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| On 2 years ago

Bharat : Bharat wants to talk.

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भारत : मैं हूँ “भारत” मेरी बातें, अपनों से!

आप सभी मुझे जानते ही हैं, इस सुन्दर संसार के सवा अरब से अधिक निवासियों का प्यारा सा घर! मैं सबसे पहले कहना चाहता हूँ कि मुझे आप सभी बहुत अच्छे लगते हो, पर ये नहीं बता सकता कि कितने अच्छे? भला कोई माता-पिता अपनी पुश्तों से बता सकता हैं अपने प्यार का परिमाण!

आज आप सब से बाते करने कि एक हुक सी दिल में उठ रही है! आप मेरे बारे में बहुत कुछ जानते है, पर सब कुछ तो नहीं जानते, सो मैं अपने बारे में थोड़ी बहुत बाते आपसे साँझा करना चाहता हूँ।

सर्वप्रथम, मैं अपने नाम के बारे मैं कहना चाहता हु! आपने मेरे कई नाम रखे यथा – हिन्द , हिंदुस्तान, भारत, आर्यावर्त, इंडिया आदि और कई प्रकार के विशेषणों से भी अलंकृत भी किया जैसे- “सोने की चिड़िया”, “वेद भूमि”, “वीरभूमि”, “तपोभूमि”, " विश्वगुरु" …. और भी ना जाने क्या क्या! सही बात तो ये है कि मुझे आप द्वारा प्रदत सभी नामो और अलंकारों से बड़ा प्यार है! मुझे पता है कि आप जब भी किसी से अपने दिल की गहराइयों से प्यार करते हो तो उसको अलग अलग और नए नए नामों से पुकारते हों, जैसे आपने कृष्णजी, रामजी, गंगा मैया को अनेकों नाम प्यार से दिए, जैसे एक माता अपने पुत्र को अनेको नाम देती हैं, वैसे ही आपने मुझे प्यार से अनेक नाम दिए और इस हेतु में आप सभी को अपना प्यार अर्पित करता हूँ!

मैं इतिहास सिखाने के लिए नहीं बतला रहा हूँ, मैं तो बस यूँ ही कहना चाहता हूँ, मेरा अस्तित्व इन विभिन्न नामकरणो से बहुत पहले से हैं! ये मेरा सुन्दर तथा मनोरम आँगन तब भी तुम्हारा घर था जब तुम तुम्हारा स्वयं का नाम रखना भी नहीं जानते थे, तब भी तुम मेरी गोद में विचरण करते थे! तुम आज भी मेरी गोद में सानंद निवास करते हो! लेकिन तब मेरी गोद में हजारो नदियां लहराकर बहती थी, पर्वतो पर चहुंओर हरियाली छाई हुई थी, पर्वतो से निकलता अमृत समान जल अपनी पवित्रता के साथ ही महासमुंद्रो की आगोश में पहुंच जाता था और मुझसे मिलने पुनः बादलो का रूप धारण कर दिलफरेब बरसातों में बदलकर मेरे आँगन में सभी जीवो को नृत्य करने का अवसर प्रदान किया करता था! तब ना केवल मयूर बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही उसके साथ थिरकने लगता था और मेरा मन इन्द्रधनुष के डोले पर सवार होकर अपने निवासियों की खुशियां देखकर मचल-मचल जाता था!

तब से आज तक मेरे आँगन में अनेक परिवर्तन आये है, आज भी मेरा मनमयुर मेरे आँगन में रचि-बसी विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओ के अनेकानेक त्योहारों, उत्सवों आदि को देखकर बड़ा प्रफुल्लित होता है! मुझे मेरे आँगन में आयोजित होने वाले ये उत्सव ऊर्जावान बना देते है, मेरी आत्मा झूम-झूम कर आशीर्वाद देने लग जाती है..

अपनी बात कहकर मुझे संतोष हो रहा है व तुमसे आशा है कि तुम मुझे सदैव प्रसन्न रखने का प्रयास करते रहोगे।

चलो.. आज एक छोटा सा गीत गुनगुनाते है!

सप्रेम!