Categories: Stories
| On 2 years ago

Education Today: The irony of modern education.

आज की शिक्षा: आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया।

आज की शिक्षा: आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया।

माला व सतीश पिछले सात माह से सबसे पूछते थे कि उनके लाडले को वो शहर के टॉप के स्कूल में दाखिला कैसे दिलवाए? आखिर उनको पता चल ही गया कि टॉप के स्कूल तब प्रवेश देते है जब बच्चे को थोड़ा गणित, अंग्रेजी, जीके के साथ में क्लासरूम एटिकेट्स आते हो। इन सबकी तैयारी के लिए किसी ब्रांडेड प्री-प्राइमरी स्कूल में डालना होगा।

माला-सतीश की नई तलाश शुरू हुई कि वे अपने छोटे से 3 वर्षीय लाडले के लिए कौनसी शानदार प्री प्राइमरी स्कूल ढूंढे? आखिर घर से 4 किलोमीटर दूर टेक्सी सुविधा वाली प्री प्राइमरी मिल गई। वहाँ के फीस स्ट्रक्चर ने उन्हें हिला के रख दिया। ट्यूशन फीस, एक्टिविटी फीस, बुक्स कोपिस, एसेसरी, ड्रेस, पिकनिक, कल्चर प्रोग्राम और भी ना जाने क्या क्या? खैर। 50 हजार सालाना स्कूल व 18 हजार सालाना टेक्सी के नाम पर

बच्चे की तीन साल में सवा दो लाख में प्री प्राइमरी शिक्षा पूरी हुई। कोई गम नही, आखिर उनके लाडले को टॉप ब्रांड के स्कूल में दाखिला मिल ही गया।

उन्होंने सब रिश्तेदारों व पड़ोसियों में प्रवेश अभियान की सफलता पर मिठाई बांटी। जब स्कूल में फीस जमा करवाने पहुचे तो एकबारगी पैरों के नीचे से जमीन निकल गई। हाथ मे फीस का ब्रोशर लेकर हिसाब लगाया तो पता चला कि पढ़ाई, ट्रांसपोर्ट व अन्य खर्चे मिलाकर सवा लाख सालाना लग जाएंगे। इससे पहले की वे कोई निर्णय लेते कुछ अभिभावकों ने उन्हें बधाई दे डाली कि इस सबसे बढ़िया व कम बजट वाली स्कूल में उनके लाडले को एडमिशन मिल गया।

माला-सतीश ने जैसे-तैसे फर्स्ट किश्त जमा करवाई व बाकी किश्तों का जुगाड़ कैसे करेंगे की चिंता लेकर घर पहुंच गए। सतीश की अंकगणित अच्छी थी उसने हिसाब लगा लिया कि आज की दरों पर उसे आने वाले 12 सालों में 16 लाख व मुद्रास्फीति को जोड़ कर स्कूल को भविष्य में 20 लाख भरने ही है।

ये 12 साल बड़ी मुश्किल से ही गुजरे लेकिन एक उम्मीद थी कि 12 साल के बाद उनके लाडले की सीधा आईआईटी या आईआईएम या किसी लॉ कॉलेज में एडमिशन मिलना ही है। इसके बाद बच्चे को तब के हिसाब से बड़ा पैकेज मिलेगा और हमारी कोस्ट कवर हो जाएगी। आखिर लाडले के लिए इतना तो बनता ही है।

वक्त के पंख लगे होते है।

वक्त गुजर गया। लाडला 12वीं कक्षा में पास भी हो गया। रिजल्ट भी अच्छा ही रहा। लाडले ने पूरी मेहनत की और 85 फीसदी नम्बर भी प्राप्त कर लिए लेकिन लाडला क्या करे? बहुत से बच्चों ने 98 फीसदी तक नम्बर प्राप्त किये थे।

माला व सतीश ने बहुत प्रयास किये की उनके लाडले को कोई टॉप का कॉलेज या प्रोफेशनल डिग्री में एडमिशन मिल जाये लेकिन लाडले ने जिद्द कर ली कि वह आईआईटी या मेडिकल में प्रवेश लेगा। इनके एंट्रेंस टेस्ट की तैयारियों का पता लगाया तो जानकारी मिली कि कोटा जैसे किसी बड़े सेंटर में तैयारी करनी पड़ेगी।

सतीश ने बड़ी मुश्किल से अपना बीमा व अन्य संसाधनों से जुगाड़ करके लाडले को कोटा भेजा। कोटा के खर्चों ने पूरी कमर तोड़ कर रख दी। एक साल का खर्चा भी बहुत भारी पड़ा। एक लाख फीस व एक लाख का दूसरा खर्च। पहला साल निकला। लाडले ने तमाम कोशिश की लेकिन एडमिशन सामान्य कॉलेज में ही मिला। आखिर सतीश व माला ने एक्सपर्ट ओपीनियन भी ली।

इन एक्सपर्ट ने समझाया कि आईआईटी में प्रवेश नही हो तो किसी नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में डाल दो। वहां से डिग्री के बाद अच्छा पैकेज मिलेगा।
नामी कॉलेज में एडमिशन तो मिला लेकिन फीस स्ट्रक्चर ने सतीश के कदमो से जमीन छीन ली। साढ़े चार साल की डिग्री का कुल खर्च 24 लाख तकरीबन था। इतनी राशि का सपना भी सतीश ने कभी नही देखा था। माला व लाडले ने जिद्द की तो सतीश बैंकों के चक्कर काटने लगा।

आखिर बैंक ने एजुकेशन लोन दे दिया। डिग्री भी मिल गई। प्लेसमेंट में लाडले को आखिरकार 9 लाख का पैकेज मिला। पूरे मोहल्ले में लड्डू बटे। समय बीतने लगा। एक दिन सतीश व माला पुत्र से मिलने उसके शहर गए तो दंग रह गए।

सतीश ने देखा उसका लाडला एक कमरे में दूसरे पार्टनर के साथ रह रहा है। सतीश ने पूछा तो लाडले ने बताया। उसको 9 लाख को जो पैकेज मिला वह झूठा है। कम्पनी टैक्स, फेसेलिटी, सिक्योरिटी, पार्किंग, फ्यूचर सेफ्टी के नाम पर दो लाख काट लेती है।बाकी 7 लाख पर टैक्स के बाद 6 लाख ही बचता है। 6 लाख यानी महीने का 50 हजार। उसमें से एजुकेशन लोन की 28 हजार किश्त के बाद उसके पल्ले 20 हजार ही रहता है।

माला-सतीश पस्त हो गए।

यह आज की शिक्षा की व्यथा हैं।