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फ़िल्म फुटपाथ - दिलीप कुमार की एक शानदार फ़िल्म | Film Footpath - A Great Film By Dilip Kumar

Flim Footpath (फ़िल्म फूटपाथ) सन 1953 में रिलीज हुई थी । दिलीप कुमार की इस फ़िल्म को आज भी विषयपरक, गम्भीर व यथार्थवादी फ़िल्म माना जाता है। फ़िल्म फूटपाथ अनेक सोशल मंचों के साथ ही यूट्यूब पर भी उपलब्ध है। आपको यह फ़िल्म अवश्य देखनी चाहिए क्योंकि इस प्रकार की फिल्म्स अव्वल अब तो निर्मित नही होती है तथा ऐसी फिल्मों को बनाने का माद्दा अब के फिल्मकारों में व्यावसायिक कारणों के चलते शायद बचा भी नही है। बॉलीवुड के महानतम अभिनेताओं में से एक स्वर्गीय दिलीप साहब को हम इस फ़िल्म को गम्भीरता से देखकर सच्चे मन से भावभीनी श्रद्धांजलि भी दे सकते है। आइये, दिलीप कुमार साहब की इस फ़िल्म फूटपाथ Film Footpath के बारे में चर्चा कर फ़िल्म का विश्लेषण (RIVIEW) करते हैं।

फ़िल्म फूटपाथ की स्टार कास्ट | Star Cast Of The Movie Footpath

फ़िल्म का निर्माण ज़िया सरहदी ने किया था तथा मुख्य किरदारों में दिलीप साहब, मीना कुमारी, रोमेश थापर, अनवर हुसैन, अचला सचदेव, सुमति लाज़मी, रमेश ठाकुर, कुलदीप अख्तर, जानकीदास, जगदीप इत्यादि कलाकार थे। फ़िल्म के आर्ट डायरेक्टर आईएस फोफलिया व जुगनू थे। फ़िल्म की सिनेमा फोटोग्राफी एम राजाराम ने की थी। फ़िल्म को शानदार तरीके से एडिट करने की जिम्मेदारी शिवाजी अवधन्त ने पूर्ण की थी। ए एन कपूर ने फ़िल्म को शानदार तरीके से प्रोसेस किया था।

खय्याम जैसे महान संगीतकार ने फ़िल्म फूटपाथ में संगीत दिया था। मजरूह सुल्तानपुरी एवम सरदार जाफरी ने फ़िल्म के गानों को अपनी सशक्त लेखनी से शब्द अर्पित किए थे। फ़िल्म के गानों को आशा भोंसले व तलत महमूद ने अपनी मखमली आवाज से सजाया था। फ़िल्म के कलाकारों को सजाने-सवारने का जिम्मा रघुनाथ के कंधों पर था। फ़िल्म रणजीत मूवीटोन स्टूडियो की प्रस्तुति थी तथा फ़िल्म को लिखा जिया सरहदी ने था।

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फ़िल्म फुटपाथ की कहानी | Story Of Film Footpath

फ़िल्म फुटपाथ मुम्बई के दैनिक अखबार "धरती" के पत्रकार नोशू एवम उसके भाई बानी के साथ अन्य पात्रो की भी कहानी हैं। पत्रकार नोशू को भी आखिर भृष्टाचार की दुनिया मे प्रवेश के लिए एक हजार की जरूरत आ पड़ती है। वह एक अच्छा व्यक्ति है लेकिन आखिरकार पैसा भी तो चाहिए? बानी अपने स्कूल की फीस से एक हजार का जुगाड़ करता है तथा नोशू अपराध की दुनिया मे प्रवेश। बानी द्वारा स्कूल में की गई 1 हजार रूपये की चोरी आखिरकार खुल जाती है तथा उसे जल्द अज जल्द रुपये जमा करवाने का कहा जाता हैं।

नोशू कालाबाजारी के धंधे में शुरुआत कर देता है तथा बानी से लिये एक हजार उसको लौटा देता हैं। बानी को पुरातन मूल्यों पर चलने की आदत है जबकि नोशू को वर्तमान हालातों में रुपये कमाने की आवश्यकता प्रतीत होती है अतः दोनों के विचारों में टकराव शुरू ही जाता हैं। नोशू को एक तरफ पैसा कमाने की जिद्द है वही दूसरी तरफ उसके मन मे गरीबों के प्रति हमदर्दी है।

नोशू धन कमाने की हसरत में अपराध के जंगल मे घुस जाता है तथा बानी अपनी संघर्ष गाथा को जारी रखता है। वक्त का पहिया घूमता जाता हैं।

फ़िल्म फूटपाथ के बेमिसाल सम्वाद | Amazing Dialogues From The Movie Footpath

  • ताज्जुब है कि जिन लोगों के पास खाने को फूटी कौड़ी नही होती उनके पास जहर खाने का पैसा कहा से मिल जाता हैं।
  • घोष बाबू, जीना कितना मुश्किल है और मरना कितना आसान हैं?
  • पैसा जब नही आता है तो नही आता है लेकिन जब आने लगता है तो आने ही लगता है।
  • सुनने में तो यही आया है कि पैसा बेवकूफों के पास जल्दी आता है।
  • रात बहुत लंबी मालूम होती है जितनी सोते में कट जाए अच्छा होगा।
  • दमड़ी के निखट्टू को दुश्मन ना समझू तो क्या समझू?
  • सौ रुप्पली तनख्वाह में अपना तो घर नही चलता ऊपर से भाई का ठेका ले रखा है। (यहां पर यह समझने वाली बात है कि 1953 में अध्यापक की तनख्वाह 100 ₹ थी जब कि आज 2021 में यह 1 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है लेकिन हालात जस के तस है।)
  • रामबाबू, रात ही के तो वक़्त रोशनी की जरूरत पड़ती हैं। लेकिन अपने को तो दिन के वक्त भी अँधेरे की जरूरत पड़ती हैं वरना अपना धंधा कैसे चले?
  • रामबाबू, काले धंधे के लिए अंधरे की ही नही अंधेर की भी जरूरत होती है।
  • काला बाजार हमारे बाप की जागीर तो है नही। हम तो कहते है कि कोई भी आये और थोड़ी सी पूँजी लगाकर कमा ले।
  • महल क्या करेगा जी। मुझे तो दुनिया ही इतनी तंग और छोटी महसूस होती है कि जिससे दिल घबरा जाए।
  • इस दुनिया की रीत ही अजब है जिस दिये से रोशनी फूटती है धुँआ भी उससे ही निकलता है।
  • जी, ये लोग क्या? और हम लोग क्या? इस धंधे में कोई भी भरोसे के काबिल नही हैं।
  • ठीक बात है। पैसा जोड़ो ओर बाकी छोड़ो। राम भला करेगा।
  • नोशू, ठीक -ठीक बता की ये रुपया कहा से आ रहा है। आज तेरे गुस्से पर मुझकों प्यार नही आएगा।
  • जिस तरफ देखता हूँ अंधेरा ही अंधेरा है । लेकिन कोई तो सूरत होगी इस अंधेरे पर काबू पाने की।
  • मैं कुछ नही जानता हूँ। इस जमाने मे बर्बादी का बीज मैने थोड़ी बोया हैं।
  • आप बाहर से जितने खुश नज़र आते है, उससे ज्यादा अंदर से परेशान नज़र आते हैं।
  • मेहनत मजदूरी का एक रुपया हराम के दस हजार से अच्छा हैं।
  • अब मैं बानी के साथ नही रहूँगरहूँगा, कही और चला जाऊँगा। गरीब रहकर इंसान जितना ज़लील हो सकता है उतना जलील हो चुका हूँ मैं।
  • वैसे भी थी तो गरीबज़ जमीन के बराबर और इंसान ज़मीन पर पाँव ना रखे तो रखे भी कहाँ पर ?
  • अपनी अपनी पूँजी है ठाकुर साहब। आपका पैसा है अपना भेजा हैं।
  • ना जाने आपको पैसे से इतना प्यार क्यूँ है? जी अब तो पैसे को मुझसे प्यार हो गया है। दिन-रात मेरे पीछे पीछे घूमता रहता हैं।
  • पैसे के लिये दुसरो को बेवकूफ बनाने में बड़ा मजा आता है।
  • जीना है तो काम-काज करना ही पड़ेगा। मेहनत तो करनी ही पडेगी।
  • घर बनना मुश्किल होता है मगर टूटना आसान होता हैं। इसीलिए सोच कर इतना मजबूत बना लेना चाहिए कि फिर टूट ना सके।
  • आज बुरा वक्त जा कर बेच ही आता हूँ।
  • भगवान अगर है तो सब ठीक कर देगा अगर जो नही है तो हम खुद ही देख लेंगे।
  • मेरे दिल से बड़ा दुनिया मे कोई बंगला नही हैं।
  • अरे! भूखों मर जाए तो ठीक है लेकिन ऐसा पैसा अपने घर मे नही रखूंगा।
  • तुम चले आओ बानी, सचमुच चले आओ। अपने साथ उस दुनिया को ले आओ जिससे मेरे दिल का बहुत गहरा रिश्ता हैं।
  • भाइयन का झगड़ा है सुलह हो ही जाए तो अच्छा हैं।
  • उल्लू कही का। भला आदमी ही तो बेवकूफ होता हैं।

फ़िल्म फूटपाथ की खास बातें | Highlights Of The Film Footpath

फ़िल्म फुटपाथ में एक दृश्य में खाना खाते हुए एक व्यक्ति को टकटकी लगाकर देखते छोटे से बालक मोनू को देखकर गरीबी के सच्चे मायने पता चलते हैं।

फ़िल्म का नाम है फुटपाथ। देखिए एक छोटा बच्चा भूख के कारण किस प्रकार विचलित हैं।
फ़िल्म का नाम है फुटपाथ। देखिए एक छोटा बच्चा भूख के कारण किस प्रकार विचलित हैं।

फ़िल्म फूटपाथ का एक गाना सुहाना है ये मौसम, सलौना है ये साजन। आशा दीदी की मीठी आवाज का यह गाना आज भी शानदार है। इस गाने में खास बात है गाने का फिलर। गाने का फिलर अर्थात वे शब्द जिनका अर्थ तो नही होता लेकिन वे गाने की रिदम बना कर रखते है ।

फ़िल्म फूटपाथ का एक विशेष किरदार बिहारी बाबू वर्तमान सन्दर्भ में | A special character of the film Bihari Babu in the present context

यह एक बड़ा मजेदार किरदार है जो कि मोहल्ले वालों को एक दूसरे के घर की बाते शेयर करता है। आज का सोशल मीडिया तब का बिहारी बाबू के समान ही कार्य करता है। जिस प्रकार बिहारी बाबू दुसरो की निजी बाते शेयर करता है वही कार्य अब इन प्लेटफार्म पर हो रहा है।