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धरती पुत्री सीता (Dharti Putri Sita | Sita Daughter of the Earth In Hindi)

महाराज जनक मिथिला का राज्य करते थे व उनकी पत्नी का नाम सुनैना था। उनके  कोई संतान नही थी इसलिये दोनों बहुत दुखी और परेशान  रहते थे। एक दिन उनके राज्य में भीषण अकाल पड़ा जिसके कारण सभी धन, जल और  धान्य समाप्त होने की कगार पर आया, प्रजा भूख और प्यास के कारण दूसरे राज्ये में पलायन करने को मजबूर हो गई। राज्य में पड़े भीषण अकाल के कारण महाराज जनक ने ऋषि मुनियो  से सहायता मांगी की जैसे इस विकट समस्या को दूर किया जाय। 

ऋषियों ने उन्हें यज्ञ का अनुष्ठान करने और इसके पश्चात राजा और रानी द्वारा एक खेत में हल चलाने को कहा गया । महाराज जनक ने

ऋषियों की आज्ञा के अनुसार यज्ञ का अनुष्ठान किया व एक खेत में दोनों दम्पति हल चलाने लगे। कुछ देर हल चलाने के बाद उनके हल का एक हिस्सा  भूमि में किसी वास्तु से टकराता है जिससे हल अटक कर रूक जाता है।  यह देखकर राजा जनक ने अपने सिपाहियों को उस स्थल को खोदकर वह पर तलाशी लेने का आदेश दिया। 

जब राजा के  सैनिकों ने उस जगह की  खुदाई की तो उसमे से एक बक्सा निकलता है  जिसमे एक छोटी बच्ची मुसकराती हुई मिलती है । भूमि से निकलने के कारण उसके शरीर पर मिट्टी लगी  हुई  थी । जब राजा जनक ने उस छोटी सी कन्या को देखा तो वे

प्रेम से सराबोर हो गए क्योंकि उनके  कोई संतान नही थी इसलिये उन्होंने इसे ईश्वर का कृपा प्रसाद समझा । उन्होंने उस भूमि  कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर कर ज्येष्ठ पुत्री का दर्जा दिया। उन जनक नामक पिता की पुत्री होने का कारण सीता जानकी कहलाती है।  

हल के निम्न भाग  को सित कहा जाता हैं इसलिये महाराज विदेह  ने उस भूमि कन्या का नाम सीता रखा। इसके बाद सीता कई अन्य नामों जैसे कि भूमिपुत्री, जानकी, मैथिलि, वैदेही इत्यादि से जानी गयी। जिस प्रकार भगवान् श्री राम को विष्णु का अवतार माना जाता है उसी प्रकार सीता को माता लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। 

पद्म पुराण में तो माता

सीता को रावण की पुत्री माना जाता है एक कहनी के अनुसार वेदवती नाम की साध्वी भगवान् विष्णु को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही होती है। जिसको देखकर रावण उसके रूप और लावण्या पर मोहित हो जाता है। लेकिन वेदवती द्वारा उसका प्रतिकार करने पर वह उसके साथ जबरदस्ती करने लगता है जिससे दुखी होकर वेदवती योगाग्नि से अपने शरीर को जलाकर भस्म कर देती है और जाते जाते यह श्राप देती है की वह उसके वंश को नष्ट होने का कारण बनेगी। 

वही वेदवती अगले जन्म में रावण के घर मंदोदरी के गर्भ से जन्म लेती है जिसका रावण को पता होता है इसलिए वह जन्मजात कन्या को समुद्र में फेक

देने का आदेश दे देता है। समुद्र की देवी वारुणी उस कन्या को धरती माता  को सौंप देती है। तदनन्तर राजा जनक के द्वारा इस कन्या को धरती से बाहर निकाल का उसका पालन पोषण किया जाता है। यही कन्या आगे चलकर रावण द्वारा हरी जाती है और रावण के वंश नाश का कारन बनती है।

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