Categories: Entertainment
| On 2 years ago

Film "Notebook" - Review, Story, Dialogue and Recommendation.

फ़िल्म "नोटबुक"- समीक्षा, कहानी व सम्वाद।

दो टीचर्स के बीच का सम्वाद है "नोटबुक"। एक कश्मीरी पंडित और एक कश्मीरी मुस्लिम की दोस्ती की कहानी में कबीर कौल व फिरदौश की प्रेमकहानी " नोटबुक" है। कबीर सर व फिरदौश टीचर बेशक आपस मे पहले नही मिले हो लेकिन एक कॉमन "नोटबुक" के कारण वे एक-दूसरे से बहुत अच्छे से जानने लग जाते हैं।

फ़िल्म के माध्यम से सलमान खान फिल्म्स ने कश्मीर के मुद्दे पर शिक्षा के महत्व के मुद्दे को एक सॉल्यूशन के रूप में पेश किया है एवम निर्देशक नितिन कक्कड़ ने संजीदगी से प्रस्तुत किया है।

सलमान खान फिल्म्स की पेशकश "नोटबुक" नए कलाकारों को लेकर बनाई गई फ़िल्म है। बड़े स्टारस द्वारा नए कलाकारों को लेकर फ़िल्म बनाना एक नया ट्रेंड है जो की सेफ गेम प्लान भी है। इस फ़िल्म का स्टोरी बेसिक्स कश्मीर है।

नोटबुक: फ़िल्म की पटकथा

फ़िल्म की कहानी गूलर के एक प्राथमिक स्कूल से शुरू होती है जो कि शिक्षक के अभाव के कारण बन्द होने की कगार पर थी। अपने पिता द्वारा स्थापित स्कूल को जारी रखने के लिए कबीर नाम का युवा स्कूल में शिक्षक पद पर जॉइन करता है। इस स्कूल के एकांत व दूरस्थ होने के कारण टीचर्स में यह काला पानी के रूप में मशहूर थी। स्कूल पहुँचने पर उस बन्द स्कूल को खोलने पर कबीर पुरानी यादों में खो जाता है। स्कूल में पहले कार्यरत टीचर फिरदौश की "नोटबुक" को वह पढ़ता है व उसमें लिखना भी शुरू करता है।
एक बार फ़िरदौस की वापसी स्कूल में होती है। इस बार बच्चों के पास फिरदौस को बताने के लिए कबीर के किस्से होते है। कबीर-फिरदौश में पुरानी पहचान निकल जाती है।

नोटबुक: फ़िल्म के सम्वाद

1. बच्चें स्कूल तक नही पहुँच सके तो स्कूल को बच्चों तक पहुँच जाना चाहिए।
2. मौसम और माहौल कम ही साथ होते है।
3. यह स्कूल इतनी दूर है कि उम्मीद को

भी यहाँ पहुँचने में वक्त लगेगा।
4. कभी-कभी हमारे खुद के फैसले हमारे।सामने आँख निकालकर खड़े हो जाते हैं।
5. दो एकम दो दो दूनी चार। मास्टरजी आ गए बच्चों आओ बाहर।
6. हम बातें भूल जाते है लेकिन एक्शन कभी नही भूलते।
7. में खुद के लिए काफी हुँ। I am enough for myself.
8. हम अधिकतर मुसीबतों का सामना उनसे भागकर ही करते है।
9. कश्मीर के बच्चों की जिंदगी दो अल्फ़ाज़ में है बस कर्ज और फर्ज।
10. अंधेरे को अंधेरे से नहीं मिटाया जा सकता उसे रोशनी की जरूरत होती हैं।
11. पत्तो से पेड़ नही बनता, ये नहीं जानता था।
12. मुझे नाज है जितना तुम पर, उतना तुम को मुझ पर गरूर होगा।

फ़िल्म "नोटबुक" क्यों देखे?

फ़िल्म एक सन्देश देती है कि कश्मीर के मुद्दे पर बंदूक से ज्यादा कलम कारगर हो सकती है। फ़िल्म की लोकेशन बहुत खूबसूरत है। निर्देशक ने फ़िल्म पर पकड़ बनाये रखी है। नवोदित कलाकारों प्रनूतन बहल व जहीर इकबाल ने खूबसूरत अभिनय किया है। छोटे बच्चों ने फ़िल्म को जीवंत रखा है। फ़िल्म अपने विषय से न्याय करती है एवम एक प्रेमकथा के साथ ही महत्वपूर्ण सामाजिक सन्देश देने में सफल है। फ़िल्म संगीत भी कहानी के अनुरूप है।

फ़िल्म "नोटबुक" की कमजोरी।

फ़िल्म में पटकथा थोड़ी सी उलझन में रहती है। फ़िल्म में प्रस्तुत स्कूल बड़ी अजीब है जो असल जिंदगी में शायद मिलना मुश्किल हो। आतंक की दहशत को फ़िल्म में दिखाया गया है व सुझाव भी दिखाया गया है लेकिन यह मुसीबत कुछ अधिक बड़ी है क्योंकि दहशतगर्दी से निबटा जा सकता है लेकिन उनको शह देने वाली ताकतों से नहीं।

रिकमंडेशन।

इस सप्ताह कोई बड़ी रिलीज नही है। गत सप्ताह रिलीज "केसरी" अभी बॉक्सऑफिस पर धूम मचा रही है। अगर आपने केसरी देख ली है तो "नोटबुक" बेहतर अवसर है। फ़िल्म साफ-सुथरी है अतः फेमिली वाच केटेगरी में शुमार है।