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विवाह (Marriage) एक सँस्कार | हिन्दू विवाह पद्धति की पूर्ण जानकारी Complete information about Hindu marriage system

विवाह अर्थात Marriage एक सँस्कार हैं। संस्कार से अभिप्राय व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौदिक और आत्मिक परिष्कार के लिए किये गये धार्मिक अनुष्ठान से है। विवाह सँस्कार एक ऐसा धार्मिक कार्य होता है जो नर-नारी को संयुक्त करके, परस्पर सहयोग से उनकी वैयक्तिक पारिवारिक, सामाजिक और आत्मिक प्रगति में योगदान देता हैं। विवाह को निकाह, शादी, मैरिज इत्यादि नामों से सम्बोधित किया जाता है लेकिन हिन्दू धर्म में इसे विवाह कहा जाता है। प्रत्येक धर्म मे विवाह की अपनी संस्कृति व सँस्कार दिखाई देते है। आइये, इस आलेख में हम हिन्दू विवाह ( Hindu Marriage ) से सम्बंधित पूर्ण व प्रमाणिक जानकारी प्राप्त करते हैं।

हिन्दू विवाह ( Hindu Marriage ) www.shivira.com

हिन्दू धर्म मे विवाह व्यवस्था ऋग्वेद काल से | Marriage system in Hinduism from Rigveda period

सृष्टि परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये प्रकृति ने मानव-मन में 'आकर्षण' की स्थापना की है। यह आकर्षण भाव कहीं युवावस्था में उद्दीप्त होकर अनियन्त्रित और उच्छृंखलित न हो जाये, मानव-प्रगति का विनाशक न बन जाये अतएव इसके नियमन के लिये तत्त्वद्रष्टा भारतीय ऋषियों ने विवाह-संस्कार का आयोजन किया। भारतवर्ष में ऋग्वेद काल से ही विवाह संस्कार की प्रथा चली आ रही है। वैदिक ऋषियों की दृष्टि में नर-नारी के संयोग की एक आकस्मिक घटना मात्र न थी, अपितु एक पुनीत कर्त्तव्य था।

विवाह शब्द का अर्थ क्या हैं ? | What is the meaning of marriage?

विवाह का शाब्दिक अनुवाद ही उसका अभिप्राय स्पष्ट कर देता है। विवाह का अर्थ है- 'ऊपर उठना, योग देना, ग्रहण करन आदि । संस्कार से अभिप्राय व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौदिक और आत्मिक परिष्कार के लिए किये गये धार्मिक अनुष्ठान से है। इस प्रकार विवाह संस्कार वह धार्मिक कृत्य था, जो नर-नारी को संयुक्त करके, परस्पर सहयोग से उनकी वैयक्तिक पारिवारिक, सामाजिक और आत्मिक प्रगति में योगदान देता था। हिन्दू धर्म में विवाह भोग के लिये नहीं है, अपितु यह कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से भरे गृहस्थ जीवन का भव्य प्रवेश द्वार है। हिन्दू विवाह पद्धति, उसके विविध कर्मकाण्ड, प्रतीक रूप में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हैं। आइये

विवाह एक सँस्कार हैं | Marriage is a sacrament

हिन्दू-विवाह पद्धति वस्तुतः एक धार्मिक संस्कार है, जिसमें वर वधू के अतिरिक्त देवतत्व की भी उपस्थिति मानी जाती है। देवताओं की साक्षी में वर वधू आजीवन साथ रहने का व्रत लेते हैं। उनके लिये एक दूसरे से सम्बन्ध विच्छेद करना उन देवी तत्वों का अपमान था जिनके सम्मुख उन्होंने प्रतिज्ञा ग्रहण की थी। हिन्दू विवाह के प्रतीक रूप

में वर वधू को उनके कर्तव्यों-उत्तरदायित्वों का बोध कराते हैं, उन्हें पत्नीव्रत धर्म तथा पतिव्रताधम का दृढ़ता से पालन करने की प्रेरणा देते है। हिन्दू-विवाह के प्रमुख प्रतीकात्मक कृत्य पाणिग्रहण, सप्तपदी अश्वारोहण आदि ।

विवाह की प्रक्रिया | Marriage process

पाणिग्रहण में वर यह मन्त्र बोलते हुए वधू का दाहिना हाथ ग्रहण करता है… "मैं सौभाग्य के लिये तेरा हाथ ग्रहण करता हूँ। तू मुझ पति के साथ वृद्धावस्था तक जीवित रहे, भग, अयंमा, सविता आदि देवताओं ने तुझे गाहपत्य के लिये मेरे हाथों सौंपा है, जिससे हम अपने घर पर शासन करें मैं साँस हूं, तूँ ऋक हैं, मैं द्यो हूँ , तूँ पृथ्वी हैं, आओ। हम दोनों विवाह करें। सौ शरद ऋतुओं पर्यन्त हमारे मन प्रेमपूर्ण, विशुद्ध तथा प्रकाशवान रहें. (अथर्ववेद 14/1/49) इन मन्त्रों में वर देवताओं की साक्षी में भावी पत्नी के साथ मिलकर सौ शरद् पर्यन्त घर शासन करने, अपना मन प्रेमपूर्ण, विशुद्ध और प्रकाशवान रखने का संकल्प लेता है। वह देवताओं को साक्षी बना कर मिलने चलने, मिलकर परिवार समाज का दायित्व निभाने के लिये, कभी पृथक् न करने के लिये, आजीवन रक्षा और सम्मान करने के लिये, उसका हाथ ग्रहण करता है। वधू उसके लिये देवताओ द्वारा दी गयी पवित्र धरोहर है। अतएव यहाँ सम्बन्ध विच्छेद (तलाक) का तो प्रश्न ही नहीं उठता ।

विवाह सँस्कार में सप्तपदी का महत्व | Significance of Saptpadi of Hindu marriage

हिन्दू विवाह वैधानिक दृष्टि से सप्तपदी के उपरान्त ही पूर्ण समझा जाता है। सप्तपदी से आशय सात फेरों से नही होता हैं। वैदिक रीति के हिन्दू विवाह में सप्तपदी एक महत्वपूर्ण सँस्कार होता है इसमें वर उत्तर दिशा में कन्या को सात मंत्रों के द्वारा सप्त मण्डलिकाओं में सात पदों तक साथ ले जाता है। अग्नि की चार परिक्रमाओं से यह कृत्य अलग है। जिस विवाह में सप्तपदी होती है, वह 'वैदिक विवाह' कहलाता है। सप्तपदी वैदिक विवाह का अभिन्न अंग है। इसके बिना विवाह पूरा नहीं माना जाता सप्तपदी के बाद ही कन्या को वर के वाम अंग में बैठाया जाता है।

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आइये, सप्तपदी की क्रिया पर भी दृष्टिपात करें। पति इनके साथ वधू को उत्तर दिशा में सात पग चलता है- " अन्नादि के लिये एकपदी हो, बलसम्पादन के लिये द्विपदी हो, धन तथा ज्ञान की पुष्टि के लिये त्रिपदी हो, सुखोत्पत्ति के लिये चतुष्पदी हो, सन्तान के पालन के लिये पञ्चपदी हो, ऋतुओं में अनुकूल व्यहार सम्पादन

हेतु षष्ठपदी हो । हे मित्र ! मुझसे मित्रतापूर्ण व्यवहार के के लिये सप्तपदी हो। इस प्रकार तू मेरे साथ प्रतिपालन करने वाली हो। हम शतजीवी पुत्र प्राप्त करें।” (आश्वलायन ह्यसूत्र 1/7/19)

सप्तपदी के इन मन्त्रों में गृहस्थ जीवन की प्रगति के सात पद अर्थात् साधन बतलाये गये हैं। प्रथम पद में दम्पती अन्न के उत्पादन और विधिवत् उपयोग का, द्वितीय पद में अपने कर्त्तव्यों के विधिवत् निर्वाह के लिये शारीरिक, मानसिक और अत्मिक बल सम्पादन का तृतीय पद में समुचित साधनों से धन के अर्जन तथा ज्ञानकी सतत् वृद्धि का, चतुर्थ पद में सदैव प्रसन्न और सन्तोषी बनने का, पञ्चम पद में समाज को श्रेष्ठ सन्तति प्रदान करने का षष्ठ पद में संयमित यौनाचार का तथा सप्तम पद में एक दूसरे के प्रति मित्रभाव बनाये रखने का व्रत लेते हैं। इस प्रकार सप्तपदी के माध्यम से वर-वधू को गृहस्थ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिये, उसकी सुख-शन्ति और प्रगति के लिये बड़ा व्यावहारिक निर्देशन दिया गया है।

हिन्दू धर्मशास्त्र के अनुसार विवाह दो व्यक्तियों का शारीरिक सम्बन्ध नहीं है; यह दो आत्माओं का पवित्र सम्मिलन है। पाणिग्रह के उपरान्त होने वाली हृदयस्पर्श की क्रिया इसी तथ्य को स्पष्ट करती है। वर वधू के दाहिनी ओर जाकर वर भावनाओं के केन्द्र हृदय का इन मन्त्रों के साथ स्पर्श करता है- “मैं अपने व्रत में तेरा हृदय धारण करता हूँ। तेरे चित्त मेरे चित्त का अनुकरण करने वाला हो । तू मेरी वाणी में एकाग्रमन से निवास कर। प्रजापति तुझे मुझसे संयुक्त करें।” (पास्कार गृह्मसूत्र (1/88) ऋषिजन इस तथ्य से परिचित थे कि दाम्पत्य जीवन में एक मन, एक प्राण बनकर अपनी भावनाओं को अभिन्न करके ही प्रगति और सुख का सोपान पाया जा सकता है। अतएव मनोमय जगत् में अभिन्नता स्थापित कराने के लिये ही हृदयस्पर्श का यह प्रतीकात्मक कृत्य है।

विवाह का उद्देश्य | Purpose of marriage

हिन्दू विवाह क्षणिक उद्दाम कामनाओं की पूर्ति के लिये किया गया समझौता नहीं हैं जो जब चाहे तब खण्डित होजाये। यह तो ऐसी पवित्र प्रतिज्ञा है जो कठिनाइयों और बाधाओं में और भी सुदृढ़ बनती है। इसी तथ्य को प्रतीक रूप में स्पष्ट करती है अवरोहण और ध्रुवदर्शन की क्रियाएँ ।' अश्वारोहण में वधू का दाहिना पैर पत्थर पर रखवाते हुए वर कहता है – 'इस पत्थर पर आरूढ हो और इसी के समान स्थिर हो। पत्थर स्थिरता तथा शक्ति का प्रतीक है। पत्नी को गृहस्थ जीवन के कर्त्तव्यों में, पति के प्रति निष्ठा में, पत्थर के समान स्थिर होने के लिये कहा गया है।

ध्रुवदर्शन का भी यही अभिप्राय है कि वह ध्रुव के समान अनगिनत कठिनाइयों में भी स्थिर बने ।

यह है हिन्दू-विवाह का वास्तविक स्वरूप और प्रयोजन। वस्तुतः प्राचीन काल में वर-वधू के रूप और धन को महत्व नहीं दिया जाता था, अपितु उनके गुण-कर्म और संस्कारों द्वारा उनका मूल्यांकन किया जाता था। धन का आदान प्रदान जिस विवाह में होता था, वह निकृष्ट समझा जाता था।

विवाह के आठ प्रकार | Eight types of marriage

प्राचीन काल में विवाह के आठ प्रकार थे- ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच प्रथम चार विवाह प्रशस्त थे, अंतिम चार अप्रशस्त । धन के आदान प्रदान वाला विवाह- आसुर विवाह अप्रशस्त ही माना गया है। इस विवाह में पति कन्या तथा उसके सम्बन्धियों को यथाशक्ति धन प्रदान करना था। इस प्रकार विवाह में प्रमुख निर्णायक तत्व था धन। प्रकारान्तर से यह एक प्रकार का सौंदा था। इस प्रथा की निन्दा करते हुए स्मृतिकार आपस्तम्ब ने लिखा है कि किसी भी व्यक्ति को कन्यादान करते समय शुल्क नहीं लेना चाहिए । शुल्क को स्वीकार करना छद्मवेश में कन्या का विक्रय है ।

आज के विवाह आसुर विवाह ही हैं। अन्तर इतना है कि आज विवाह के चौराहे पर वर की बोली लगती है। विवाह का पुनीत और प्रेरणास्पद स्वरूप अब विस्मृत हो गया व्यक्तिगत सुखप्राप्ति अब विवाह का प्रमुख लक्ष्य है । सामाजिक कर्त्तव्यों की पूर्ति के लिये त्याग भरे इस उत्तरदायित्व के ग्रहण की भावना मृतप्राय हो गयी है। वधू से, उसके गुण कर्म और स्वभाव से अधिक महत्त्व दहेज को दिया जाता है। उस सबके फलस्वरूप जो विकृतियाँ उत्पन्न हुई है वह चारों ओर फैली ही हैं। आज विवाह संस्कार न रह कर एक कर्मकाण्ड मात्र रह गया है, जिसे जल्दी-जल्दी ज्यों पूरा करके छुटकारा पा लिया जाता है। आज महत्व दिया जाता है, समय और श्रम लगाया जाता है, चमक-दमक पर प्रदर्शन पर, आडम्बर भरे आयोजन पर परिणाम स्पष्ट है। आज के वैवाहिक जीवन में चारों और कुण्ठाएँ और असन्तोष ही दिखाई देते हैं। इन विचारों से परिवार में जो विष फैल रहा है, समाज में जो विभीषिकाएँ छा रही हैं, वे किसी की दृष्टि से छिपी नहीं हैं।

विवाह संस्कार के समय कितने फेरे लेने चाहिए ? How many rounds should be taken at the time of marriage ceremony ?


अग्नि सूर्य की प्रतिनिधि है। सूर्य जगत की आत्मा तथा विष्णु का रूप हैं। अत: अग्नि के समक्ष फेरे लेने का अर्थ है- परमात्मा के समक्ष फेरे लेना। अग्नि ही वह माध्यम

है, जिसके द्वारा यज्ञीय आहुतियां प्रदान कर देवताओं को पुष्ट किया जाता है। इस प्रकार अग्नि के रूप में समस्त देवताओं को साक्षी मान कर पवित्र बंधन में बंधने का विधान धर्मशास्त्रों में किया गया है।

वैदिक नियमानुसार विवाह के समय चार फेरों का विधान है। इनमें से पहले तीन फेरों में वधू आगे चलती है, जबकि चौथे फेरे में वर आगे होता है। ये फेरे चार पुरुषार्थो- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक हैं। इस प्रकार तीन फेरों में वधू (पत्नी) की प्रधानता है, जबकि चौथे फेरे द्वारा मोक्ष मार्ग पर चलते वधू (पत्नी) को वर (पति) का अनुसरण करना पड़ता है।
कहीं-कहीं लोकाचार एवं कुलाचार के अनुसार सात फेरे भी होते हैं, परंतु शास्त्राचार के मुताबिक चार फेरे ही होते हैं।

सात तो वचन होते हैं, जिन्हें सप्तपदी कहते हैं। अग्नि के सम्मुख पति सात वचन देता है और जीवन भर पालन करने की प्रतिज्ञा लेता है। विवाह संस्कार में शास्त्राचार, कुलाचार और लोकाचार, तीनों प्रकार के आचार होते हैं। शास्त्राचार के मुताबिक चार ही फेरे होते हैं।

आज की आवश्यकता | Today's need

युग की पुकार है, मानवता की माँग है कि विवाह की इस पुनीत सांस्कृतिक घरोहर के महत्व को समझा जाये। विवाह के स्वरूप को विकृत और वीभत्स नही बनाया जाये, जीवनसंगिनी को रूप और धन की तुला पर न तोला जाये, नारी को दहेज की लपटों में न झोंका जाये। दम्पति विवाह के वास्तविक उद्देश्य- अपने साथी, परिवार और समाज के प्रति स्वार्थत्याग तथा कर्त्तव्यपरायणता की भावना को समझें। पति और पतिकुल, वधू के त्याग और अनुदान का मूल्य समझ कर एकबार फिर उसे 'साम्राज्ञी भव' का गौरव दें , साथ लाये धन को नहीं अपितु उसके गुणों को महत्त्व दे; तभी परिवार और समाज में सुखशान्ति भरे स्वर्गीय वातावरण का निर्माण सम्भव हैं।