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Famins and Droughts in Rajasthan: history, Famine related Proverbs and related information.

अकाल- राजस्थानी दोहों में!

राजस्थान में अकाल एवम सूखा: इतिहास, अकाल सम्बन्धित स्थानीय कहावतें, छप्पनिया / छपनिया काल ।

अकाल- राजस्थानी दोहों में!
अकाल तीन प्रकार के होते हैं!
1. अन्न
2. जल और
3. तृण !
वर्ष 1892 ई. के पहले के अकालो का वर्तान्त नहीं मिलता हैं! कर्नल टॉड ने अलबत्ता दो अकालो का जिक्र किया हैं! एक तो 11 वीं शताब्दी में पड़ा था जो 12 वर्ष तक रहा था और दूसरा सन 1661 में पड़ा था जब की कांकरोली (मेवाड़) में राजसमंद झील बनाई गई थी!

राजपूताने में अकाल

इसी प्रकार ई. सन 1746, 1755, 1783 व 1804 में भी

अकाल पड़े थे परन्तु इनका विशेष वृतांत नहीं मिलता है! राजपूताने में ई. सन 1812, 1868, 1877,1891, 1895,1899, औऱ 1909 में बड़े अकाल पड़े थे!

अकालों मैं बहुधा लोग मवेशी लेकर मालवा, सिंध व आगरा की और चले जाते थे और वर्षा होने पर वापस लौट आते थे!

रेल और सड़कों के बनने से और खान पान की वस्तुओ के भाव सर्वत एकसमान रहने से अकाल की विभीषणता का अब अनुभव नहीं होता हैं! अकाल के समय बहुधा राज्यो में अब अकाल रहत कार्य खुल जाते हैं!
तात्कालिक राजपूताने में भी राज्यो द्वारा अकाल रहत कार्ये खोल कर सड़के, इमारत निर्माण कार्य, तालाब निर्माण कार्य करवाये

जाते थे! धनी लोग गरीब खाने भी अकाल पीड़ित लोगो के लिए खोलते थे!
राजपूताने के पश्चिम भागों में यह कहावत है कि प्रत्येक तीसरे वर्ष एक अकाल पड़ जाता है! पुराने समय से एक दोहा प्रचलित है जिसमे पश्चिमी राजस्थान में अकाल कहाँ कहाँ अधिकतर रहा करता है , इसका वर्णन किया गया है-

पग पुंगल धड़ कोटड़े, बाहा बायडमेर !

जोयो लादे जोधपुर, ठावो जैसलमेर !!

अर्थात अकाल कहता है की “मेरे पैर पुंगल देश( बीकानेर) में और धड़ (शरीर के बीच का हिस्सा) कोटड़ा में और भुजाये बाड़मेर में स्थाई रूप से है और कभी कभी तलाश करने पर जोधपुर में भी मिल जाता हुँ परन्तु मेरा जैसलमेर तो मेरा ख़ास ठीकाना हैं!

दुकाल और सुकाल

दुकाल और सुकाल का होना सर्वथा बारिश पर निर्भर होने के कारण यहाँ के लोग हवा और दूसरे प्राकृतिक के आधार पर पहले से पूर्वानुमान लगाने का प्रयास करते रहते है और इसी कारण स्थानीय निवासियो ने अपना एक “वर्षा विज्ञानं” का भी निर्माण कर लिया था! जो कई कहावतो और तुकबंदियों में बहुत से ग्रामीण लोगो के मुह से आज भी सुना जा सकता है!

तीतर पंखी बादली विधवा काजल रेख!

वा बरसे आ घर करे तामे मीन न मेख !!

यानी कि यदि आकाश में तीतर पंखी बादली और विधवा स्त्री की आँख में काजल

की रेखा दिखाई दे तो समझना चाहिए कि – पहली तो अवश्य वर्षा करेगी और दूसरी अवश्य ही घर कर करेगी( नया पति चयन करेगी) इसमें कुछ भी संदेह नहीं हैं!

ऊगन्तरो माछलो आथमतेरो भोग1

डंक कहे हे भड्ड्ली नदियां चढ़सी गोग!!

यदि प्रातःकाल को इंद्रधनुष, सांयकाल को सूर्य की लाल किरणे दिखाई दे तो समझना चाहिए कि नदियो में बाढ़ आवेगी! ऐसा डंक भड्ड्ली से कहता है!

चेत चिड़पड़ों सावन निर्मलो!

यदि चैत्र में छोटी छोटी मेह की बुँदे गिरे तो सावन में वर्षा बिलकुल नहीं होवे!

(राजपूताने के इतिहास से साभार)