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माता सीता के विवाह में भाई की रस्म (Brother's Ceremony in Mata Sita's Marriage In Hindi)

श्रीराम और देवी सीता का विवाह कदाचित महादेव एवं माता पार्वती के विवाह के बाद सबसे प्रसिद्ध विवाह माना जाता है क्योंकि यह विवाह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के राजा राम और महारानी सीता का जो था। इस विवाह ही भव्यता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि राजा जनक ने सीता को इतना सोना दहेज़ में दिया था कि उस सोने से पूरा पहाड़ बन गया था।  

इस विवाह की एक और विशेषता ये थी कि इस विवाह में त्रिदेवों सहित लगभग सभी मुख्य देवता किसी ना किसी रूप में उपस्थित थे। साथ ही देव, मनुष्य, किन्नर, गन्धर्व, योगिनी, भूत, यक्ष और पितर आदि वर्ग भी गुप्त रूप से अद्भुत विवाह को देखने आया था।  

कोई भी इस विवाह को देखने का मोह छोड़ना नहीं चाहता था। श्रीराम सहित ब्रह्महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र को भी इसका ज्ञान था इस विवाह में मनुष्य रूप में देवी देवता आये हुए है। चारो वेदो ने मनुष्य रूप बनाकर ऋचाये गाई, सूर्य देव ने स्वयं आकर विवाह की विधि बताई और अष्ठ सिद्धियों  ने  माता सीता का श्रृंगार किया। 

कहा जाता है कि उनका विवाह देखने को स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र ब्राह्मणों के वेश में आये थे जिसका किसी भी जनकपुर वासी या अयोध्यावासी को  पता नहीं था। केवल श्री राम ही मन ही मन उनको प्रणाम कर मुस्करा रहे थे।  

चारो

भाइयों में श्रीराम का विवाह सबसे पहले हुआ। सीता की तीनो बहनो का विवाह रामजी ते तीनो भाइयो के साथ हुआ था।  विवाह का मंत्रोच्चार चल रहा था और उसी बीच कन्या के भाई द्वारा की जाने वाली विधि आयी।  

इस विधि में कन्या का भाई कन्या के आगे-आगे चलते हुए लावे का छिड़काव करता है और वर व  वधु को कुछ नेग देता है  इसलिए एक कन्या के विवाह में भाई की अनिवार्यता अवश्य होती है। उत्तर भारत, विशेषकर बिहार एवं उत्तर प्रदेश में आज भी ये प्रथा देखने को मिलती है। 

विवाह पुरोहित ने जब इस प्रथा के लिए कन्या के भाई का आह्वान किया तो ये विचार किया जाने लगा कि इस प्रथा को कौन पूरा कर सकता है। क्योंकि सीता का कोई औपचारिक भाई नहीं था क्योंकि सीता तो धरती की पुत्री थी और वह इकलौती ही पृथ्वी से निकली थी। 

समस्या ये थी कि उस समय वहाँ ऐसा कोई नहीं था जो माता सीता के भाई की भूमिका निभा सके इसलिए सभी एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे की कोण इस रस्म को पूरा करेगा?

अपनी पुत्री के विवाह में इस प्रकार विलम्ब होता देख कर पृथ्वी माता भी दुखी हो गयी और मन ही मन सोचते हुए कुछ उपाय किया उन्होंने एक युवक  की और इशारा करते हुए वह जाने की आज्ञा दी। 

चर्चा चल ही रही

थी कि अचानक एक श्यामवर्ण का युवक उठा और उसने इस विधि को पूरा करने के लिए आज्ञा माँगी जो हाथ में लवे लेकर इस रस्म को करने के लिए उद्यत था। 

वास्तव में वो स्वयं मंगलदेव थे जो वेश बदलकर नवग्रहों सहित श्रीराम का विवाह देखने को वहाँ आये थे। उनका सम्बन्ध माता सीता से भाई बहन वाला था क्योंकि देवी सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ था और मंगल भी पृथ्वी के पुत्र थे। इस नाते वे देवी सीता के भाई लगते थे। इसी कारण पृथ्वी माता के संकेत से वे इस विधि को पूर्ण करने के लिए आगे आये।

इस प्रकार एक अनजान व्यक्ति को इस रस्म को निभाने को आता देख कर राजा जनक दुविधा में पड़ गए क्योंकि इस व्यक्ति को आज से पहले न तो कभी यहाँ देखा था और न ही वे इसके बारे में थोड़ा सा ही जानते थे। 

जिस व्यक्ति के कुल, गोत्र एवं परिवार का कुछ पता ना हो उसे वे कैसे अपनी पुत्री के भाई के रूप में स्वीकार कर सकते थे क्योंकि की उस समय दूसरी गोत्र और कुल का व्यक्ति यह कार्य नहीं कर सकता था। किसी अनजान को सीता है भाई बनाना उनकी राज प्रतिष्ठा के विरुद्ध था। 

उन्होंने मंगल से उनका परिचय, कुल एवं गोत्र पूछा। साथ ही माता पिता का नाम और कैसे सीता के साथ भाई का सम्बन्ध हुआ इसका कारण भी पूछा। 

इसपर मंगलदेव ने मुस्कुराते हुए कहा - हे महाराज जनक ! मैं अकारण ही आपकी पुत्री के भाई का कर्तव्य पूर्ण करने को नहीं उठा हूँ। आपकी आशंका निराधार नहीं है किन्तु आप निश्चिंत रहें, मैं इस कार्य के सर्वथा योग्य हूँ। मैं सीता का भाई ही हूँ इसलिए यह मेरा कर्तव्य भी है। 

अगर आपको कोई शंका हो तो आप महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इस विषय में पूछ सकते हैं। ऐसी तेजयुक्त वाणी सुनकर राजा जनक ने महर्षि वशिष्ठ एवं विश्वामित्र से इसके बारे में पूछा। वे दोनों तो सब जानते ही थे अतः उन्होंने सहर्ष इसकी आज्ञा दे दी। राजा जनक को यह जानकार बड़ा आश्चर्य भी हुआ कि सीता का कोई भाई भी है।  

इस प्रकार गुरुजनों से आज्ञा पाने के बाद मंगल ने देवी सीता के भाई के रूप में सारी रस्में निभाई और विवाह को पूरा करवाया। 

रामायण के सारे संस्करणों में तो नहीं किन्तु कम्ब रामायण एवं रामचरितमानस में इसका उल्लेख है। ये कथा अपनी बहन के प्रति एक भाई के उत्तरदायित्वों के निर्वाह का एक मुख्य उदाहरण है।

माता सीता को धरती माता की पुत्री माना जाता है इसके पीछे एक पौराणिक आख्यान है कि एक बार राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ता है तब ऋषियों के कहने पर राजा और रानी बैल की जगह पर खुद जुतकर हल जोतते है

तभी उन्हका  हल एक बक्से से टकराता है जब वे धरती खोद कर उस बक्से को निकलते है तो उसमे से एक सुन्दर बालिका निकलती है यही बालिका आगे जाकर सीता कहलाती है। 

जिस प्रकार सीता धरती से पैदा होती है उसी तरह पुनः धरती में ही समा जाती है जब धोबी के कटाक्ष करने पर रामचन्द्रजी सीता को पुनः वनवास दे देते है तब वाल्मीकि आश्रम में उनके द्वारा लव और कुश का जन्म होता है। इन वीर बालको द्वारा रामजी के अश्वमेध का घोडा पकड़ लिए जाने पर अनजाने में बाप और बेटो में यूद्ध  हो जाता है तब सीता द्वारा लव कुश को रामचन्द्रजी के बारे बताया जाता है की ये उनके पिता है  और वे उनको रामजी को सौंप कर धरती में पुनः समा जाती है।

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