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Film Kalank: Story, Dialogues, Review and Recommendation

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कलंक: इस साल की सबसे बड़ी स्टारकास्ट युक्त फ़िल्म में पहले दिन किया रिकॉर्ड बॉक्स ऑफिस कलेक्शन।

फ़िल्म कलंक: बेस, स्टोरी, सम्वाद व समीक्षा।

निर्माता करण जौहर व साजिद नाडियाडवाला की 17 अप्रैल को निर्देशित फिल्म का निर्देशन व पटकथा लेखन अभिषेक वर्मन ने किया है। फॉक्स स्टार स्टूडियो की इस पेशकश में संगीत प्रीतम का व रनिंग टाइम 166 मिनट है। यह फ़िल्म 5500 से अधिक स्क्रीन पर रिलीज़ हुई है एवम पहले दिन का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 22 करोड़ है। फ़िल्म का अनुमानित बजट 150 करोड़ है।

फ़िल्म कलंक: स्टारकास्ट

फ़िल्म स्टारकास्ट बेमिसाल है- फ़िल्म में अनुभवी संजय दत्त व माधुरी दीक्षित के साथ युवा वरुण धवन, आलिया भट्ट व सोनाक्षी सिन्हा हैं।

फ़िल्म कलंक: स्टोरी

फ़िल्म 1944 के कालखंड की इस फ़िल्म की कहानी हुश्नाबाद की सत्या (सोनाक्षी सिन्हा) व ग्राम की रूप (आलिया भट्ट) से आरम्भ होती है। गम्भीर बीमारी से पीड़ित सत्या रूप के सामने यह प्रस्ताव करती है कि रूप सत्या के मरने के बाद उसके पति देव चौधरी (आदित्य रॉय कपूर) से विवाह करेगी। रूप अपनी बहनों की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए इस प्रस्ताव को स्वीकृति देती है लेकिन वह अविलम्ब विवाह की शर्त रखती है। वह शादी के बाद बलराज चौधरी (संजय दत्त) के पुत्र देव चौधरी के साथ रहने लगती है।
फ़िल्म की कहानी में बदनाम मोहल्ले हीरामण्डी में तलवार बनाने जफर (वरुण धवन)का प्रवेश होता है। रूप की जिद्द पर उसे शास्त्रीय संगीत सीखने हेतु हीरामण्डी तवायफ बहार (माधुरी दीक्षित) की हवेली में जाने की इजाजत मिलती है। हीरामण्डी में ही रूप व जफर की मुलाकात होती है। जफर व रूप की मुलाकाते घनिष्ठता में बदलने लगती है।
जफर बलराज चौधरी व तवायफ बहार का पुत्र होता है एवम वह अपनी जिल्लत का बदला बलराज के पुत्र देव चौधरी की दूसरी पत्नी रूप को छीन कर निकालना चाहता है।

फ़िल्म कलंक: म्यूजिक

फ़िल्म के आरम्भ में "रंग बरसे रे, मन तरसे रे" में एवम "बाकी सब फर्स्ट क्लास है" में भारतीय वाद्ययंत्रों व बेसिक्स का प्रयोग अच्छा प्रतीत होता है। "बिल्लोरी निगाहों से करें इशारे" जैसा एक आइटम नम्बर भी फ़िल्म में रखा गया है।

फ़िल्म कलंक: अभिनय

फ़िल्म में माधुरी व संजय दत्त ने निःसन्देह बेहतरीन अभिनय किया है। आलिया भट्ट, सिद्धार्थ व वरुण धवन ने पूरी शिद्दत से किरदार निभाया है। सोनाक्षी को और अच्छा स्कोप मिलना चाहिए था। सोनाक्षी एक बेहतरीन अदाकारा है।

फ़िल्म कलंक: सम्वाद।

1. जो आदमी अपने हक के लिए नही लड़ा वो अवाम के हक के लिए क्या लड़ेगा?
2. लोगों के काम मे ध्यान देना सीख, उनके बाप के नाम में नही।
3. मेरी जिद्द और उनके असल के बीच मेरी जिद्द जीत गई।
4. राग में नमक लाने के लिए नमकीन जिंदगी जीनी पड़ती है।
5. हमारा तर्जुबा है कि जो विवाह की वेदी का चक्कर काट लेता है उसके भीतर की आव बुझ जाती हैं।
6. शुक्र बेइज्जती का करते है क्योंकि असली काबिलियत उसी से मिलती हैं।
7. हद्दे सियासतों की होती है सोच की नहीं।
8. जिस दिन मुहब्बत हो जाएगी, मकसद भी मिल जाएगा और मौत से डर भी लगने लगेगा।
9. लाहौर का पुराना नाम लुहापुर था यानी लोहारों का शहर।
10. अपनी जिंदगी के लिये किसी को जिम्मेदार मत ठहराओ।
11. फेंकी हुई चीजें अक्सर सड़ जाती है।
12. जब किसी और की बरबादी जिसे जीत जैसी लगने लगे तो उससे ज्यादा बर्बाद कोई और नहीं होता है।
13. अगर हम जाति बहस में धर्म को घसीटने लगेंगे तो मुल्क हमेशा जलता ही रहेगा।
14. आजादी की कीमत बंटवारा है। इस बात को जितनी जल्दी समझेंगे उतना बेहतर रहेगा।
15. इश्क़ की गलियां बड़ी गीली होती है जिसमें आशिक मुँह के बल गिरते हैं।
16. कुछ रिश्ते कर्जो की तरह होते है जिन्हें निभाना नही चुकाना पड़ता हैं।
17. अनजान को राज बताना बहुत आसान है, मन हल्का हो जाता है व इज़्ज़त भी बनी रहती है।
18. अपनी औलाद को बचाने की कशमकश में लोग उन्हें प्यार करना भूल जाते हैं।
19. ताकत के सामने उसूल की कभी नही चलती है।
20. मोहब्बत उससे करते है जो आपकी इज्जत कर सके, आपकी मोहब्बत से ज्यादा आपसे मोहब्बत कर सके।
21. नाजायज मुहब्बत का अक्सर तबाही ही होता हैं।
22. गुस्से में किये फैसले अक्सर गलतियों में तब्दील होते है।
23. पति-पत्नी का रिश्ता ज़ोर से नही प्यार से बनना चाहिए।
24. लकीरे खींचने से दुनियां छोटी या बड़ी नही होती बस हजारों लोग बिखर जाते हैं।
25. मुहब्बत और नफरत दोनो के रंग लाल है फर्क इतना सा है कि नफरत से दुनिया मिट जाती है मुहब्बत में खुद को मिटाना पड़ता है।
26. कलंक अक्सर मुहब्बत पर लगते है।
27. फैसला आप पर है कि आप कहानी में क्या देखते है नफरत या मुहब्बत?

फ़िल्म कलंक: प्लस पॉइंट्स।

फ़िल्म की सबसे बढ़िया बात इसका एक सोशल कहानी पर निर्मित होना है। फ़िल्म के सेट्स बहुत सुंदर बनाए गए हैं। फ़िल्म के सम्वाद बहुत बेहतरीन है।

फ़िल्म कलंक: माइनस पॉइंट्स।

फ़िल्म एक अनावश्यक रूप की काल्पनिक कहानी पर निर्मित है। फ़िल्म की कहानी में कुछ बेसिरपैर के इलॉजिकल खिलवाड़ महसूस किए जाते है।

फ़िल्म कलंक: रिकमंडेशन ।

फ़िल्म एक अच्छी मेकिंग है। निर्माण क़्वालिटी, अभिनय, सम्वाद, निर्देशन व टोटल इफ़ेक्ट के आधार पर हम फ़िल्म को "वन टाइम मस्ट वॉच"कैटेगरी में शामिल करते है। आजकल फिल्मों में कहानियों की कमी शिद्दत से खलती है ऐसे में "कलंक" को देखना बहुत सकून पहुँचाता है।