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द्वारिका धाम यात्रा (Dwarka Dham Yatra in Hindi)

चार धामों में से एक द्वारिका धाम (Char Dham Dwarka) का मंदिर लगभग 2500 भी अधिक वर्ष पुराना है। इस नगरी को भगवान् श्री कृष्ण ने बसाया था जो कि उनकी राजधानी थी यहाँ पर श्री कृष्ण का राज्य था जहाँ ये अपने परिकर, परिवार और 16108 पत्नियों के साथ निवास करते थे। 

द्वारिका धाम यात्रा

द्वारिका नगरी का इतिहास (History of Dwarika Nagri) :

काठियावाड़ प्रायद्वीप के पश्चिमी सिरे पर स्थित द्वारका को भारत के सबसे पवित्र स्थलों के साथ जोड़ा गया है - चार धाम (Char Dham) जिनमें बद्रीनाथ, पुरी और रामेश्वरम शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण उत्तर प्रदेश के ब्रज से शहर बनाने के लिए यहां पहुंचे थे। मंदिर की स्थापना उनके पोते ने की थी। यह गोमती नदी और अरब सागर के मध्य में है, जो आध्यात्मिक स्थल को एक सुंदर पृष्ठभूमि प्रदान करता है।

ऐसा कहा जाता है कि द्वारका छह बार समुद्र में डूबा था और अब हम जो देखते हैं वह उसका सातवां रूप है। मंदिर में अपने आप में एक आकर्षक कथा है। मूल संरचना को महमूद बेगड़ा ने 1472 में नष्ट कर दिया था, और बाद में 15वीं-16वीं शताब्दी में इसका पुनर्निर्माण किया गया। यह 8 वीं शताब्दी के हिंदू धर्मगुरु और दार्शनिक आदिशंकराचार्य द्वारा भी यहाँ कई निर्माण  करवाये  गये  थे ।

द्वारिकाधीश मंदिर (Dwarka Dham Temple) :

द्वारिका धाम यात्रा आने वाले पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण द्वारकाधीश मंदिर है जो कि भगवान कृष्ण के परपोते वज्रनाभ द्वारा 2500 साल से भी अधिक पहले स्थापित किया गया था। प्राचीन मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार किया गया है । मंदिर एक छोटी सी पहाड़ी पर खड़ा है, जिस तक 50 से अधिक सीढ़ियाँ हैं, जिसमें भारी तराशी हुई दीवारें हैं जो मुख्य कृष्ण की मूर्ति के साथ गर्भगृह को सजाती हैं।

परिसर के चारों ओर अन्य छोटे

मंदिर हैं। दीवारों पर पौराणिक चरित्रों और किंवदंतियों को बारीकी से उकेरा गया है। प्रभावशाली 43 मीटर ऊंचे शिखर पर 52 गज कपड़े से बने झंडे के साथ सबसे ऊपर है जो मंदिर के पीछे अरब सागर से नरम हवा में लहराता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पर तीन बार ध्वजा को बदला जाता है।  

मंदिर के प्रवेश और निकास के लिए दो दरवाजे जिनका नाम स्वर्ग और मोक्ष हैं। इस मंदिर में भगवान् श्री कृष्ण की काले रंग की चतुर्भजी प्रतिमा है जो बहुत ही सुन्दर और मनमोहक है। कहते है यह प्रतिमा भगवान् श्री कृष्ण का वही प्रतिरूप है जो उस समय की द्वारिका में मौजद थे। 

कृष्ण क्यों गए द्वारिकापुरी :

श्री कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के ससुर जरासंध ने कृष्ण और यादवो  को पूरी तरीके से नष्ट करने का संकल्प ले लिया था। जरासंध मथुरा और यादवों पर बार बार  हमला करता था। उसके कई मलेच्छ और यवनी मित्र राजा थे।

अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निश्चय लिया। ककुद्मी के आमंत्रण एवं गरूड़ की सलाह पर श्री कृष्ण कुशस्थली आ गए। वर्तमान द्वारिका नगरी कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान थी, कृष्ण ने इसी वीरान हो चुकी नगरी को नया  जीवन दिया और द्वारिका के नाम से बसाया। 

श्री कृष्ण अपने लाखो  कुल-बंधुओं के साथ द्वारिका नगरी आ गए। यहीं पर उन्होंने 36 हजार वर्ष राज्य करने के बाद अपने धाम गए। द्वारिका के समुद्र में समा जाने और यादव कुल के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारिका अंतिम शासक थे, जो यादवो  की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं

को हस्तिनापुर ले गए। श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया।

कैसे पहुंचे द्वारिका (Dwarka Dham ) :

द्वारका से लगभग 127 किलोमीटर की दूरी पर जामनगर एयरपोर्ट और 107 किलोमीटर की दूरी पर पोरबंदर एयरपोर्ट से है। द्वारका रेलवे स्टेशन के लिए भारत के प्रमुख शहरों से रेल सेवा उपलब्ध है। अगर आपके शहर से द्वारका के लिए डायरेक्ट ट्रेन उपलब्ध नही है, तो आप राजकोट, अहमदाबाद या जामनगर आ सकते है। यहाँ की रेलवे लाइनें पूरे देश में फैली हुई है, जो गुजरात को भारत के सभी शहरों से जोड़ती हैं।

द्वारका सड़क मार्ग कई राज्य के राजमार्गों से जुड़ा हुआ है। देश के कई बड़े शहरों से द्वारका के लिए बस सेवाएँ उपलब्ध है। द्वारका और आसपास के शहरों से राज्य परिवहन के अलावा प्राइवेट AC / NON AC बसें  नियमित अंतराल पर मिल जाती हैं।

द्वारिका क्षेत्र के दर्शनीय स्थाल :

रुक्मिणी देवी मंदिर

भगवान श्री कृष्ण की पटरानी  रुक्मिणी को समर्पित यह खूबसूरत मंदिर द्वारिका शहर के बाहर केवल  2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 12वीं सदी में निर्मित इस मंदिर की वास्तुशिल्प भारतीय कला का बेजोड़ नमूना है । इस मंदिर की  पौराणिक कहानी की शुरुआत रुक्मिणी और उनके पति भगवान श्रीकृष्ण से होती है, एक बार रास्ते में रुक्मिणी श्री कृष्ण  की मदद से गंगा में अपनी प्यास बुझाने के लिए रूकती हैं।

जब ऋषि दुर्वासा के जल  मांगने पर देवी रुक्मिणी ने उन्हें जल देने से मना कर दिया, तब ऋषि ने उन्हें भगवान श्री कृष्ण से अलग होने का श्राप दे दिया, इसकी  वजह से ये मंदिर द्वारकाधीश मंदिर से कुछ दूरी पर  बनाया गया है। 

बेट द्वारका

द्वारका के मुख्य शहर से लगभग 30 किमी दूर स्थित बेट द्वारका एक छोटा सा द्वीप है और ओखला  के विकास से पहले इस क्षेत्र का मुख्य बंदरगाह

था। द्वीप कुछ मंदिरों, सफेद रेत समुद्र तट और प्रवाल भित्तियों से घिरा हुआ है, यह समुद्र तट पर्यटकों के बीच अपने समुद्री दृश्य , समुद्री भ्रमण और पिकनिक के लिए भी लोकप्रिय है। अपनी यात्रा को थोड़ा रोमांचक  बनाने के लिए आप वाटर स्पोर्ट्स का भी मजा ले सकते हैं।

गोमती घाट

गोमती घाट गोमती नदी के मुहाने पर स्थित है, जो पवित्र गंगा नदी  की एक सहायक नदी है, जो सभी हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र नदी है। यह नदी नेपाल की हिमालय पर्वतमाला से निकलती है, कई भारतीय राज्यों में बहती है और अंत में यहाँ अरब सागर में मिल जाती है। गोमती घाट का धार्मिक और पौराणिक महत्व भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार गोमती नदी ऋषि वशिष्ठ की पुत्री है और उसका जल इतना पवत्र है कि किसी के भी नश्वर पापों को मिटा सकता है इसलिए  तीर्थयात्री इसे गोमती नदी में स्नान करने के लिए गोमती कुंड में अपनी डुबकी लगाते हैं।

गोपी तालाब

ऐसी मान्याता है कि श्री कृष्ण के स्वधाम गमन के पश्चात गोपिया उनके विरह में व्याकुल हो गई तथा उन्होंने एक साथ ही इस स्थान पर अपने सामूहिक रूप से अपने शरीर का त्याग कर दिया जहा पर उनका शरीर गिरा वहा की भूमि पवित्र हो गई और चन्दन के रूप में परिवर्तित हो गई। यहाँ पर पायी जाने वाली पिली मिटटी ही गोपीचन्दन कहलाती है जिसका भक्त चन्दन लगते है। 

द्वारिकाधीश की आरती (Dwarka Dham Ki Aarti) :

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे ।
भक्त / दास जनों के संकट, दास जनों के संकट
क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का, 
स्वामी दुःख विनसे मन का ।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥
ॐ जय जगदीश हरे...
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी,
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी ।
तुम  बिन और न दूजा,  प्रभु बिन और न दूजा
आस करूँ मैं जिसकी ॥ॐ जय जगदीश हरे...
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, 
स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ॥
ॐ जय जगदीश हरे...
तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता, 
स्वामी तुम पालन-कर्ता ।
मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी, 
कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे...
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, 
स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूँ दयामय , तुमको मैं कुमति ॥
ॐ जय जगदीश हरे...
दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे, 
स्वामी तुम रक्षक मेरे ।
अपने हाथ उठा‌ओ, अपनी शरण लगाओ,
द्वार पड़ा मैं तेरे ॥ॐ  जय जगदीश हरे...
विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा, 
स्वामी कष्ट हरो देवा ।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, श्रद्धा-प्रेम बढ़ा‌ओ, 
सन्तन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हरे...
तन मन धन सब है तेरा, 
स्वामी सब कुछ है तेरा ।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा ॥
ॐ जय जगदीश हरे...
श्री द्वारिकाधीश  जी की आरती, जो कोई नर गावे, 
स्वामी जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे ॥
ॐ जय जगदीश हरे...
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥

चारो धामों को विस्तार में पढ़ने और जानने के लिए जाये, भारत के चार धाम

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