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Educational Philosophy: Meaningfulness

शिक्षा दर्शन: अर्थानुक्रम ।

किसी भी भाषा के मूल में विचार व अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण होती है जो कि शिक्षा, संस्कार, संस्कृति, स्थान, साहित्य से निरन्तर समायोजित होती है। भाषा नाद का सूचक है व नाद प्रकृति की अभिव्यक्ति है। प्रकति उस परमात्मा को प्रकट करती है जो प्रत्येक जीव के अन्तस्थ व ब्रह्मांड के मूल में विराजित है।

भाषा का न्यूनतम परिमाण अक्षर व अक्षर की प्रारम्भिक परिणीति शब्द से है। शब्द आरम्भ है एक यात्रा का जिसकी मंजिल अज्ञात है। प्रकृति व्यक्त प्रत्येक शब्द, वाक्य, कथन को अनादि काल तक अपने बाह्य व आंतरिक मण्डल में सहेजती हैं।

शब्द

की यात्रा से पूर्व विचार व विचारार्थ मानसिक मंथन पश्चात शब्दार्थ यात्रा का आरम्भिक बिंदु बनता है। शब्दार्थ का महत्व सतही ही होता है। शब्दार्थ में भाव के मिलने से भावार्थ उतपन्न होता है जो कि अनेक स्तिथियों परिस्थितियों के निर्माण का कारक हैं।

मनुष्य जीवन की सार्थकता व ज्ञान के परीक्षण हेतु

भावार्थ को ज्ञानार्थ के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। ज्ञानार्थ आकलन व अवलोकन से सम्पूर्णता की जानकारी होती है। यह सम्पूर्णता ही इतिहास की रचना व भविष्य की आधारशिला बनती है।

शिक्षा का दायित्व है कि अक्षर व शब्द अभियुक्त नही बने अतः उनको सत्य की कसौटी पर कसा जाता है व प्रत्येक रचना की जाँच उसके सत्यार्थ से की जाती हैं।

हम शिक्षक कोशिश जारी रखें कि कक्षाकक्ष में अध्ययन के दौरान व सामुहिक आचरण में प्रत्येक शब्द व अभिव्यक्ति को परमार्थी रखा जाए। परमार्थ से ही सम्पूर्णता में समरसता स्थापित हो सकती हैं।
सादर।
सुरेन्द्र सिंह चौहान।