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| On 1 month ago

Dhola Maru

राजस्थान अपनी वीरता एवं शौर्य के साथ ही अपनी लोक संस्कृति हेतु प्रसिद्ध हैं। राजस्थान की लोक संस्कृति में ढोला मारु [ Dhola Maru ] एक प्रामाणिक एवं ऐतिहासिक प्रेमगाथा हैं। ढोला एक राजकुमार था। जिसकी बचपन में शादी राजकुमारी मारु से हुई थी। ढोला एवं मारु के राज्यों के बीच भौगोलिक दुरी बहुत अधिक थी। भौगोलिक दुरी एवं अन्य कारणों से ढोला की दूसरी शादी एक अन्य राजकुमारी मालवणी के साथ हो गई थी। ढोला दूसरी शादी के बावजूद भी अपनी प्रथम रानी मारु को बहुत चाहता था। ढोला अपनी पहली पत्नी से मिलने का बहुत प्रयास करता था लेकिन दूसरी पत्नी मरवण उसके प्रयास सफल नहीं होने देती थी। ढोला के प्रयासों , मारु की विरह वेदना एवं मरवण के प्रेम की यह तिकोन प्रेम गाथा राजस्थान में ही नहीं अपितु पुरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। इस आलेख में आपको पूर्णतया प्राचीन एवं प्रमाणिक ग्रन्थ के आधार पर ढोला मारु की कथा को बताया जा रहा हैं।

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1 Dhola Maru love story | ढोला मारु प्रेम कहानी

Dhola Maru love story | ढोला मारु प्रेम कहानी

"ढोला-मारू" व "महेंद्र-मूमल" की प्रेमगाथा राजपुताना की आत्मा है। इन प्रेम कहानियों से राजस्थान का लोक संगीत अमर हुआ है। कवि कुशलदास की इस कृति को एक बार पढ़ने से ही आत्मिक सुख की प्राप्ति सम्भव है। आप इसे पढ़े व इस प्रेमरस से परिपूर्ण महागाथा का सुख प्राप्त करे।

Start of Dhola Maru story | ढोला-मारू प्रारम्भ कथा

अथाह मरुस्थल-

अथाह रेत राशि, तपता सूर्य, प्यासे कंठ, एकाकी खेजडी वृक्ष, तीव्रगामी ऊंट, रणबांकुरे जवान, रूपसी नारियाँ, कालबेलिया नृत्य, गर्वीले गढ, बिखरी हुई ढाणियाॅ, कुरजां, गोडावण, उज्ज्वल संस्कृति और ढोला -मारू की पवित्र प्रेम कहानी समेटे हुए शौर्यवान राजस्थान अपनी एक अनूठी पहचान रखता है।

वीरता व सतीत्व की भूमि-

वीर भूमी राजस्थान जिसे स्वतन्त्रता से पूर्व राजपुताना कहा जाता था ,अपने सीने में अथाह राष्ट्रप्रेम के साथ ही एक धडकता हुआ दिल भी रखता है। राजपुताना की वीरता का कायल सम्पूर्ण विश्व रहा है जिसके वाशिंदों ने प्रतिकुलतम परिस्थितियों में भी अपना सर किसी आक्रान्ता के समक्ष कभी झुकने नही दिया। यहाॅ वीरता को आभूषण और सतीत्व को जीवन मूल्य समझा जाता है।

स्वर्ग समान भूमि-

जेठ की तपिश के पश्चात् जब सावन की बूंदे मरूभूमि पर मोतीयों सी बिखरती है तो यहां की मिट्टी की खुशबू और प्रकृति का सौन्दर्य स्वर्ग का आभास देता है।

वीर प्रसूता भूमि-

वीरों,वीरांगनाओं, सन्तों, सतियों की इस परम पावन भूमि के धडकतें दिलों में कई प्रेम कहानियाॅ दफन है। लाज, मर्यादा और आज्ञा नें प्रेम के ज्वार को किनारों तक सीमित रखा । इस वीर प्रसूता जन्म भूमि को मानव जाति का सलाम।

गौरवमयी इतिहास-

इस पवित्र धरा जिस पर देवी देवता भी आकर स्वयॅ को गौरान्वित महसूस करतें है जिसकी आगोश में कभी महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड, पृथ्वीराज चैहान, गौरा-बादल, हमीर जैसे अनगिनत सूरमाओं ने अपनी तलवार की क्रोध से विश्व मण्डल को आलोकित कर चिर निद्रा में विश्राम कर रहें है, जिसकी फिजाओं में आज भी भक्त शिरोमणि मीरा बाई के पवित्र भजन गुंजित है, जिसके रेत के विशाल धोरों पर आज भी चान्दनी रातों में बिखरती चन्द्र किरणें ढोला और मारू के दर्शन को तरसती है।

तीर्थराज पुष्कर-

इस पवित्र प्रेम कथा की शुरूआत सदियों पहलें तीर्थराज पुष्कर से आरम्भ हुई जो अब मूर्तिकारों की मूर्तियों मे, चित्रकारों के सजीव चित्रों में, शिल्पकारों के शिल्प लेखो से और विद् कवियों के काव्य में रसती बसती हम तक पहूॅंची है। इस प्रेमकथा की प्रस्तुति से पूर्व हम प्रथम पुज्य श्री गजानन्द जी को व माता सरस्वती को नमन कर प्रार्थना करते है कि हम उनके आषीर्वाद से कथा के मर्म को पहचान सकें।

आभार-

इस प्रेम कथा के कथन से पूर्व हम कवि कुषललाभ, नरेश महाराजा मानसिहं जी, राजकुमार हररा, श्री रामसिहं, श्री सूर्यकरण पारीक, श्री नरोत्तम दास स्वामी, डाॅ. रूकमणी वैश्य, श्री राजलाल मणि, आसुलाल जी सभी का हृदय की गहराईयों से सम्मान अभिव्यक्त करते है क्योंकि आप सभी के अमूल्य सहयोग के लिए हम समस्त पाठक आभारी है।

Marriage of Dhola Maru | ढोला - मारू (मारवणी) का बाल विवाह

परिवार परिचय-

वर्तमान राजस्थान को प्राचीन समय में राजपुताना व अति प्राचीन समय में मरूधर प्रदेश के नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस प्रदेश का विस्तार थार मरूस्थल की दूर दराज सीमाओं तक विस्तृत था। इस रेगिस्तानी भू-प्रदेश पर अनेकनेक युद्ध वीर शासकों ने शासन किया व अपनी सीमाओं की सुरक्षा व विस्तार को सुनिश्चित किया। वीर शासकों की इस श्रृखॅला में इस राज्य में पिंगलराय नामक राजा राज्य करता था। इस दानवीन राजा की अतीव सुन्दरी पत्नी का नाम उमादेवडी था जो कि जालोर राज्य के प्रतापी नरेश सांवतसिहं देवडा की प्रिय पुत्री थी।

मारू का जन्म-

इस वीर शासक ने इस तपतें रेगिस्तान प्रदेश की शुधा तृप्ति हेतु सिंध नदी से नहरे निकालकर प्रजाजनों हेतु जल प्रबन्धन किया। पिंगलराय की पटरानी उमा देवडी अप्सरा के समान सुन्दर नारी थी। शुभ समय आने पर पटरानी उमा देवडी के गर्भ से पुत्री रत्न का जन्म हुआ। पुत्री का जन्म होने पर वीरा राजा पिंगल व उनकी पटरानी की सभी मनोकामनाएॅ पूर्ण हो गई। पुत्री जन्म पर सम्पूर्ण मरूधर प्रदेष में आनन्दोत्सव आयोजित हुए, बधावें आयोजित किए गए और घर-घर में मंगलाचार होने लगे।

राजा पिंगल की यह कन्या सौन्दर्य में रम्भा नाम अप्सरा के तुल्य थी उसकें तन में व्याप्त सुगन्धि के कारण सभी लोग उसे पद्मिनी कहने लगें। राज ज्योतिषी के मतानुसार इस अतीव सुन्दर बालिका का सुनाम “मारवणी” रखा गया। इस सुन्दर कन्या के रूपपाश में बन्धे सगे सम्बन्धी व नजदीकी जन उसे प्यार से “मारू” कह कर सम्बोधित करने लगें थें।

मारू के जन्मोत्सव के आयोजन के पश्चात् सभी प्रजाजन सुखपूर्वक जीवन यापन कर रहें थे तभी वर्षा न होने के कारण पुंगल में कठोर दुर्भिक्ष पड गया। थार मरूस्थल की आगोश में बसे इस प्रदेश में पडे दुर्भिक्ष के कारण लोग पलायन हेतु मजबूर होने लगे। प्रकृति पर किसी का जोर नहीं होता अन्ततः वीर राजा पिंगल ने पण्डितों से सलाह कर अल्प समय हेतु राजधानी के त्याग का निर्णय किया। अपने विश्वासपात्र सहयोगी दाऊद खाॅ द्वारा प्रस्तावित सजल प्रदेष “पुष्कर” की तरफ राजा पिंगल ने विश्वस्त सहयोगियों, परिवार जनों, पशुधन व आवश्यक सामग्री सहित प्रस्थान किया।

नन्हीं राजकुमारी मारू अपने परिजनों के साथ पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ पुष्कर के सजल क्षैत्र की उतम जलवायु में बाल किलोल कर सुखमय समय व्यतीत करने लगी।

ढोला का जन्म-

अतीव सुन्दरी “मारू” के प्रदेश मरूधर के सुदूर प्रदेश नरवरगढ में राजा नल का आधिपत्य था। इस यशस्वी शासक का सैन्य बल, उसका शौर्य व त्याग अतुलनीय था। राजा नल के कोषागार अष्ट सिद्धियों व नव निधीयों से परिपूर्ण थे। उसकें राज्य की सीमाएॅ अतयन्त व्यापक थी। ऐसे वीर प्रतापी राजा के सुशासन मे सभी सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे परन्तु इस वीर राजा के कोई सन्तान नहीं थी और यह चिन्ता उसे दिनरात सताती थी। सन्तान प्राप्ति हेतु राजा नल ने हर सम्भव प्रयास किए। यज्ञ, तप, जप, उपचार ज्योतिष, धर्म सभी का सहारा लिया। एक बार सुदूर प्रदेश से आए एक सिद्ध पुरूष ने राजा की मनोदशा को जानकर उन्हें धर्मानुसार संकल्प करवाया कि सन्तानोप्राप्ति पश्चात् राजा सकुटुम्ब पुष्कर की पवित्र यात्रा करेंगे।

राजा नल के सुकार्याे के परिणामस्वरूप व सिद्ध पुरूष के द्वारा दिलवाए गए संकल्प के पश्चात् प्रभु की असीम अनुकम्पा से राजा नल के यहाॅ पुत्र का जन्म हुआ। राजा नल के आनन्द की कोई सीमा नहीं थी। सम्पूर्ण नरवरगढ को दुल्हन की तरह सजाया गया। हर दिशा में आनन्दोत्सव आयोजित हुए व नाना विधि मंगल कार्य सम्पन्न किए गए।

ज्योतिषाचार्याे व राजपण्डितों की सलाह पश्चात् राजकुमार का नाम “साल्ह कुमार” रखा गया। साल्ह कुमार अतयन्त सुन्दर व सुहावना शिशु कुमार था। उसके अप्रतिम सौन्दर्य के कारण परिवाजन उसे स्नेहवश “ढोला” नाम से पुकारने लगें। यह शिशु अपनी बाल्यावस्था में प्रतिदिन सौन्दर्य मे वृद्धि प्राप्ति करने लगा एवम् सौन्दर्य के देवता “कामदेव” के अवतार सा प्रतीत होने लगा। समय व्यतीत होने लगा व नन्हाॅ सा राजकुमार तीन वर्ष का बालक होने लगा।

राजा ने सिद्ध पुरूष के आदेशानुसार लिए संकल्प को पूरा करने हेतु पुष्कर राज की यात्रा व दर्शन करने का निर्णय लिया। कुल परम्परा के अनुसार प्रतापी राजा नल को मान मर्यादा अनुसार यात्रा संघ का निर्माण किया गया। इस संघ में सैकडों घोडे, ऊॅट, सशस्त्र सेना, निजी सेवको के साथ परिवार यात्रा का शुभारम्भ नियत समय पर प्रारम्भ किया गया। इस एक माह से लम्बी यात्रा का समापन पुष्कर पहॅुच कर हुआ। यहाॅ राजा नील ने सर्वप्रथम “आदि वराह” का पूजन किया एवम् ततपश्चात सभी देवी देवताओं का पूजन किया।

पवित्र भूमि पुष्कर राज पर पहुॅंच कर राजा नल व उनके सभी सह तीर्थ यात्रीयों ने अतीव आनन्द की अनुभूति प्राप्त की। सावन के प्रारम्भ का समय होने के कारण मौसम अतयन्त सुहाना व मनो-भावन था। राजा नल ने मौसम के मिजाज को देखते हुए पिंगल राजा के डेरे के पास ही अपने सहयात्रियों हेतु डेरा डालने का हुक्म दिया। कुछ समय पश्चात् ही उतर दिशा मेें बादल उमडने-घुमडने लगे। चारों दिशाओं में गर्जना के साथ बिजलीयाॅ चमकने लगी और मोरों ने पंख फैलाकर मण्डलाकार नृत्य शुरू कर दिए।

"घण उनमयड उतर दिसइ, जयणे गरज्यो घोर।

छह दिसी चमकै दामिणी, मंडर मंडव मोर।।"

ढोला-मारू के परिवार का मिलन-

राजा पिंगल व राजा नल दोनों ही बडे वीर योद्धा व विशाल साम्राज्य के अधिपति थे। वे दिन रात एक साथ मिलकर क्रिडा-कौतुक करने लगे तथा दोनो ही शिकार इत्यादि राजसी खेल साथ खेलते हुए एक दूसरे के मित्र बन गए। एक दिन राजा नल शिकार का पीछा करते हुए राजा पिंगल के खेमें में पहुॅच गए उन्होने संयोगवष अतीव सुन्दरी रानी उमा के निजी कक्ष में पालणे (झूले) पर सोती हूई मारवणी को देखा। इस अद्वितीय सुन्दर बालिका के दर्शन से उनके मन में एक सुन्दर विचार का उदय हुआ। राजा नल अपने राजकुमार साल्ह कुमार के लिए पिंगल नरेश की पुत्री मारवणी का हाथ मांगने हेतु प्रस्ताव लेकर पिंगल राय के पास पहॅुचे। राज नल द्वारा उनका भव्य स्वागत किया गया। भोजनोपरान्त जब दोनों चौपड़ खेलने के लिए आमने सामने बैठे। इस सुअवसर पर राजा नल के अमात्य (मन्त्री) ने प्रस्ताव किया और निवेदनपूर्ण स्वर में दोनों राजाओं से आव्हान् किया कि आप दोनो के पारस्परिक प्रेम को सम्बन्धों में बदलने का यह उचित समय है यदि दोनो राज परिवारों मेे सगाई-विवाह सम्बन्ध हो जाए तो उतम रहेगा।

राजा नल ने अपने पुत्र के लिए मारवणी के सगाई प्रस्ताव को राजा पिंगल ने स्वीकार कर लिया व दोनों ने मारवणी व ढोला का विवाह करने पूर्ण निश्चय कर लिया।

राजा पिंगल ने अपने डेरे पर पहॅुच कर अपनी प्राण प्रिय पटरानी उमा देवडी को बुलाया व मारवणी को दुलारते हुए अपनी पत्नी को राजा

नल के साथ हुई वार्ता का सम्पूर्ण ब्यौरा दिया। यह सुनकर महारानी चिंतन में डूब गई और उसने निवेदन किया कि राजन हमारे इस एकमात्र पुत्री रत्न का विवाह आपने पिंगल से सैकडो कौस दूर नरवरगढ में सुनिश्चित करके मानों उसे समुन्द्रों पार हम सभी से हमेशा के लिए दूर कर दिया है। राजा पिंगल के विचार मग्न अवस्था में कहा कि प्रभु द्वारा नियत भाग्य की रेखा को टाला नहीं जा सकता है, राजा नल प्रतापी राजा है तथा उनके प्रस्ताव का सम्मान रखना मेरा फर्ज था, आगे जो मारवणी के भाग्य में लिखा होगा वही होगा।

ढोला-मारू का विवाह-

विवाह का मुहुर्त तय कर दिया गया। दोनों राजाओं के दलों ने विवाह मण्डप को सजाया। तोरण और बंदनमाल बांधे गए और रीति-रिवाजों का विवाहोत्सव सम्पन्न हुआ। शुभ घडी और शुभ मुहुर्त में लगन की सभी विधियाॅ पूर्ण की गई। मंगलाचार के पश्चात् मांडी गई चॅवरी मे विवाह सम्पूर्ण होने के पश्चात् सभी बाराती व स्नेहजनों ने एक दूसरे के गले मिलकर बधाईयों का लेन-देन किया।

माता-पिता ने उन दोनों का ग्रंथिबंधन किया और पुष्कर तीर्थराज में ही यह विवाह सम्पन्न हुआ। मांगलिक गीतों, वाद्य यन्त्रों, संगीत, गायन व नृत्य ने सम्पूर्ण परिवेष को मानो चहॅु दिशा में सजा दिया।

वर्षा ऋतु समाप्त होने लगी तथा शरद् ऋतु का आगमन होने लगा। देश काल और परिस्थिति का विचार कर दोनों पक्ष वालो ने अपने प्रदेश को लौटने की मानसिकता बनाई और वे प्रस्थान की तैयारियाॅ करने लगे। नल राजा ने अपने राज पुरोहित के साथ राजा पुगल को प्रस्ताव भिजवाया कि वे राजकुमारी मारवणी को उन्ही के साथ नरवरगढ जाने हेतु पुष्कर से ही विदाई प्रदान करे परन्तु पिंगल राय ने ससम्मान यह उतर भिजवाया की मारवणी अभी अबोध बालिका हैं अतः उसका फिलहाल माता-पिता के साथ रहना उचित है। अभी उसे पीहर में ही रहने दिया जाए। कुछ वर्षो पश्चात् जब वह युवा हो जाएगी तब आप राजकुमार साल्ह कुमार को पितृगृह से राजकुमारी मारवणी को ससुराल ले जाने हेतु हमारे राज्य भिजवा दिजीएगा। उस समय हम ससम्मान राजकुमारी को राजकुमार के साथ विदा कर देंगे।

दोनों पक्षों ने एक दूसरे से विदाई मांगी और राजा नल अपने पुत्र के साथ नरवरगढ व राजा पिंगल राय अपनी पुत्री मारवणी के साथ अपने राज्यों की तरफ लौटने लगे। पुंगल के राजा पिंगल राय शीघ्र ही अपने राज्य पहुॅच गए परन्तु नरवरगढ पुष्कर से बहुत दूर था।

ढोला के पिता के ह्रदय में संशय-
राजा नल ने अपने पुत्र के साथ नरवरगढ की यात्रा आरम्भ कर दी। राजा पिंगल राय से दूर होने के पश्चात् राजा नल के मन में अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न होने लगे।

अलगी भूमि न कोपरी लहइ। वार धार पंथी न विवहइ।
समाचार नवि सोझ न कोई। अलगइ सगयण इण परि होई।।

राज नल सोचने लगे कि उन्होने अपने एक मात्र पुत्र का विवाह उनके राज्य से अतयन्त दूर अलग-थलग से राज्य पुंगल में कर दिया है। हमारे राज्य से पुंगल राज्य जाने हेतु कोई सीधा मार्ग भी नहीं है। पुंगल प्रदेष से हमारे यहाॅ कोई पथिक भी आता जाता नहीं है। ना ही कोई वहाॅ की खोज खबर ही आती है। जब उनका पुत्र साल्ह कुमार “ढोला” युवा होगा। इस लम्बी राह में उसे अनेको खतरे उठाने होंगे और दुश्मन राज्यों की सीमाओं से निकलना होगा। यह स्थिति राजकुमार, राज्य और उनकी सेनाओं के लिए परेशानी उत्पन्न करने वाली होगी।

इसी प्रकार के विभिन्न विचारों ने तथा पुत्र मोह में पडे राजा को विचलित कर दिया। राजा नल ने अपने प्रधान सामन्तों को सम्मलित करते हुए विभिन्न कार्याे हेतु इधर-उधर भिजवा दिया और राजा स्वयं के साथ छोटा दल लेकर मालव देश पहुॅच गए।

Second Marriage of Dhola | ढोला का द्वितीय विवाह-

मालव देश का राजा भीमसेन था। राजा भीमसेन ने प्रतापी राजा नल का भव्य स्वागत किया। मालव देश मे कुछ समय तक रूक कर राज नल के समक्ष प्रस्ताव रखा कि उनके पुत्र साल्ह कुमार “ढोला” का विवाह राजा भीमसेन की पुत्री मालवणी के साथ करना सभी दृष्टियों से उतम रहेंगा।

ढोला-मालवणी विवाह-

राजा भीमसेन ने राजा नल के प्रस्ताव को स्वीकार कर अपनी अतयन्त सुन्दर राजकुमारी मालवणी का विवाह राजा नल के पुत्र साल्ह कुमार के साथ निश्चित कर दिया। दोनों राजाओं ने प्रमुख सामन्तों को बुलावा भिजवाया और शुभ मुहुर्त में राजकुमार साल्ह कुमार और मालवणी का विवाह धूमधाम से सम्पन्न कर दिया। दोनों राजाओं ने इस विवाह में विपुल धनराशि का व्यय किया और दोनों राजा इस सम्पन्न विवाह से अति प्रसन्न हुए।

राजा भीमसेने ने अपनी पुत्री के नेग में राजा नल को अनेक हाथी, घोडे व गाॅव भेंट दिए। इस प्रकार राजकुमार साल्ह कुमार का दूसरा विवाह शक्तिशाली मालव नरेश की पुत्री मालवणी के साथ सम्पन्न हो गया।

समय व्यतीत होने के साथ राजकुमार साल्ह कुमार युवा होने लगे और उनकी अंतरगता अपनी सुन्दरी पत्नी मालवणी के साथ बढने लगी। मालवणी का प्रेम ढोला के साथ जुड गया। उसने अपनी चतुराई व रूप से राजकुमार साल्ह कुमार का मन जीत लिया।

ढोला का विस्मरण-

ढोला इस बात को भूल चुका था कि उसका प्रथम विवाह मारवणी के साथ सम्पन्न हो चुका है, मालवणी को मन चाहा पति मिल गया था, दोनों सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। इस प्रकार वर्ष बीतते गए और मालवणी को अपने पति साल्ह कुमार के प्रेम पर एकाधिकार स्थापित होने लगा। ढोला बाल्यकाल में सम्पन्न हुए अपने प्रथम विवाह को भुल चुका था और राज्याज्ञा के कारण इस प्रथम विवाह को जानने वालो ने भी ढोला को इस बारे में कभी नही बतलाया।

जे परणऊ मारू संघात। ढोलउ तेह न जांणइ वातं।
पूगल दिसस न आवइ कोई। मारवणी री निरती न होई।।

ढोला अपनी वधु के साथ सुखपूर्वक सानन्द जीवन जीने लगा और उससे सैकडों दूर पूंगल प्रदेश की राजकुमारी मारवणी भी युवावस्था का प्राप्त होने लगी।

यह विधि का विधान है कि मनुष्य समस्त संसार से लड सकता है लेकिन प्रारब्ध से नहीं। मारवणी अपने गृह राज्य पुंगल में बालपन से युवावस्था में प्रविष्ट हो चुकी थी। उसके रूप सौन्दर्य की चहॅु दिशा में गुणगान होने लगा था। उसे ना तो अपने बाल विवाह की जानकारी थी ना ही उसे अपने साल्ह कुमार के दूसरे विवाह का भान था।

‘प्रथम अध्याय समाप्त’!!

Dhola Maru and Malwani ढोला मारू विस्तार कथा-

ढोला-मालवणी का गृहस्थ जीवन-

ढोला का विवाह राजकुमारी मालवणी के साथ सम्पन्न होने के पश्चात् दोनों सुखपुर्वक जीवन यापन करने लगें। ढोला अपने प्रथम विवाह के बारे में भुल चुका था । विवाह के समय वह मात्र तीन वर्ष का अबोध बालक था।

घोड़ों का सौदागर-

सुख के पल पलभर में गुजर जातें है विरह की बेला गुजारे नहीं गुजरती। घोडों का सौदागर नरवरगढ आया, उसकें तीव्रगामी अश्वों ने ढोला को दीवाना बना दिया। घोडो के सौदागर से उसकी मित्रता हो गई। सौदागर ने ढोला के साथ पाॅच माह बिताए और श्रेष्ठतम घोडो को ढोला को नजर कर वह प्राप्त राशि के साथ अपनी अगली मन्जिलों की तरफ बढा।

सौदागर घूमते-घूमते पूॅगल देश पहुॅचा और उसने बडे-बडे धनिकों, ठाकूरों और उमरावों के समक्ष अपने तीव्रगामी घोडों का प्रदर्शन आरम्भ किया। सौदागर का सामना पूॅगल में एक सोने के समान कांतिमय , खंजन पक्षी के समान नेत्रों वाली, कोमलांगी, अतीव सुन्दरी से होने पर जब उसने लोगों से जानकारी चाही तो उसे पता चला कि यह सुन्दर कन्या पिंगल राजा की राजकुमारी मारवणी है और इसका विवाह नरवरगढ के राजकुमार साल्ह कुमार ‘ढोला’ के साथ पुष्कर में सम्पन्न हुआ है।

सौदागर द्वारा मारू को सच्चाई बतलाना-

सौदागर के हृदय में उस अपूर्व सुन्दर कन्या के प्रति करूणा का सागर उमड पडा कि यह सुन्दर कन्या यहाॅ अपने पीहर में है, और राजकुमार साल्ह अपने देश में है। राजकुमार साल्ह उसका मित्र था और समस्त गुणों से युक्त अद्वितीय वीर युवा है तथा मारवणी भी अतीव सुन्दरी है दोनों का बाल्यकाल में विवाह हो चुका हैं परन्तु दोनों के मध्य सैकडों योजन की दूरी है। सौदागर ने मारवणी के समक्ष राजकुमार साल्ह कुमार के गुण सौन्दर्य के साथ उसके दूसरे विवाह का वृतान्त प्रस्तुत कर दिया।

मारू की विरह-वेदना-

मारवणी अपने विवाह और पति के बारें में जानकर राजकुमार साल्ह के विचारों में गुम हो गई। मारवणी को चहुँ ओर ढोला के अलावा कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। पपीहे की ‘पिऊ’‘पिऊ’ की रट उसके हृदय में ढोला से तुरन्त जा मिलने हेतु आतुर करने लगी। उतर दिशा से बढते बादल आकाश को गुंजित करने लगे, दसो दिशाओं में बिजलीयाॅ चमकने लगी व मदमस्त मोर अपने पंखों को मण्डालाकार में फैलाकर नृत्य करने लगे। मारवणी पति के प्रेम में प्रकृतिमय होकर कुरजाॅ पक्षी के झुण्डों से वार्तालाप करने लगी व अपने प्रेम निवेदन को अपने पति तक पहुँचाने के लिएॅ कुरजाॅ से निवेदन करने लगी।

मानस ह्वाते म्हैं कहां, म्है छां कुडकडियां।
प्रीथ सन्देस्यउ पाववइ, तउ लिख दै पंखडियां।।

कुरजां-मारू सम्वाद-

कुरजां पक्षी प्रिय मरवणी के प्रेम निवेदन को सुनकर सजल नैनों से कहने लगी कि प्यारी मारवणी यदि हम मनुष्य होती तो तुम्हारा संदेशा ढोला को जाकर कहती परन्तु हम तो पक्षी है तुम चाहो तो अपना सन्देशा हमारी पंखुडियों पर लिख दो। अचानक चले किसी तीर से कोलाहल के कारण सभी कुरजाएॅ उड गई।

मरवणी प्रेम विह्ल होकर सौदागर से अपने प्रिय ढोला के बारे पूछती रही और सौदागर अपने प्रिय मित्र ढोला के रूप, सौन्दर्य, वीरता, सद्गुणों की खान से रत्न आभूषण निकाल-निकाल कर मारू के हृदय के उल्लास को बहुगणित करता गया।

प्रेम रंग में सरोबर मारवणी को जब प्रिय मिलन के मध्य सैकडों योजन की दूरी का भान हुआ तो विरह वेदना की तीव्र ज्वाला में उसके व्यथित हृदय ने उसके मृग समान नयनों को अश्रुओं से सरोबर कर दिया। प्रेम दिवानी मारू ने स्वयं को स्वयं तक सीमित कर दिया व अपने संगी साथियों, अनुचरो, सेविकाओं से दूरी स्थापित कर ली।

मारु की वेदना-

मारवणी की माता उमा देवडी ने जब पुत्री की विरह वेदना का संज्ञान लिया तो उसने पूंगल नरेश के समक्ष अपनी प्रिय पुत्री मारवणी की दशा का वर्णन किया। मारवणी की माता ने बताया कि बाल्यावस्था में हुए विवाह ने युवा मारवणी को हृदय के अन्तरतम तक को प्रेममय बना दिया है व उसके होंठों से उसकी पीडा दोहों के रूप में उजागर होने लगी है।

ढोला की माता द्वारा मालवणी को उपालम्भ-

एक तरफ मारवणी पति के विछोह में वेदनायुक्त पल पल बिखर रही थी वहीं दूसरी तरफ उसका पति साल्ह कुमार ‘ढोला’ अपनी प्रिय रानी मालवनी के साथ सुख पूर्वक जीवन उपभोग कर रहा था। एक समय जब साल्ह कुमार व मालवणी प्रेम वार्ता में रत थे तभी साल्ह कुमार की माता चम्पावती ने उनके महल में प्रवेश किया। मालवणी को उसका भान तक नहीं हुआ और भान होने पर वह विलम्ब से अपनी सासु के स्वागत हेतु प्रवेश द्वार पर उपस्थित हुई और सासु माता को अभिवादन पश्चात् आशीर्वाद मांगा तो सासु ने भी आशीर्वाद देने में विलम्ब किया। सासु द्वारा किए विलम्ब ने मालवणी के मन मे अंहकार उत्पन्न किया। सासु चम्पावती ने इस अंहकार को पहचान ताना दिया की यदि साल्ह कुमार की पहली पत्नी मारवणी यहां होती तो कतई विलम्ब व अंहकार नहीं करती।

सासु चम्पावती के ताने से मालवणी को अपने पति के प्रथम विवाह का ज्ञान हुआ तथा उसने तथ्यावेषण में पाया कि मारवणी जो कि पूंगल नरेश की पुत्री व साल्ह कुमार की प्रथम ब्याहता है, रूप सौन्दर्य में उससे कहीं अधिक हैं। मारवणी के सौन्दर्य के ज्ञान ने मालवणी के हृदय में शंका के बीज बो दिए और उसके मन मे डाह का जन्म हो गया। वह अपने सुन्दर भविष्य में मारवणी को दुःस्वप्न के रूप में देखने लगी। अपने प्रेममय वार्ता के मध्य राजकुमार साल्ह से एक वचन किया की पुंगल प्रदेश से आने वाली राह पर स्वामित्व मालवणी को होगा, तथा इस राह की सुरक्षा व कर व्यवस्था उसके अधीन रहेगी।

मालवणी की सावचेती-

साल्ह कुमार ने अपनी रूपसी पत्नी को वचन दिया और तदनुसार पुंगल मार्ग से आने वाला प्रत्येक पथिक रानी मारवणी के विश्वस्त सिपाहियों व गुप्तचरो की निगरानी में प्रवेश पाने लगे।

पूंगल से आने वाले निष्फल संदेशे-

पूंगल नरेश पिंगल ने अपनी पुत्री की विरह वेदना को जानने के पश्चात् नरवरगढ को समाचार भिजवाए कि बाल्यावस्था में सम्पन्न विवाह के अनुसार अब राजकुमार साल्ह को पूंगल आकर अपनी पत्नी को विदा कराकर ले जाना समयोचित है।

राजा पुंगल के द्वारा भेजे जाने वाले दूत को मालवणी के गुप्तचर पहचानकर उसके सन्देश को एवम सन्देशवाहक दोनों को सदा के लिए मिटा देते। समय गुजरने लगा। नरवरगढ भेजे गए संन्देशो का प्रत्युतर नहीं आने तथा दूतों के भी वापस नहीं लौटने से राजा पिंगल राय के मन में अनेक आशंकाओं को जन्म दे दिया।

राजकुमारी मारवाणी अपने स्नेहिल ढोला की याद में दिन-प्रतिदिन रत रहने लगी व अपने हृदय के उद्गारों को अपने दोहों, काव्यों में सजोते हुए अपने सन्देशो विभिन्न माध्यमों यथा - वर्षा, ऋतु, पक्षी, पथिक, व प्रकृति के माध्यम से भिजवाने की चेष्टा करने लगी, उसके हृदय में विरक्ति का भाव स्थायी रूप धारण करने लगा।

संगीतज्ञ ढाढ़ीयों की मदद-

राजा पिंगल ने अपना सन्देश नरवरगढ भिजवाने हेतु अन्ततः ढाढियों (एक जाति विशेष) की सहायता ली। ढाढिगण अपने गायन व त्वरित बुद्धिमता हेतु प्रसिद्ध रहे है। ढाढियों ने मारू द्वारा रचित दोहों का याद कर नरवरगढ की यात्रा आरम्भ की। नरवरगढ पहुँचने पर जब वे मालवणी के सैनानियों द्वारा गिरफ्तार हुए तो उन्होंने त्वरित बुद्धि का परिचय देकर अपनी पहचान छुपा कर भाषा बदल ली। ढाढियों ने कैद से मुक्ति पाकर पिंगल के पूर्व परिचित भाऊ भाट के यहाँ डेरा बनाया। ढाढियों ने भाऊ भाट को राजा पिंगल राय द्वारा प्रदत भेंट व सन्देश सुपुर्द किया। भाऊ भाट बडा चिंतित हुआ और उसने ढाढियों से कहा की वह उचित समय पर उनकी मुलाकात साल्ह कुमार ‘ढोला’ से करवा देगा। ढाढियों ने एक कुम्हार के घर गुप्त निवास तय किया।

एक दिन जब मालवणी वन विहार हेतु अपनी सखियों के साथ राजधानी से बाहर गई हुई थी तब भाऊ भाट ने ढोला को सब बाते बताकर ढाढियों को उनके समक्ष प्रस्तुत किया। ढाढी 36 रागों में निष्णात जाति थी। इन्होनें साल्ह कुमार के समक्ष अपने सुमधुर गायन में ‘ढोला -मारू’ चित्रण किया, भाऊ भाट ने साल्ह कुमार को सम्पूर्ण तथ्यों से अवगत करवाया।

मरवणी सइ मुखि कहा, इहा मिसि सन्देष।
जै मारू मिलिया करउ, पउ पधारऊ उणि देष।।

भाऊ भाट की मदद-

भाऊ भाट द्वारा लाए गए ढाढियों के सन्देश का सार है कि ‘हे ढोला, मारवणी ने दोहों के बहाने स्वयं अपने मुख से आपके पास अपना सन्देशा भिजवाया हैं। यदि आप उससे मिलन चाहों तो उसके देश पधारिए’

उक्त सन्देश देकर ढाढियों ने साल्ह कुमार से प्रस्थान की आज्ञा माॅगी और कहा की हम आप आज्ञा दीजिए नहीं ता यहां मालवणी को पता चला तो, वह हमें जिन्दा जलवा देगी और यदि हम आपका प्रत्युतर लेकर समय पर पुंगल नहीं पहुॅचे तो, वहाॅ मारवणी जिन्दा अग्नि का वरण कर लेगी।

ढोला ने मारवणी के लिए आभुषण तथा ढाढियों को पुरस्कृत कर शीघ्र आने का वचन देकर ढाढियों को विदा किया तथा सारे वृतान्त को गुप्त रखा। भाऊ भाट नें ढोला का सन्देशा लेकर ढाढियों के साथ ही पूूंगल प्रदेश हेतु प्रस्थान किया।

जब भाऊ भाट पूंगल पहुंचा तो उसने मारवणी को राजकुमार ढोला का सन्देषा पहूॅचाया।

भाऊ भाट संदेसडो, मारवणी कहियाह।
ढोलऊ मारूउ उमह्याड, तू साई मिलियाह।

ढोला का सन्देशा पाकर मारवणी को ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे ढोला स्वयॅ ही उससे मिलन के लिए उपस्थित हो गया है।

कुमोदणी जल मइ वसइ, चंदऊ बसइ अकास।
जे जांहि कर मनि वसअइ, ते त्यांहि कइ पासि।।

ढोला व मारू को जब एक दूसरे का सन्देशा मिला तो उनके मध्य की सैकडों योजन दूरियाॅ मानों मिट सी गई। जैसे कुमुदिनी जल में रहती है लेकिन चन्द्रमा आकाश में विचरण करता है किन्तु वे दोनों को दिलों जाने से चाहते है व उनके प्रीति पथ में दूरियाॅ कोई महत्व नहीं रखती है।

ढोला का सन्देशा पाकर मारू का प्रति पल गुजरना दुष्कर होने लगा वहीं ढोला का चित्त भी नरवरगढ से सैकडों योजन दूर पूंगल प्रदेष में मारू के पास विचरण करने लगा। ढोला पूंगल प्रदेश शीघ्रताशीघ्र पहुॅचने की कामना करने लगा।

मालवणी को मारू से सौतिया डाह-

जब मालवणी वनविहार पश्चात् पुनः अपने महल में लौटी तो उसने अपने प्रियतम ढोला को उदास देखा , ढोला की अनायास उदासी ने मालवणी के कोमल हृदय में अनेक प्रश्नों व आशकाओं को जन्म दिया। मालवणी ने शनैः-षनैः ढोला की उदासी का कारण जानना चाहा परन्तु ढोला के मुखारविन्द से एक शब्द नहीं फूटता था।

अन्ततः मालवणी के समक्ष ढोला की उद्धिग्नता का राज नाई के द्वारा उद्घाटित हुआ। नाई ने मालवणी को भाऊ भाट द्वारा की गई घात को मालवाणी के समक्ष प्रकट किया।

मालवणी अपने मन में आशकित हो गई और ढोला के हृदय को वह समझ गई कि उसके हृदय में क्या है और मुखारविन्द पर क्या है?

चितां डायन ज्यां नरां, निया घट अगंन माइ।
जड धारू धर उप्परइ, तऊ भीतरि पडसी खाइ।।

ढोला चाहे अपनी पीडा को छुपाने के लिए कितने भी जतन करे परन्तु उसके हृदय में दुखाग्नि हर समय प्रज्वल्लित रहेंगी। मालवणी ढोला को प्रसन्नचित रखतें हुए नाना प्रकार से प्रयास करने लगी व उसके आमोद-प्रमोद का पूर्ण ध्यान रखने लगी, परन्तु ढोला का मन तो कोसो दूर मारू की याद मे ही विचरण करता था।

ढोला मालवणी की चतुराई और विवेक से परिचित था। अतः उसने एक बार प्रेम पूर्वक वार्ता करते हुए मालवणी को हृदय से समझना चाहा। ढोला मालवणी का हृदय भी नहीं तोडना चाहता था, और मारवणी के बिना उसका हृदय किसी प्रकार सम्भलता भी नही था।

ढोला-मारू की राह में मालवणी का प्यार-

ढोला पूंगल के लिए प्रस्थान को आतुर था उसने मालवणी से विदेश जाने की अनुमति चाही तो मालवणी ने कहा कि राजन्! विदेष तो ब्राम्हण और वैश्य यात्रा करते है, आपको विदेश यात्रा क्या आवश्यकता है? ढोला ने अनेक प्रकार से अनुमति चाही परन्तु मालवणी ने प्रत्येक का समुचित उत्तर प्रदान कर ढोला को निरूतर कर दिया। अन्ततः ढोला ने मालवणी को मारू के बारे मे बता कर मालवणी से मारू से मिलने जाने की इच्छा व्यक्त की।

सुणि सुंदरि ढोला कहइ, भाजंइ मानिनी अंसि।
मरवणी मिलिया तणी, खरी विलंगी खुति।।

ढोला ने कहा कि मालवणी मेंरे मन मे मारवणी से मिलने की लालसा जागृत होकर मुझे पीडित कर रही है अब मुझे उससे मिलने के लिए जाना पडेगा। ढोला के मुख से मारू का सत्य जानकर मालवणी व्यथित होकर बेहोश हो गई। उसे लगा जैसे हजारों सर्पो ने उसे एक साथ डस लिया हो। होष मे आने पर उसने ढोला से विनती की-

थल तता लू सांमुही, दाडउला पहीयांय।
म्हारउ कहियउ जे करउ, धरि बैठा रहीयाय।।

मलवणी ने कहा है ढोला। इस कठोर गर्मी में आप यदि मारू से मिलने तपते रेगीस्तान में जाएगें तो उस तपती जमीन की गर्म तुए (वायु) तुम्हें जला देगी, मेरा कहना मानो अभी रूको।

उष्ण काल बीता सावन की ऋतु आई। ढोला ने एक बार पुनः अनुमति चाही परन्तु मारवणी ने अनेको उदाहरण देकर वर्षा ऋतु का यात्रा के प्रतिकूल बताया व ढोला को अपनी विरह वेदना का उपालम्भ देते हुए शरद ऋतु तक यात्रा नहीं करने हेतु रोक लिया। मालवणी ने कहा-

ढोला रहिस निवारियो, मिलसी दई रइ लेख।
म्यांकउ कहियउ जे करउ, तउ दसराहा लगि देख।।

है ढोला, तू चिन्ता दिल से निकाल दे। मिलन सुख तो दैवाधीन है। मेरा कहा मान कर दशहरा त्यौहार तक प्रतीक्षा कर ले। ढोला के हृदय में मालवणी के प्रति भी अगाध प्रेम था, उधर उसके हृदय के मन्दिर मे मारवणी की मूर्ति विराजित थी। इन दोनों से सैकडोें योजन दूर मारवणी की निगाहे नरवरगढ से अपने वाली राह पर टिकी हुई थी। प्रेम राह भी अजीब है जिस पर रूका भी नहीं जाता, चला भी नहीं जाता, ना ये कहीं जाती है और ना ही ये लौट कर आती है।

दशहरा आ जाने पर पुनः ढोला पुंगल जाने का आतुर देखकर मालवणी ने ढोला से कहा कि तुम्हार चलु-चलु कहने पर मेरे तन से मेरे प्राण निकलने लगत है। अतः जब तक मै जागु तब तक आप जाने के लिए ऊॅट पर मत सवार होना। मालवणी अपने प्रियतम के पास बैठी रही तथा पन्द्रह दिवस तक जागती रही अन्नतः जब उसे प्रगाढ निन्द्रा ने आ घेरा तो ढोला उसके पास से उठकर ऊॅटों के झुण्ड में से श्रेष्ठ ऊॅट का चयन कर रेबारी (एक विषेष जाति) के कहनेे पर किया व उस पर सवार होकरन उसने ऊॅट से निवेदन किया कि हे ऊॅट तुम यहा नागर बेल खाते हो, मांगलोर का चारा चरते हो तुमको मुझे अनेको योजन दूर पूॅगल प्रदेश मेरी प्रियतम के पास लेकर चलना है तो ऊॅट ने कहा-

मोगळी बंधू घूघरा, मोगळी बंधे लाज।
च्यार मास रो पंथडा, वारि दिखाइस आज।।

हे राजा तुम मेरे पर सवार हो जाओ मैं तुम्हें आज असली राह दिखाऊॅगा तथा चार मास में तय की जाने वाली दूरी आज रात में ही पार करके दिखाऊॅगा। ऊॅट की करकडाहट से मालवणी जाग उठी और ढोला को रोकने के उपक्रम में अपनी सखियों-दासियों के साथ महल से प्रस्थान किया परन्तु पवनगामी ऊॅट ढोला को लेकर पूंगल प्रदेष की तरफ कूच कर चुका था। मालवणी के मुॅह से विरह के भाव प्रकट हुआ-

ढोलउ चाल्यउ है सखी, वाज्या विरह नीसांण।
हाथर चूडी खिर पडी, ढीला हुआ संधाण।।

मालवणी ने कहा सखीयों ढोला के प्रस्थान करते ही मेरे घर में विरह-दुदंभी बज उठी है। मेरे हाथों से चूडियाॅ गिर रही है, और मेरे शरीर के अवयव शिथिल हो रहे हैं। मालवणी के नयनों से अश्रुधाराएँ बह रही है।

Dhola Maru meets again | ढोला-मारू मिलन-

तीव्रगामी ऊँट और वीरान राह-

ढोला का ऊँट द्रुत गति से पंछी के समान पूंगल प्रदेश की यात्रा तय करने लगा। ढोला के ऊॅट की गति देखते ही बनती थी उस राह में एक वणिक व्यापारी मिला और निवेदन किया कि तुम मेरा पत्र बीस योजन गाॅव में पहुॅचा देना तो ढोला ने कहा मेरे पास रूकने का समय नहीं है। तुम अपना पत्र मेरे पीछे बैठ के लिख दों इससे पहले कि वणिक अपना पत्र पुरा लिख पाता की ढोला का ऊट बीस योजन की दूरी तय करके उस गाॅव तक पहुॅच गया जहाॅ कि पत्र को पहुॅचाना था। वणिक इस असामान्य घटना के बारे में सोचने लगा इसी उधेड-बुन में उसका हृदय आश्चर्य से विदीर्ण हो गया और उसके प्राण पक्षी उड गए।

दुष्ट उमर की ढोला से भेंट-

ढोला अपने प्रिय ऊॅट से विभिन्न प्रकार की बातें करता रहा और उसका ऊॅट मंजिल की तरफ बढता गया। जब ऊॅट एक घाट पर पानी पीने रूका तो पिंगल राय से नाराज एक चारण ने ढोला को मारवणी के ढल चुके सौन्दर्य की बात बताकर विमुख करने की प्रयास किया परन्तु एक रेबारिन ने ढोला के संशय को मिटा दिया। रेबारिन ने कहा कि ये चारण तो उमर राव का पिठ्ठु है जो कि मारू से विवाह हेतु आतुर है, परन्तु पिंगल राय इस हेतु कदापि तैयार नहीं है। रबारिन ने कहा -

‘ढोला समंलि माहरी बातं, उमर धणी खलै री घाह।
मारवणी स्यूॅ लागी मोह। तौस्यु धणा करैस्ये द्रोह।।

रेबारिन की सीख-

कि ढोला उमर तुमसे द्रोह कर के झूठी बात प्रचारित कर रहा है। रेबारिन के वचन को सुन पूंगल निवासी एक चारण ने ढोला के समक्ष मारू की सुन्दरता व विरह का चित्रण किया तो ढोला पुनः पूंगल की तरफ यात्रा करने लगा। चारण द्वारा मारवणी के वर्णित सौन्दर्य को जान ढोला मारू के पास शीघ्रताशीघ्र पहुॅचना चाह रहा था। उसने ऊॅट से कहा की हम दो दिन हो गए अभी पूंगल के दर्शन नहीं हो रहे तो ऊॅट ने कहा-

बेहा बडउज उदाध्ययां, परज्यऊ पहूंरी याहं।
कालर काछी कमल ज्यूं, ढहि रेला रथयाहं।।

कि जैसे समुन्द्र पर पक्षी उडतें, तालाब में पहुंरियाॅ तैरती है, उसी प्रकार से कच्छ प्रदेश का ऊॅट आपके लिए तब तक दौडता रहुॅगा, जब तक की मेरे शरीर में प्राण है।

मारू को स्वप्न में दर्शन-
इधर ढोला पवन वेग से यात्रा कर रहा था वहीं दूसरी तरफ मारू को स्वप्न में ढोला के दर्शन हुए।

मारू नें अपने स्पप्न का जिक्र अपनी माता व सखियों से किया, उसके स्वप्न पर विचार कर सभी ने कहा कि तुम्हारा ढोला शीघ्र तुम्हारे सम्मुख होगा यह जानकर मारू के हृदय में विभिन्न साज बज उठे, मानस तरंगित होने लगा व उसकी बाॅई आॅख फडकने लगी। अपने प्रियतम से मिलने की आशा में वह अपार आनन्द से परिपूर्ण होने लगी। मारू महल से बाहर निकल नरवरगढ की तरफ की सीमा को तकने लगी। पूंगल समीप पहुॅचने तक लगातार दौडता ऊॅट थक कर निढाल हो गया। ढोला उसे कुएं पर लाकर पानी पिलाने का प्रयास करने लगा। थकाहारा निढाल ऊॅट को जगाने के लिए छडी से प्रहार किया। प्रहार से विचलित ऊॅट जब उछलने लगा तो वहाॅ रेबारी ने तुरन्त पहचाना कि यह ऊॅट जब उसी ऊॅटनी की संतान है, जिसें मारू की शादी के समय नरवरगढ के राजा को नेग में पूंगल नरेश पिंगल ने सप्रेम भेंट किया था और निश्चय ही उस पर सवार होकर ढोला मारू से मिलने और लेने के लिए पुंगल पहुॅच गया है।

ढोला-मारू की कुएं पर मुलाकात-

मारू भी अपनी सखियों के साथ कुएं पर पहुच गयी। ऊॅट को पानी पिलाकर जब ढोला पल भर को बैठा तों मारू की सखियों ने उससे प्रत्यक्ष ही पूछ लिया कि तुम जिससे मिलने आए हो, उस मारू की पहचान बताओं। ढोला ने देखा कि सखियों ने लोई (कम्बल) ओढ रखी है उनके साथ ही उसकी मारू है तो ढोला ने सभी को एक पल देख कर मारू का पहचाना व इशारा कर दिया-

सवै लौहडवालीया, न जाणू धण काइ।
ऊजल दन्ती मारवणी, ल्हसण जडावइ माइ।।

तुम सभी ने लोई ओढ रखी है लेकिन मै अपनी मारू को पहचान गया हॅेू, जिसकी दंतावली सफेद व पैर में लहसुन का निशान है वह मेरी मारू है। यह सूनते ही सभी सखिया व मारु राजमहल की तरफ दौड पडी।

ढोला के आगमन का समचार सुन राजा, प्रजाजन सभी प्रसन्न हो गए। पिंगल राय ने बडी शान-शौकत से उनकी अगवानी की तथा बधाईयाॅं देने वालो को पुरस्कार स्वरूप घोडे प्रदान किए। पूंगल प्रदेश ढोला की अगवानी में बजने वाले वाद्य यन्त्रों की सुमधुर ध्वनियों से गुंजायमान होने लगा।

ढोला का स्वागत-

पिंगलराय ने ढोला के स्वागत पश्चात् उनके पिता राजा नल व अन्य परिजनों की कुशलक्षेम पूछनें के बारे में उन्हें विशिष्टतम अथितिगृह में ठहराया। अतिथिगृह में ढोला को कहा विश्राम, उनकी नजरे तो विराट राजमहल मे अपनी प्रेयसी मारू को तलाष कर रही थी।

मारू की सखिया ढोला को लेने के लिए अतिथिगृह पहुॅची और उन्हे हॅसी ठिठोली के बीच मारू के महल तक पहुॅचाया। एकान्त में जब ढोला ने मारू को देखा, हँसती हुई मारू को देखकर उसे लगा जैसे मेघों के बीच बिजलियाॅ चमक रही है। ढोला ने प्रीती पूर्वक कहा-

मारवणी तुझ मंगणवार, आया नरवरगढ जिणवार।
लाधी जिरती पछइ तुम तणी ऊमाहौ हूवौ मुख धणी।

हे-मारू ! जब से तुम्हारा ढाढी नरवरगढ आया और तुम्हारा सन्देशा लाया, उसी समय से मेरे हृदय में तुम्हारे प्रति प्रीति की जोडी जुड गई, तुम मुझे क्षमा करो कि मेरे कारण तुम्हे लम्बे समय तक विरह वेदना सहन करनी पडी। मुझे भी अपने पूर्व जन्म के पापों के कारण विरह वेदना सहन करनी पडी।

ढोला के प्रेम वचनों को सुनकर मारू के नयनों से अश्रुधारा बह निकली उसने प्रेम पूर्वक कहा की ढोला तुम्हे अनेको संदेश भिजवाए परन्तु किसी का प्रत्युतर नहीं मिला। इधर उमर सूमरा मुझसे विवाह करने हेतु नानाविधि प्रयास कर रहा था। उसने हमारे राज्य को अनेक प्रलोभन दिए व आपके बारे में भी झूठे प्रचार किए। जब मेरे माता-पिता ने उमर के प्रस्ताव पर मेरे विचार चाहे तो मैंने कहा-

इण तउ तौे ढोलौ भरतार, प्रीतम जीवन प्राण आधार।
एहवा बौलनो निष्चै करयौ, बीजे डी बीजौ आदरयो।।

ठस संसार में ढोला ही मेरा पति व जीवन आधार है। उसके अलावा मै किसी का नाम सुनू तो भी पाप की भागिनी हॅू। इस निर्णय से उमर सूमरा हमारे राजवंश से नाराज हैं। ढोला मारू की बातें सून अति प्रसन्न हुआ। दोनों के मध्य प्रेम वार्ता से सम्पूर्ण वातावरण मदमस्त होने लगा। उन दोनों में प्रेम-प्रीति, पल - पल बढती जाती थी इस प्रेम मय वातावरण में एक पखवाडे तक निवास पश्चात् भाऊ भाट की सलाह पर ढोला मारवणी सहित नरवरगढ जाने के लिए उद्यत हुआ और उसने पिंगल नरेश से विदाई माॅगी।

उमर की कुचेष्टा-


नरेश पिंगल व राजरानी उमा ने मारवणी के मुकलावे में प्रचुर द्रव्यराशि, ऊॅट, घोडे प्रसन्नता पूर्वक प्रदान किए। इसी काल में प्रदेश में उमर सूमरा के गुप्तचर पल पल के समाचार उमर का भिजवाने लगे और उमर ने मारवणी को हथियाने का दृढ निश्चय किया। पूंगल से नरवरगढ के कठिन, दूरह, वीरान रास्तें में ही मारवणी को हथियाने का उसके लिए अन्तिम अवसर था। उमर ने प्रतिज्ञा की कि वह राह मे ही ढोला को मार कर मारवणी से पुनर्विवाह रचेगा।

पिंगलराय के सभी सगे सम्बन्धियों ने एकत्र होकर मारवणी के मुकलावा की रस्म को पूर्ण कर इस उतम जोडे को विदाई प्रदान की, एवम् ढोला के साथ एक सौ सैनिक (घुडसवार) भिजवाए। मारवणी के माता-पिता सगें सम्बन्धी विदाई हेतु पूंगल की सीमा तक साथ चलें।

मारू को सर्पदंश

काल की लीला न्यारी होती है। यात्रा के प्रथम रात्री मे विश्राम हेतु ढोला व मारू के शयन हेतु शिविर स्थापित किया व चारों तरफ प्रहरियों की नियुक्ति की गई परन्तु जब ढोला व मारू गहन निद्रा में थे तभी एक पिवणें साॅप नें शिविर में प्रवेष कर ढोला की तरफ बढा परन्तु मारू के मुख से निकलने वाली कस्तुरी तुल्य सुगन्ध से आकृष्ट होकर मारू की सांसों के सौरभ को पीवणी ने पी लिया।

प्रातःकाल मारू की देह ठण्डी पड चुकी थी। मारू की सखी दीवाधरी ने मारू के शरीर को देखकर तुरन्त पहचान कर ली कि रात्री के समय पीवणें सर्प ने मारू की सांसों को पी लिया है।

ढोला की विरह वेदना

ढोला के विषाद की सीमा नहीं रही अपनी प्रेयसी के संग जीवन जीने की उसकी कामना थार के मरूस्थल में धूल धूसरित होने लगी। ढोला बिलख-बिलख कर रोने लगा। पूंगल प्रदेश के सैनिकों में सन्नाटा छाने लगा।

ढोला के हृदय विदारक रूदन को सुनकर उसके साथियों ने उसे समझाने की चेष्टा की तथा भारमली ने समझाया कि मारवणी के समान उसकी रूपवती बहन चम्पावती से उसकी शादी की जा सकती है। जिससे दोनों राज्यों के सम्बन्ध भी बने रहेंगे तथा ढोला सुखपूर्वक जी सकेगा। यह सुनकर ढोला ने कहा-

इणे भावितौ मारवणी नारि। सै हथि दीनी सिरजणहार।
साई परमेसर संग्रही। मुझ परणणों इण साथै सही।।

इस जन्म में तो मारवणी ही मेरी पत्नी रहेगी क्योंकि स्वयं विधाता ने मेरे लिए उसका सृजन किया था। हमने विरह सहा और यदि अब भी विधाता को हमारा पुर्नवियोग स्वीकार है तो मुझे भी अब यह स्थिति स्वीकार है। ढोला, मारू और सेविका दीवाधरी को छोडकर सभी पूंगल प्रदेश पुनः रवाना हो गए।

शोक ग्रस्त ढोला ने सायॅ काल अपनी प्रेयसी मारू के सभी आभूषण उसके शरीर से उतार लिए तथा उसकी देह को श्रृंगार से मुक्त किया। ढोला ने ऊॅट को अपने पास बिठाकर उसे मारू के गहनों से सजा दिया तथा उसे कहा कि वो नरवरगढ जाकर यहां के सब हाल वहाॅ सुना दे।

मारू की जीवन-रक्षा

ढोला मारवणी के साथ ही चिता संग जलने हेतु उद्यत हो गया। ऊॅट की तीव्र भर्राटों कों सुनकर पथ से गुजरतें एक योगी महाराज की उन पर नजर पडी। उनकी मुद्रा प्रसन्न थी व उनके पास जडी बूटियों की कोई कमी नहीं थी। योगी ने ढोला को समझाया कि इस प्रदेश के पुरूष के सती होने का कोई उदाहरण नहीं है परन्तु ढोला ने उनकी बात को अनसुना कर दिया। तब योगिनी ने योगी से कहाॅ-

जे अस्गी जीवाडसि नहीं। त हूं प्राण तजेसूं सही।
तुई पासैउं प्यणै। मन्त्र तन्त्र तुझ पासे घणा।।

योगिनी ने कहाॅ कि इस सुन्दर नारी कोे आपने जीवित नहीं किया तो मै भी अपने प्राण त्याग दूंगी अन्ततः योगिनी ने हठपूर्वक येन-केन प्रकारेण अपनी बात स्वीकार करा ही ली। योगी ने मारू के गले पर विषेष औषधियों का लेप किया व पूर्ण रात्री तक पानी पी पी कर अनेक मन्त्रों का पाठ किया। उन सबके

समवेत प्रभाव से मारू पूर्ण स्वस्थ हो गई। ढोला को असीम आनन्द प्राप्त हुआ उसने योगी को स्वर्ण की मालाएॅ व योगिनी को नौलखा हार भेंट किया। तदुपरान्त योगी व योगिन अपने मार्ग पर चले गए। ढोला व मारू का मन खुशी से तरंगित हो गया। ढोला के सच्चे प्रेम को देखकर मारू के अश्रु रूकते नही थे।

ढोला ने दीवाधरी को मारू के पुर्न जीवित होने के समाचार भेजने हेतु पूंगल भिजवाया ताकि वहाॅ के शोक संतप्त निवासियों की व्यथा समाप्त हो सके। वहाॅ से गुजरतें ब्राहम्णों के दल के साथ दीवाधरी पूंगल की तरफ रवाना हुईं। दीवाधरी के कथन व उसके कथन की ब्राहम्णों द्वारा पुष्टि से पूंगल में उत्साह की लहर दौड गई। सर्वत्र आनन्दोत्सव आयोजित होने लगे।

उमर के गुप्तचरों ने सैनिकों के साथ व ततपश्चात मारू की मृत्यु का समाचार उमर तक पहुचाॅ दिया था जिसे सुनकर उसका भी हृदय दुःख से भर गया था। ततपश्चात जब पुनः उसके गुप्तचरों ने मारू के पुर्न जीवित होने तथा ढोला व मारू के अकेले ही यात्रा करने का समाचार उस तक पहुॅचाया तो उमर का मन प्रसन्न हो गया तथा उसके हृदय में मारवणी के अपहरण का विचार और भी मजबूत हो गया।

ढोला उमर के इरादो से बेखबर नरवरगढ की तरफ मारू सहित अग्रसर हो रहा था। पथ दुर्गमता के कारण ऊॅट मंद गति से चल रहा था। डमर अपने सैनिको सहित ढोला का पीछा करते हुए उनके समीप पहुॅचने लगा। डमर ने ढोला से आगे निकलकर सैनिको सहित विश्राम शिविर स्थापित किया। जब ढोला डमर के विश्राम स्थल तक पहॅुचा तो डमर ने ढोला को विश्राम करने हेतु अपने शिविर में आमन्त्रित किया। ढोला उमर को व उसके इरादों को जानता नहीं था। अतः उसने आमन्त्रण स्वीकार कर लिया।

उमर का षड्यंत्र

उमर के पास मदिरा से भरे हुए एक झारी थी। उमर और ढोला मदिरापान करने लगे तथा उमर के एक साथी भील जाति के डूम ने तांत (वाद्ययऩ्त्र) बजाना शुरू किया तथा उसकी पत्नी डुमिनी ने स्वर लहरियाॅ बिखेरनी आरम्भ की। लोग शराब पीते रहे और ऊॅट जुगाली करते रहे। ढोला का मन शराब में और मारू का मन डूमिनी की राग में विचरण करने लगा।

डूमिनी ने, जो कि पूंगल क्षेत्र की निवासी थी, गीत के माध्यम से मारू को सन्देश दिया कि मारू तुम और ढोला जिस शिविर में आनन्द से बैठे हो वो तुम्हारे शत्रु उमर का है। ये उमर तुम पर गन्दी नजर रखता है वह शीघ्र ही तुम्हारे पति का शराब से मद मस्त कर मरवा देगा व तुम्हारा अपहरण करेगा।

थल माथै ऊजासडों, कोई हुवा कुसंग।
धण लीजै प्रिय मारिजै, छौडि विंडाणै संग।।

मारू बडी चतुर थी वह डुमिनी के राग का मर्ज जान ऊॅट के पास पहुॅची और उसे छडी से मारने लगी तब ढोला का ध्यान ऊॅट व मारू की तरफ आकृष्ट हुआ। जब वह ऊॅट के पास पहुॅचा तो मारू ने संक्षेप में उसे उमर के षडयन्त्र को समझाया।

मरवणी की छडी से प्रताडित ऊॅट शिविर से थोडा दूर चला गया। ढोला ऊॅट को वापस लाने के बहाने मारू सहित शिविर से निकल और दोनों ऊॅट पर सवार होकर नरवरगढ की तरफ ऊॅट को दौडाने लगे।

ऊॅट अपने स्वामी की रक्षा हेतु तीव्र गति से दौडने लगा। यद्यपि ढोला जल्दबाजी में ऊॅट के पैरों के बंधन खोलना भूल गया था तदुपरान्त भी ऊॅट ने अपने स्वामी की रक्षा हेतु दौडने का यत्न किया था।

उमर ने दोनों को ऊॅट पर सवार होकर निकलते देखा तों उसने अपने सैनिकों सहित घोडो पर सवार होकर पीछा शुरू किया तथा घोषणा कि जो कोई भी ढोला को पकड लेगा, उसे मै अपना राज्य दूॅगा तथा जो कोई उसे मार सकेगा उसके साथ मै अपनी पुत्री का विवाह करूॅगा।

उमर व उसके सैनिक तीव्रता से ढोला व मारू का पीछा करने लगे परन्तु ढोला का ऊॅट तो अपने स्वामी की रक्षार्थ पवन वेग से भागा चला जा रहा था तथा प्रतिक्षण उमर हद से दूर बढता जा रहा था। घबराई हुई मारू को ढोला ने सांत्वना दी और कहा कि उसका ऊॅट इस खुरसाणी किस्म के घोडों की तीव्र गति के उपरान्त भी उनकी पकड में नहीं आएगा।

रास्ते में रात्री होने पर ढोला नें अपने ऊॅट को रोका तो रास्तें से गुजरतें एक चारण ने कहाॅ कि हे राजा तुम्हारे ऊॅट ने क्या गलती की जिसकी सजा स्वरूप तुम उसके बन्धन युक्त पैरों से उसे दौडा रहें हो।

संभलि रावत चारण कहइ। करहौ हुयो दोहितौ वहइ।
केहवो अवगुण करहै कीयोै। ऊपरी भार पाव कूंटियो।।

यह सुनकर ढोला ने बताया कि विपति के कारण वह ऊॅट को बन्धन मुक्त करना भुल गया था। चारण ने ढोला कि कटार से ऊॅट को बन्धन मुक्त किया व ढोला से स्नेह से अपने ऊॅट के सर का सहलाया। बन्धन मुक्त ऊॅट अब दुगनी गति से मंजिल की तरफ अग्रसर होने लगा।

उमर भी पीछा करते हुए जब वहां पहुँचा और चारण से ऊॅट पर सवार ढोला और मारू की जानकारी चाही तो चारण ने कहा कि उमर यहाॅ से वे ऊॅट पर गुजरे है जब तुम उनके बंधन युक्त ऊॅट को भी अपने खुरसाणी घोेडो के बावजुद नहीं पकड सके तो अब जबकि मैने ढोला की कटार से उसके ऊॅट को बन्धन से मुक्त कर दिया है, कैसे पकडोगे? यह ढोला व मारू तो अतयन्त तीव्र ऊॅट पर सवार होकर अपनी मंजिल के बहुत करीब पहॅूच गए होंगें।

ते पहुॅचो नरवर गढ तणी। तिण साये मारू पदमणी।
नवि उंलख्यो नवि लहनो। दूहौ एक सन्देसो कहये।।

चारण ने कहा कि उमर ऊॅट पर सवार ढोला तो अब अपनी मंजिल के समीप पहुॅच गया होगा। उसके साथ बैठी रूपसी ने तुम्हारे लिए संदेशा छोडा है कि पर नारी पर आकृष्ट मनुष्य का धर्म व वीरता प्रकृति हरण लेती है।

यह सुनकर उमर का चेहरा फीका पड गया और निराश होकर अपने राज्य की तरफ लौटने लगा। वह जिस मार्ग से आया उसी मार्ग से लौटने लगा। लौटते समय उसके बीस घोडे भी मारे गये।

उमर के वापस लौटने की खबर पुंगल पहुॅच गई और ढोला भी मारवणी को लेकर कुशलक्षेम पूर्वक नरवरगढ पहुॅच चुका था।

तीन दिन की यात्रा पश्चात् नरवरगढ पहूॅचें ढोला ने मारू के साथ नगर के बाहर स्थित बागीचे में विश्राम किया। नरवरगढ नरेश नल स्वयं अपने सगे सम्बन्धियों के साथ अपने पुत्र-पुत्रवधु की अगवाणी हेतु बागीचे पहॅुचे।

शुभ मुहूर्त में उन्हें नगर में प्रवेश करावाया गया। सभी दिशाओं मे ढोला मारू की जय जयकार होने लगी। मारू हेतु नवीन महल का निर्माण करवाया, पचासों दासियाॅ व गाॅव भेंट किए गए।

Happy End |सुखद समापन-

ढोला व मारू में उतरोतर प्रेम भावना बढती गई। ढोला की दोनो रानियाँ व्यावहारिक दृष्टि से भिन्न स्वरूपा थी परन्तु आन्तरिक दृष्टि से दोनो अभिन्न थी। मारवणी व मालवणी दोनों अपने पति को अन्तरआत्मा से प्रेम करती थी। दोनों रानीयाॅ के कालान्तर में पुत्र रत्न हुए वे दोनो मनोवांच्छित सुख पाते हुए समतुल्य सौभाग्य का उपभोग करती थी।

कवि कुषलदास की इस रचना को पढने वाले, सुनने वाले और समझने वालों को रिद्धी-सिद्धी और सुख सम्पदा की प्राप्ति होती है।

इति श्री ढोला मरवण री उपचई सम्पूर्ण।

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