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Draupadi Swayamvar | द्रोपदी स्वयंवर

द्रौपदी स्वयंवर भारतीय इतिहास की महान घटनाओं में से एक है क्योंकि इस स्वयंवर का विश्लेषण सिर्फ भारतीय इतिहास पर ही दृष्टिपात नही करता अपितु भविष्य को भी इंगित करता हैं। आइये, हम हर सिलसिले को क्रमबद्व तरीके से समझने का प्रयास करते है।

द्रोपदी कौन थी? | Who was Draupadi ?

द्रोपदी महाभारत का एक महत्वपूर्ण पात्र है। वह काम्पिल राज्य के राजा द्रुपद की राजपुत्री थी। काम्पिल के राजा यज्ञसेन ने अपनी पुत्री द्रौपदी के विवाह हेतु स्वंयम्बर रचा था। द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने इस सम्पूर्ण स्वंयम्बर का संचालन किया था। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर था क्योंकि तत्कालीन भारत के राजवंशों के राजपुत्रों के अलावा उस स्वंयम्बर मे स्वयं श्रीकृष्ण उपस्थित थे।

स्वयंवर क्या होता हैं? | What is the meaning of Swayamvar?

स्वयंवर का अर्थ होता है स्वतंत्रता जिसमे कोई भी युवती अपने पति का स्वतंत्र भाव से वरण करती हैं। स्वयंवर एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई युवती अपने लिए अपने पति का चयन करती है। स्वयंवर में योग्य पुरूष के चयन हेतु कोई शर्त रखी जाती है तथा जब कोई योग्य युवक वह शर्त पूरी करके दिखा देता है तो वह युवती उस युवक के गले में वरमाला डाल कर उसको अपना पति स्वीकार कर लेती है। इस स्वयंवर का आयोजन युवती के पिता अथवा भाई द्वारा आयोजित किया जाता हैं। स्वयंवर में युवती के चयन पर किसी प्रकार की चुनौती दिया जाना सम्भव नही होता है।

द्रौपदी के स्वयंवर की शर्त | Draupadi Swayamvar

द्रौपदी के स्वयंवर हेतु उसके भाई धृष्टद्युम्न ने सभा के सामने यह शर्त रखी थी कि उपस्थित समस्त कुलीन व निष्कलंक राजकुमारों में

से जो भी महल के सभागार की छत पर निरन्तर घूम रही मछली की आंख में नीचे तेल के बर्तन से मछली की छवि को देखकर जो मछली की आंख में एक साथ पाँच तीरों का निशाना लगाएगा उससे राजकुमारी द्रौपदी का विवाह होगा।

उस काल मे नारी को सम्पूर्ण स्वायत्तता उपलब्ध थी तथा वह स्वयम की इच्छा के अनुसार अपने लिए वर का चयन करती थी। इस तथ्य को वर्तमान समाज द्वारा आवश्यक रूप से समझ लिया जाना चाहिए। हिंदुत्व के इस उज्ज्वल पक्ष को समझकर ही हम सनातन धर्म की परंपराओं को समझ सकेंगे।

द्रौपदी स्वयंवर में भाग लेने वाले रणबांकुरे। Who participated in Draupadi Swayamvar?

द्रौपदी तत्कालीन समाज के बड़े राजघराने की राजकुमारी थी। राजकुमारी द्रौपदी से विवाह करना तत्कालीन समय मे किसी भी राजघराने के लिए बहुत उत्तम था अतः उस समय के समस्त राजघरानों के युवा राजकुमारों ने उस स्वंयम्बर मे भाग लिया था। इनमें से कुछ प्रमुख का परिचय निम्नानुसार है-

शिशुपाल | Shishupal

राजा दम्भोश के पुत्र व श्री परशुराम के शिष्य शिशुपाल ने इस स्वयंवर मे भाग लिया था परंतु वह मछली की आंख को भेदना तो दूर बल्कि धनुष को उठा तक नही सके थे। शिशुपाल को एक सो गलतियों को माफ करने के बाद श्री कृष्ण ने कालांतर में इनका संहार किया था।

शिशुपाल द्रौपदी स्वयंवर में धनुष उठा तक नही सके थे। Www.shivira.com

शल्य | Shalya

शल्य भी तत्कालीन शूरवीर थे। शल्य मगध नामक राज्य के प्रतिनिधि थे। शल्य भी द्रौपदी के स्वयंवर में सम्मिलित हुए लेकिन उनकों भी मुहँ की खानी पडी। शल्य भी इस प्रतियोगिता में असफल हो गये।

शल्य भी आखिरकार द्रौपदी स्वयंवर में असफल ही सिद्ध हुए थे।

शाल्क | Shalak

शाल्क महावीर थे। शाल्क सोम नगर से सम्बंधित थे। जब शूरवीर शाल्क भी असफल हो गए थे तब द्रौपदी परिवार में खलबली मचने लगी थी कि यदि सभी शूरवीर असफल हो गए तब इस स्वंयम्बर का आखिरकार क्या होगा?

शाल्क महावीर थे लेकिन द्रौपदी स्वयंवर में असफल रहे थे।

जरासँघ | Jarasandh

जरासँघ एक ऐसे वीर थे जिन्होंने यादवों के विरुद्ध लड़ाई में विजय हासिल की थी। जरासँघ हालांकि इस स्वयंवर मे सम्मिलित जरूर हुए थे लेकिन उन्होंने अपनी आयु की गम्भीरता दिखलाते हुए यह कह कर स्वयंवर से हट गए थे कि द्रौपदी उनकी पोते की बहू बनने लायक है। जरासंध ने अपने विचार से समस्त का दिल जीत लिया था। जरासँघ ने इस बात का अफसोस जताया था कि उनका पौत्र गदा युद्ध

मे माहिर है परंतु उसको तीर चलाने में महारत नही है अतः वे अपने पुत्र व पौत्र के साथ स्वयंवर से प्रस्थान कर मगध चले गए थे।
जरासँघ ने स्वयमेव ही स्वयंवर का त्याग मूल्यों की स्थापना करते हुए किया था।

दुर्योधन | Duryodhan

भरत वंश के इस राजकुमार दुर्योधन ने नकारात्मक कीर्ति ही प्राप्त की थी। वीर होने के बावजूद गलत राह पर चलने के कारण यह अप्रसिद्ध ही रहे। धृतराष्ट्र व गाँधारी का पुत्र दुर्योधन अतीव बलशाली था। दुर्योधन श्रीकृष्ण के भाई बलराम व गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य थे। दुर्योधन तमाम काबलियत के बावजूद भी धनुष की प्रत्यंचा नही चढ़ा सके थे एवम स्वयंवर में लज्जित ही हुए थे। दुर्योधन के हारने के बाद द्रौपदी को एक संतुष्टि भाव प्राप्त हुआ था क्योंकि वह दुर्योधन से विवाह करने हेतु कदापि उत्सुक नही थी।

लज्जित दुर्योधन धनुष की प्रत्यंचा नही चढ़ा सके थे।

कर्ण | Karn

अंगदेश के राजा कर्ण भी इस स्वंयम्बर मे सम्मिलित हुए थे लेकिन पिता के आदेश पर द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने कर्ण को इस स्वयंवर मे भाग लेने से रोक दिया था क्योंकि उनके मतानुसार कर्ण राजा अवश्य थे लेकिन कुलीन परिवार से नही थे। यह भी एक बड़ा तथ्य है कि उस स्वयंवर सभा मे स्वयं एकलव्य कर्ण के पक्ष में आये तथा सामाजिक भेदभाव के प्रश्न को उठाया था। एकलव्य के द्वारा कर्ण के पक्षमे तर्क रखने के बाद भी कर्ण को स्वयंवर में भाग लेने योग्य नही माना गया था अतः कर्ण बिना स्वयंवर में भाग लिए लौटने पर मजबूर हो गए थे।

कुलीनता के कारण कर्ण को स्वयंवर में भाग लेने से रोक दिया गया था।

क्षत्रिय असफल हुए। When all khastriya failed.

जब सारे क्षत्रिय धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा कर लक्ष्य भेद में असफल रहे तब ब्राह्मण वेश में आये पांडवों में से अर्जुन ने स्वयंवर में भाग लेने की इजाजत मांगी। एक बहस के पश्चात यह निर्धारित हुआ कि अर्जुन इस स्वयंवर मे भाग ले सकते है। अर्जुन पर श्रीकृष्ण की अथाह कृपा थी अतः अर्जुन ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर एवम श्रीकृष्ण से आज्ञा प्राप्त करके इस स्वयंवर मे भाग लिया।

अर्जुन ने सभा मे मौजूद समस्त ब्राह्मणों , क्षत्रियों एवम श्रीकृष्ण का अभिवादन करके आशीर्वाद लेने के बाद लक्ष्य की तरफ कदम बढाया गया। अर्जुन के रूप के बावजूद भी दुर्योधन, कर्ण, दुर्योजन व मामा शकुनि ने अर्जुन को पहचान लिया लेकिन उन्होंने चुप रहने में बुद्धिमानी समझी।

अर्जुन ने ही आखिर मछली की आंख में पांच तीर एक साथ मारकर स्वयंवर जीता था एवम द्रौपदी को वरण किया था।

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय | Brahaman Versus Kshatriya

सभा मे जब ब्राह्मण वेश में अर्जुन ने मछली की आंख को भेद दिया तब सभा मे ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय का विवाद आरम्भ हो गया था। क्षत्रियों ने यह कहा कि क्षत्रियों की कन्या ब्राह्मण के साथ कदापि शादी नही कर सकती है।

कौरव पक्ष क्योंकि ब्राह्मण वेश में पांडवों को पहचान चुका था अतः उन्होंने भी पांडवों को मारने का निर्णय किया परन्तु श्री कृष्ण की मौजूदगी के कारण सभी विप्लव तलने लगे एवम द्रौपदी का स्वंयम्बर शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ।

द्रौपदी अर्जुन विवाह| Draupadi Arjun Marriage

श्रीकृष्ण, द्रौपदी के परिजनों एवम साधु संतों की मौजूदगी में अंततः द्रौपदी एवम अर्जुन का विवाह होता हैं।