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| On 2 months ago

समस्त शिक्षकों को बधाई। माननीय न्यायपालिका ने शिक्षक सेवाओं का किया सम्मान।

समस्त शिक्षकों को बधाई (Congratulations to all teachers) का एक अवसर है। शिक्षक एक ऐसा अध्यवसाय है जिसमे एक व्यक्ति निरन्तर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हुए अपने शिष्यों के माध्यम से निरंतर राष्ट्र सेवा जारी रखता है। शिक्षक द्वारा कक्षा-कक्ष में ज्ञान की अविरल रूप से प्रवाहित ज्ञान सरिता से सरोबार विद्यार्थी मन युवा होकर राष्ट्र सेवा में अपना जीवन अर्पित करता है। शिक्षक द्वारा शिक्षण के दौरान दिए गए उदाहरण व दृष्टांत विद्यार्थियों हेतु पहले प्रेरणा व तत्पश्चात विचारधारा बन जाते हैं।

 

हाई कोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी.हरिशंकर की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस दुनिया में टीचर

ही ऐसे लोग होते हैं जो बिना किसी उम्मीद के निस्वार्थ सेवा देते हैं। वे अपने स्टूडेंट्स से थैंक्यू की उम्मीद भी नहीं करते।

उपरोक्त टिप्पणी के संदर्भ में कहा जा सकता है कि आदिकाल से ही गुरु-शिष्य सम्बन्ध पवित्र, निःस्वार्थ व अनुकरणीय रहे है। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत गुरु (शिक्षक) अपने शिष्य को शिक्षा देता है या कोई विद्या सिखाता है। बाद में वही शिष्य गुरु के रूप में दूसरों को शिक्षा देता है। यही क्रम चलता जाता है। यह परम्परा सनातन धर्म की सभी धाराओं में मिलती है।

'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश ज्ञान। अज्ञान को नष्ट

करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है। गुरू के महत्व को सदैव प्राथमिकता दी गई है। सँस्कृत के इस श्लोक से गुरु की महिमा को समझा जा सकता है-
"“गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:
गुरुर साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”


इसी क्रम में आचार्य चाणक्य द्वारा एक श्रेष्ठ शिष्य के गुण भी निम्न श्लोक में वर्णित किये गए है-


आचार्य चाणक्य ने एक आदर्श विद्यार्थी के गुण एस प्रकार बताये हैं-
“काकचेष्टा बकुल ध्यानं श्वान निद्रा तथेव च
अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थीनाम पंचलक्षणं”

भारत के महान गुरुजनों में जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण के पश्चात आचार्य वेदव्यास, महर्षि वाल्मीकि, परशुराम, गुरु द्रोणाचार्य, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, गुरु सांदीपनि, देवगुरु बृहस्पति, दैत्यगुरु शुक्राचार्य, गुरु वशिष्ठ, आदि शंकराचार्य व गुरु कृपाचार्य रहे है।

पुरातन समय के पश्चात भारतराष्ट्र में अनेक महान गुरुजनों ने जन्म लेकर अपने ज्ञान से भूलोक को आलोकित किया है। इनकी शिक्षाएं अजर-अमर है। आचार्य चाणक्य जिन्हें इतिहास में 'कौटिल्य' नाम से भी जाना जाता हैं। चाणक्य के द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' राजनीति, कृषि, समाजशास्त्र आदि का महान ग्रंथ माना जाता है। गुरु चाणक्य की "चाणक्य नीति" के साथ ही विदुर की "विदुर नीति" भी हमे सन्मार्ग दिखाती है।

आधुनिक भारत मे रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंदबकर पश्चात वर्तमान काल से डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ विश्वेश्वरैया इत्यादि की लंबी सूची रही है। इसी सूची बिहार के सुपर-30 के संचालक आनन्द भी अब सम्मिलित हो गए है।

भारत मे गुरु-शिष्य की इस महान परपरा में अनेक गुरु-शिष्य जोड़ियों ने इस धरा को प्रकाशमय रखा है। गुरु द्रोणाचार्य-श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण-अर्जुन, चाणक्य-अशोक, रामकृष्ण-विवेकानंद के दिव्य सम्वादों को सुनकर सदियों तक जनकल्याण जारी रहेगा।

इन सबके साथ ही माननीय हाईकोर्ट ने जिस प्रकार शिक्षक समुदाय हेतु आदरसूचक शब्दावली प्रयुक्त करके सम्मानित किया है उसी सन्दर्भ निवेदन है कि आज भी दूरस्थ, कठिन व दुर्गम्य स्थानों पर अनेकों शिक्षक आज भी पूर्ण समर्पण भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर एक समृद्ध राष्ट्र के निर्माण में अपनी भूमिका निभा रहे है।
ऐसे शिक्षको को सादर नमन।