौजवानों के लिए एक यूथ आइकॉन थे। जो नौजवानों को देश के लिए आगे आने को प्रोत्साहित करते थे। भगत सिंह एक सिख परिवार में जन्मे थे। बचपन से ही उन्होंने अपने आस-पास अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर अत्याचार करते देखा था। जिससे की कम उम्र में ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की बात उनके मन में बैठ चुकी थी। उनका यह सोचना था, कि देश के नौजवान देश की काया पलट सकते हैं। इसलिए उन्होंने नौजवानों को एक नई दिशा दिखाने की कोशिश की थी। भगत सिंह का सम्पूर्ण जीवन संघर्ष से भरा रहा था। उनका जीवन आज भी नौजवानों को प्रेरणा देता है।

भगत सिंह का जीवन परिचय Biography of Bhagat Singh in hindi -

जीवन परिचय
पूरा नामभगत सिंह
जन्म27 सितम्बर, 1907
जन्म स्थानजरंवाला तहसील, पंजाब
माताविद्यावती
पिता सरदार किशन सिंह सिन्धु
भाई – बहनरणवीर, कुलतार, राजिंदर, कुलबीर, जगत, प्रकाश कौर, अमर कौर, शकुंतला कौर
मृत्यु (फांसी)23 मार्च 1931, लाहौर

भगत सिंह का आरंभिक जीवन Bhagat Singh's early life in hindi -

भगत का जन्म एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह उनके जन्म के समय जेल में थे भगत सिंह ने बचपन से अपने घर वालों में देश भक्ति देखी थी। भगत के चाचा अजित सिंह भी एक बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन कमेटी बनाई थी। इसमें उनके साथ सैयद हैदर रजा भी थे। अजित सिंह के खिलाफ उस समय 22 केस दर्ज थे। जिससे बचने के लिए उन्हें ईरान जाना पड़ा था।

भगत के पिता किशन सिंह ने उनका दाखिला दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में करवाया था। सन 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह बहुत दुखी हुए थे। भगत ने

महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन का खुलकर समर्थन किया था। भगत सिंह खुले आम अंग्रेजों को ललकार दिया करते थे, और गाँधी जी के कहे अनुसार ब्रिटिश बुक्स को जला देते थे। चौरी-चौरा में हुई हिंसात्मक गतिविधि के चलते गाँधी जी को असहयोग आन्दोलन बंद करना पड़ा था। जिससे भगत सिंह उनके फैसले से खुश नहीं थे, और उन्होंने गाँधी जी की अहिंसावादी बातों को छोड़ दूसरे दल में शामिल होने की सोच ली थी।

भगत सिंह ने लाहौर के नेशनल कॉलेज से BA (बी ए ) कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात सुखदेव थापर, भगवती चरन और अन्य कुछ लोगों से हुई तब आजादी की लड़ाई उस समय जोरों पर थी। देशप्रेम में भगत सिंह ने अपनी कॉलेज की पढाई बीच में ही छोड़ दी, और आजादी की लड़ाई में पूरी तरह कूद गए इस दौरान उनके घर वालों ने उनकी शादी का विचार किया। भगत सिंह ने शादी से मना कर दिया, और कहा अगर आजादी से पहले मैं शादी करूँ, तो मेरी दुल्हन मौत होगी। भगत सिंह अपने कॉलेज में बहुत से नाटकों में भाग लिया करते थे, वे एक बहुत अच्छे अभिनयकर्ता थे। उनके नाटक, लिपि  देशभक्ति से परिपूर्ण होती थी। जिसमें वे कॉलेज के नवयुवकों को आजादी और देश के लिए आगे आने को प्रोत्साहित किया करते थे। साथ ही वे अंग्रेजों को नीचा दिखाने का काम करते थे। भगत सिंह एक बहुत ही मस्त मौला व्यक्ति थे। उनको लिखने का बहुत शौक था। कॉलेज में उन्हें निबंध में भी बहुत से पुरुस्कार मिले थे।

स्वतंत्रता की लड़ाई war of Independence in hindi -

भगत सिंह सर्वप्रथम नौजवान भारत सभा में शामिल हुए थे। जब उनके घर वालों ने उन्हें विश्वास दिलाया, कि वे अब उनकी शादी का नहीं सोचेंगे, तब

भगत सिंह अपने घर पर वापस लाहौर लौट आये वहां उन्होंने कीर्ति किसान पार्टी के लोगों से अपना मेल जोल बढ़ाया, और उनकी मैगजीन कीर्ति के लिए कार्य करने लगे थे। वे इस मैगजीन के द्वारा देश के नौजवानों को अपना सन्देश पहुंचाते थे। भगत एक बहुत अच्छे लेखक थे। जो पंजाबी उर्दू समाचार के लिए भी लिखते थे। सन 1926 में नौजवान भारत सभा में भगत सिंह को सेक्रेटरी बनाया गया। इसके बाद सन 1928 में वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) शामिल हो गए थे। जो की एक मौलिक पार्टी थी। जिसे चंद्रशेखर आज़ाद ने बनाया था। पूरी पार्टी ने साथ में मिलकर 30 अक्टूबर 1928 को भारत में आये। साइमन कमीशन का विरोध किया। जिसमें उनके साथ लाला लाजपत राय भी थे। साइमन वापस जाओ के नारे लगाते हुए। वे लाहौर रेलवे स्टेशन पर खड़े रहे जिसके बाद वहां लाठी चार्ज कर दिया गया। जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह से घायल हुए और उनकी म्रत्यु हो गई।

लाला जी की म्रत्यु से आघात हो कर भगत सिंह व उनकी पार्टी ने अंग्रेजों से बदला लेने की ठान ली, और लाला लाजपत राय की मौत के ज़िम्मेदार ऑफीसर स्कॉट को मारने की योजना बनाई, लेकिन भूल से उन्होंने असिस्टेंट पुलिस सौन्देर्स को मार दिया था। अपने आप को बचाने के लिए भगत सिंह तुरंत लाहौर से भाग गए, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ढूढ़ने के लिए चारों तरफ जाल बिछा दिया। भगत सिंह ने खुद को बचाने के लिए बाल व दाढ़ी कटवा दी थी। जो की उनके सामाजिक धार्मिकता के खिलाफ थी, लेकिन उस समय भगत सिंह को देश के आगे कुछ भी नहीं दिखाई दिया था।

चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव सब अब मिल चुके थे। वे सब एकजुट हो कर कार्यो

को अंजाम देने लगे। इसी के चलते उन्होंने कुछ बड़ा धमाका करने की सोची। भगत सिंह कहते थे अंग्रेज बहरे हो गए हैं। उन्हें ऊँचा सुनाई देता है, जिसके लिए बड़ा धमाका करना जरुरी है। उन्होंने फैसला किया, कि वे लोग कमजोरों की तरह भागेंगे नहीं बल्कि, अपने आपको पुलिस के हवाले करेंगे। जिससे देश के लोगों को सही सन्देश पहुंचे। दिसम्बर सन 1929 को भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार की असेंबली हॉल में बम विस्फ़ोट कर दिया। जो विस्फ़ोट केवल आवाज करने वाला था। जिसे खाली स्थान में फेंका गया था। इसके साथ उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाये और वँहा पर्चे बाटें इसके बाद दोनों ने अपने आप को गिरफ्तार करवा लिया।

शहीद भगत सिंह की फांसी (Bhagat Singh death Reason) –

भगत सिंह अपने आप को शहीद कहा करते थे। भगत सिंह, शिवराम राजगुरु व सुखदेव पर मुकदमा चला। जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। न्यायालय में भी वे तीनों इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे। भगत सिंह ने जेल में रहकर बहुत-सी यातनाएं सहन कीं। उस समय जेल में भारतीय कैदियों के साथ बुरा व्यव्हार किया जाता था। ना उन्हें अच्छा खाना मिलता था, और ना कपड़े। जेल के कैदियों की स्थिति को सुधारने के लिए भगत सिंह ने जेल के अंदर भी आन्दोलन शुरू किया। उन्होंने अपनी मांगे पूरी करवाने के लिए कई दिनों तक ना पानी पिया, और ना अन्न ग्रहण किया। अंग्रेज पुलिस उन पर बहुत कोड़े मारा करती थी। उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देती थीं। जिससे की भगत सिंह परेशान होकर हार जाएँ, लेकिन उन्होंने अंत तक हार नहीं मानी। सन 1930 में भगत सिंह ने Why I Am Atheist नाम की किताब लिखी थी।

सन 1931 मार्च 23 को भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव

को फांसी दे दी गई। ऐसा माना जाता है की उन तीनों की फांसी की तारीख 24 मार्च थी, लेकिन उस समय पुरे देश में उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन हो रहा था। जिसके चलते ब्रिटिश सरकार को यह डर था, कि कहीं फैसला बदल ना जाये। जिससे ब्रिटिश सरकार ने 23 व 24 की मध्यरात्रि में ही तीनों को फांसी दे दी। और उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।

ख्याति और सम्मान reputation and respect in hindi -

उनकी मृत्यु की ख़बर सुनकर लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा। इसके बाद कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे थे, पर बाद में भारत में मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लग चूका था। इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी। देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया था। दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख मेँ नास्तिक क्यों हूँ, पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसू के 22 से 29 मार्च 1931 के अंक में तमिल भाषा में सम्पादकीय लिखा। जिसमें भगत सिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ऊपर जीत के रूप में देखा गया था। आज भी भारत की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है। जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी थी, तथा उनके जीवन ने कई हिन्दी फ़िल्मों के चरित्रों को प्रेरित किया।