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Culture of Rajasthan: Traditions, Rituals and customs of Rajasthan

राजस्थान की प्रमुख प्रथाएँ एवं रीति रिवाज!

(अ) सामाजिक प्रथाएँ

संस्कार - मनुष्य शरीर को स्वस्थ व दीर्घायु तथा मन को शुद्ध व उत्तम बनाने के लिए 16 संस्कार माने गये हैं। ये संस्कार निम्न है - गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोनयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्मकर्णवेद्य, विद्यारम्भ, उपनयपवेदारम्भ, केशान्त, समापर्वनविवाह, अन्त्येष्टि।

अंगवारी - किसानों द्वारा पारस्परिक सहयोग से कृषि कार्य को पूर्ण करने की परम्परा।

ओजू (यू)- नमाज पढ़ने से पूर्व शुद्धि के लिए हाथपांव धोने की क्रिया। (मुस्लिम समाज में)

जौहर - राजपूत स्त्रियों द्वारा अपनी सेना की हार की संभावना पर आततायियों से अपने धर्म की रक्षार्थ किया जाने वाला सामूहिक आत्म दहन।

ओढ़ावणी ( पहरावणी) - विशेष अवसरों पर कन्या के पिता द्वारा कन्या व उसके पति के परिवार को दिया जाने वाला वस्त्राभूषण।

ओझण, उझणी (डायजा ) (Dowry) - कन्या की विदाई के समय दिये जाने वाले सामान (दहेज) को कहते है।

पंचांग श्रवण - मकर सक्रांति पर हाड़ौती क्षेत्र में विशेषकर गागन व आसपास के क्षेत्र में ज्योतिषी अपने यजमानों को ‘पंचाग' सुनाते है।

कावड़ - लकड़ी की बनी तराजूत्मा काठ आति में श्रावण मास में शिव पूजन के लिए अभिषेक हेतु तीर्थ स्थलों से कावड़ियों द्वारा नगें पैर चलकर कावड़ में जल रख कर लाया जाता है।

कोवड़ा रा होली - यह भिनाय (अजमेर) में खेली जाती हैंजिसमें महिलाएँ रग से भरे गीले कोड़ों से
पुरुषों को मारती है और पुरुष उन पर रंग डालकर अपना बचाव करते है।

गाँव बारण रसोई- जब श्रावण ऋतु आरम्भ होती है तो किसान गाँव के बाहर रसोई बनाकर इन्द्र की पूजा करते है।

चाक पूजन- इस प्रथा में विवाह से पूर्व घर-घर महिलाएँ गाजे-बाजे साथ कुम्हार के 'चाक' का पूजन करती है और लौटते समय सुहागिनें अपने सिर पर ‘जेगड़' पूजनमें रखकर लाती है। घर
पहुँचने पर 'जंवाई' इन जेगड़ों को उतारता है।

गाघराणो -पुनर्विवाह, विशेषकर देवर के साथ।

नांगल - गृह प्रवेश का महोत्सव।

पुरणाई- मांगलिक अवसरों पर गोबर आदि से आंगन लेपने की क्रिया।

नातो- विधवा स्त्री द्वारा किसी पुरुष से पति के रूप में किया जाने वाला सम्बन्ध।

पुंसवन संस्कार - गर्भाधान के तीसरे मास में किया जाने वाला संस्कार।

जलवा या कुआँ पूजन

- एक सांस्कृतिक धार्मिक अनुष्ठान जिसमें पुत्र जन्म के 10 दिन बाद शुभ मुहुर्त में निर्धारित तिथि को पारम्परिक वेशभूषा में गाजे-बाजे के साथ कूएँ पर लेकर जाती है और कुएँ की तरह परिवार भी भरा रहने की कामना के साथ विधिवत रूप से कुएं का पूजन करती है।

ढूंढ - बच्चे के जन्म की प्रथम होली पर किया जाने वाला संस्कार।

दड़ा परम्परा - शाहपुरा के पास धनोप' गाँव में मकर संक्राति पर सभी जातियों के लोग मिलकर दड़ा खेल खेलते है।

हावणा - प्रसूता का प्रथम स्नान व उस दिन का संस्कार।

विड़दविनायक - मांगलिक कार्यक्रम के समय प्रथम पूजे जाने या स्थापित किये जाने वाले विनायक।

बालूँजो, बालूँडो- प्रथम प्रसव के पश्चात् पिता के घर से मिलने वाला धनसामान, द्रव्य आदि।
मौजिबंधन - यज्ञोपवीत संस्कार या जनेऊ।

रियाण - यह पश्चिमी राजस्थान में खुशी या गम के अवसरों पर निकटस्थ सम्बन्धिों एवं मित्रों के मेल मिलाप हेतु किया जाने वाला प्रमुख आयोजन है। इसमें अफीम की मनुहार विशेष रूप से की जाती है।

सूतक - संतान के जन्म पर गृह परिवार में होने वाला अशौच।

संथा - जैन मत में शरीर त्याग हेतु किया जाने वाला अन्नजल आदि का त्याग।

सगातेड़ौ- मृतक के पीछे किया जाने वाला भोज।

लैण - मृत्यु भोज के साथ सगे सम्बन्धियों को दिया जाने वाला लोटा, बर्तन आदि।

सतवाडो - प्रसव के सात दिन का प्रसूता का स्नान या संस्कार।

सवामणी- इसमें सवा मण कुल 51 किलो सामग्री (आटा, शक्कर, घी, दाल) आदि लेकर
सवामणी सवा यानी दालबाटी-चूरमा या अन्य सामग्री तैयार करके देवताओं को चढ़ाई जाती है जिसे श्रद्धालु प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।

सांवणी - पहले श्रावण मास में वधू के लिए भेजे जाने वाले वस्त्र व खाद्य पदार्थ आदि।

सावळ - कीर जाति में खेत से सर्वप्रथम तोड़कर बहन- बेटी को दी जाने वाली वस्तु।

सावो - विवाह का शुभ मुहुर्त।

सूंज - विवाह के समय दहेज के रूप में व प्रथम प्रसव के बाद विदाई के समयलड़की को दिया जाने वाला वस्त्राभूषण।

सुहागथाळ - भोजन का थान जिसमें कुछ सुहागिन स्त्रियाँ नवागंतुक वधू के साथ भोजन करती है।

सिंझारी - श्रावण कृष्णा तृतीया पर्व तथा उस दिन कन्या या वधू के लिए भेजा जाने वाला सामान।

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सींमतोन्नयन हिन्दुओं के 16 संस्कारों में से तृतीय संस्कार जो गर्भाधान के चौथे, छठे व आठवें मास में होता है।

सोने की निसरनी चढ़ाना - इस रिवाज में अपने वंश की चौथी पीढ़ी के पुत्र प्रप्ति के पश्चात् प्रति माह अपने प्रपौत्र को गोदी में बिठाकर अपने पैर का अंगूठा सोने की निसरनी से छूआता है। रस्म के पूर्ण होने पर स्वर्ण सिढ़ी का सोना बहन-बेटियों में बतौर नेग के बराबर बांट दिया जाता है।

हरवण गायन वागड़ क्षेत्र में (इगरपुर- बासंवाड़ा) में मकर संक्रांति पर गायी जाने वाली श्रवण कुमार की गाथा।

हलाणौ - प्रथम प्रसव के बाद कन्या को दिया जाने वाला सामान या विदाई।

हैड़ी - वह बड़ा भोज जिसमें हर आगंतुक को भोज कराया जाता है।

सीटणा - मेहमानों को भोजन कराते हुए गाए जाने वाले गीत।

जातकर्म संस्कार - यह बच्चे के जन्म पर होने वाले संस्कार में नवजात शिशु को विमलीकृत मक्खन, दही, घी आदि चटाना।

(ब) वैवाहिक रस्में

सामेळा - कन्या पक्ष की ओर सेनगर या गाँव के प्रांगण में दुल्हे या बारातियों का, तोरण पर आने से पूर्व किया जाने वाला स्वागत।

तोरण - मंडपाकार सजावटी बाहरी द्वार। दूल्हा गृह प्रवेश से पूर्व तोरण की रस्म अदा करता है।

बन्दोळी - विवाह के पहले दिन की संध्या को होने वाला कार्यक्रम।

बंदोलो - विवाह के पूर्व वाले दिनों में इष्ट मित्र या सगे सम्बन्धियों द्वारा दूल्हे या दुल्हन को दिया जाने वाला भोज।

बरोटी (बढार ) - विवाह के बाद वधू के स्वागत में किया जाने वाला भोज।

बॉनौ - विवाह की रस्म प्रारम्भ करने का प्रथम दिन।

बागपकड़ाई - दूल्हे की घोड़ी की लगाम पकड़ने का नेक।

साता - विवाह में सगुन के रूप में दी जाने वाली सात सुपारी या सिंगाड़ा।

सोटा सोटी खेलना- एक वैवाहिक रस्म दूल्हा-दुल्हन गीत गाती स्त्रियों झुण्ड के बीच गोलाकार घूमती हरे नीम की टहनी से एक दूसरे को मारते है। दूल्हे के बाद दुल्हन अपने देवर के साथ साटकी खेलती है।

बनावा - पुष्करणा ब्राह्मणों में विवाह की एक रस्म।

हथबोलणो - नवागंतुक वधू के प्रथम परिचय सम्बन्धी एक रस्म जिसमें घर की सब स्त्रियाँ नववधु के साथ भोजन करती है।

हथलेवो - विवाह में वधू का हाथ वर के हाथ में पकड़ाने की रस्म। पाणिग्रहण संस्कार।

हल्दहाथ - विवाह के समय वरवधू के हल्दी लगाने की रस्म।

हीरावणी - ससुराल में नव वधू को दिया जाने वाला कलेवा।

कंवर कलेवी - दूल्हे को तोरण पर कराया जाने वाला स्वल्पाहार (दूल्हे का नाश्ता)।

तिलक प्रथा - वरवधु की सगाई एवं विवाह में प्रचलित प्रथा।

कांकण डोर - विवाह के समय वरवधु के बांधे जाने वाले मांगलिक सूत्र।

बरी - राजपूतों में बारात के साथ वधू के लिए कपड़े आदि ले जाये जाते है।

जात देना - विवाह के दूसरे दिन वर व वधू गाँव में माताजी व क्षेत्रपाल के थान पर नारियल चढ़ाते है।

जात मुकलावा (गौणा)- बाल विवाह होने पर वधू वयस्क होने पर पीहर से दुबारा ससुराल जाती है तब वर व उसके भाई बंधुओं को गहने कपड़े, मिठाई आदि भेजे जाते है।

छात - विवाह में नाई द्वारा किया जाने वाला दस्तूर व इस रस्म पर दिया जाने वाला नेग।

पड़ळी- गणेश पूजन की सामग्री के साथ वर पक्ष की ओर से लाया जाने वाला सामान।

जवाळी - कायस्यों की एक वैवाहिक रस्म।

बांदरवाल - मार्गलिक शुभ अवसरों पर घर के प्रवेश द्वार एवं मंडप आदि पर पत्तों से बनी बान्दरवाल लटकाई जाती है।

जूवाछवी - परात में छाछ भरकर उसमें चान्दी का छल्ला डालकर वरवधु को खेलाया जाने वाला खेल।

पलेटो- विवाह में भांवरी या यज्ञ परिक्रमा ।

जेवड़ी - तोरण पर सास द्वारा दूल्हे को आंचल से बाँधने की एक रस्म।

द्वार रोकाई - एक वैवाहिक रस्म।

पगधोई - शादी के अवसर पर वरवधु के पिता के पांव धोने की प्रथा।

पडजान - गाँव या नगर के बाहरकन्या पक्ष से की जाने वाली बारात आगवानी।

पटरंगणा - विवाहोपरान्त वर व वधू से खेलाया जाने वाला खेल।

खैहटियो विनायक - विवाह के अवसर पर प्रतिष्ठित की जाने वाली गजानन की मिट्टी की मूर्ति।

पहरावणी - विवाह कर विदाई के समय कन्या के पिता की ओर से दिए जाने वाले वस्त्रादि।

खोळ - दुल्हन की झोली भरने की रस्म।

टीको - मंगनी के समय कन्या पक्ष की ओर से दुल्हे को दी जाने वाली भेंट।

नैत बाण - विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर कटुम्बी व रिश्तेदारों आदि द्वारा दिया जाने वाला उपहार ।

(स) मृत्यु की रस्में

उठावणा - मृतक के पीछे तीन या बारह दिवसीय बैठक की समाप्ति।

आदिसराद - मृत्युपरान्त मृतक के पीछे ग्यारवें दिन किया जाने वाला श्राद।

बैकुंठी - यह लकड़ी की होती है जिसमें मृतक को बिठाकर जलाया जाता है।

पगड़ी बाँधना- मृत्यु के बाहरवें दिन मौसर के बाद बड़े बेटे के पगड़ी बांधी जाती है।

पिंडदान - मृतक के पीछे किये जाने वाले पुण्य दान, तर्पण आदि के संस्कार।

गंगाजलूठी - मृतक की अस्थियाँ गंगा प्रवेश के उपरान्त निश्चित समय पर दिया जाने वाला भोज

लांपा - मृतक को दी जाने वाली आग जो प्राय: बेटा या निकट का भाई या भतीजा देता है।

सातरवाड़ा - अंतिम संस्कार के बाद लोग नहाते है और जाजम बिछाकर 12 दिन तक चलते हैं।

घोवण - मृतक की भस्मी नदी या तीर्थस्थान में डालकर सम्बन्धियों को दिया जाने वाला भोज।

कपाल क्रिया - दाह संस्कार के समय शव के मस्तक को क्षत करने की क्रिया।

हुक्का भरने जाना - मृत्यु के बाद सातरवाड़ा में बैठने के लिए जाने को हुक्का भरने जाना कहते है।

फूल चुगना -मृत्यु के तीसरे दिन शमशान में जाकर मृतक की कुछ हड्डियाँ चुनकर लाते है जिसे गंगा में बहाया जाता है।

बखेर - मृतक पर पैसे आदि उछालने की क्रिया ।

पानीवाड़ा - यदि कोई परदेश में मर जाता है और उसकी सूचना आती है तब भाई बांधव किसी तालाब पर जाकर नहाते है।

मूंकाण - मृतक के बाद उसके सम्बन्धियों के पास संवेदना प्रकट करने की क्रिया।

तीयो - मृतक का तीसरा दिन व इस दिन किया जाने वाला संस्कार।

घड़ोटियी, ठींचो- मृतक के 12 वें दिन का भोज।

ओसर, मोसर - मृतक के पीछे किया जाने वाला भोज।

श्राद्ध- पितरों की प्रसन्नता हेतु श्रद्धा से किया जाने वाला कार्य।

जिगड़ी /जीवत महोता - व्यक्ति द्वारा अपने जीते-जी दिया गया मृत्युभोज।

उपरोक्त लेख श्री हरिसिंह रतनू एवम श्री पीएस नागा लिखित पुस्तक "राजस्थान दर्पण" से लिया गया है। सामान्य ज्ञान हेतु यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। हम इस पुस्तक को रिकमेंड करते है।

सादर।