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| On 3 years ago

Folk Tale: Rajasthan's Folk tale, Ancient Folk Story

जो कलेजा देगा, वो बेटा भी देगा!

एक शहर में एक साहूकार था! साहूकार और उसकी पत्नी दोनों धार्मिक प्रवर्ति के थे! साहूकार दम्पति के कोई संतान नहीं थी! दोनों इस बात से बेहद दुखी रहते थे! वह साहूकार एक महात्मा की सेवा हेतु नियमित रूप से जाया करता था! महात्माजी ने साहूकार के ग्रहो को पढ़ कर उसे बता दिया था की अगले सात जन्मों तक भी साहूकार के नसीब में संतान सुख नहीं हैं!

एक रात साहूकार दम्पति अपने घर में सो रहे थे कि एक साधू गली में से आवाज लगता हुआ गुजरा! “एक रोटी- एक बेटा!”, “दो रोटी- दो बेटा”! साहूकार की स्त्री ने साधू की आवाज को सुना और जाकर रसोई में देखा तो एक रोटी बची हुई थी! साहूकार की स्त्री ने बड़े सम्मान के साथ बची हुई रोटी उस साधू को परोस दी! साधू

के आशीर्वचन से साहूकार की स्त्री को गर्भ हुवा और नो महीने पश्चात उसके घर पुत्र का जनम हुवा! पुत्र जनम से साहूकार के घर उत्सव आनंद हुआ!

साहूकार अपने नियमानुसार महात्मा जी की सेवा हेतु उनका भोजन लेकर उनके आश्रम पंहुचा परन्तु पुत्र जनम के कारण उस दिवस रोज के समय से थोडा विलम्ब हो चूका था! महात्मा जी ने जब साहूकार से विलम्ब का कारण पूछा तो साहूकार ने बताया की उसके घर आज पुत्र रतन जनम होने के कारण विलम्ब हो गया था तथा साहूकार ने नमन कर कहा कि” आपके आशीर्वाद से मेरे घर आज पुत्र का जनम हुवा हैं”! साहूकार की बात सुन महात्मा जी चोंक पड़े! उन्होंने विचार मग्न होकर कहा ” साहूकार! तेरे भाग्य में तो सात जनम तक पुत्र नहीं लिखा था , ये चमत्कार कैसे हुआ? इस बात से तो में और मेरा ज्ञान झूठा पड़ गया”!

महात्माजी ने इस विचार किया की इस पुत्र जनम का मर्म भगवन विष्णु से जानना पड़ेगा! महात्माजी विचारमग्न थे, तभी नारद मुनि का वह आगमन हुवा! नारद मुनि ने महात्माजी से पूरी बात जान कर कहा की वे विष्णु लाकर जाकर स्वयं भगवन विष्णु से इस पुत्र जनम के रहस्य का मर्म जानेंगे और इसका ज्ञान वो महात्माजी को करवाएंगे!

नारद मुनि ने तुरंत विष्णुलोक हेतु प्रस्थान किया, वहाँ

जाकर उन्होंने देखा की भगवन विष्णु के महल में बड़ी अफरातफरी मची है, भगवन विष्णु पेट दर्द के कारण बड़े विचलित है! भगवन ने नारद मुनि से कहा की उनके पेट में बड़ी पीड़ा है और यह पीड़ा किसी मनुष्य के कलेजे के लाने से ही मिट सकेगी, और कोई दूसरा उपाय नहीं है! भगवन के वचन सुन नारदजी तुरंत उलटे पैर लोट पड़े!

नारद मुनि महात्माजी के पास आये और भगवन विष्णु के पेट दर्द का हाल बतलाकर मानव कलेजे की जरुरत के बारे में बताया! यह सुन कर महात्मा जी ने कहा की “अपनी अपनी जान सबको प्यारी होती है! भगवन का पेट दुखता है लेकिन में अपना कलेजा निकाल कर कैसे दे दूँ?” महात्माजी ने ये कह कर मना कर दिया! निराश नारद मुनि अन्यत्र गए परन्तु अपना कलेजा देना किसी ने स्वीकार नहीं किया!

आधी रात को वही साधू विचरण करते हुए जब नारद मुनि को मिला तब नारद मुनि ने उस साधू से भगवन के पेट दर्द का हाल और कलेजे की आवश्यकता के बारे में उसे बताया! ये बात जान कर उस साधू ने अविलम्ब अपने चिमटे से अपने वक्ष को चीर कर अपना कलेजा नारद मुनि को सुपर्द का दिया! नारद मुनि उसके कलेजे को लेकर तुरंत विष्णु लोक पहुँचे!

विष्णु लोक पहुच कर नारद मुनि देखते है की भगवन विष्णु शांत भाव से माता लक्ष्मी जी के साथ चौसर खेल रहे थे! भगवन विष्णु ने नारद मुनि के पास कलेजा देखकर पूछा ” नारद जी, ये कलेजा मेरे पेट दर्द को ठीक करने के लिए किसने दिया?” नारद जी ने विस्तार से बताया की काफी लोगो द्वारा मना करने के पश्चात् रात्रि को विचरण करने वाले साधू ने ये कलेजा दिया है तब भगवन विष्णु ने कहा की ” मुनि महाराज! जो इस प्रकार अपना कलेजा निकाल कर दे सकता है, वो किसी को बेटा भी दे सकता है! ये सही है की साहूकार के भाग्य में बेटा नहीं लिखा था लेकिन उसको बेटा मैंने नहीं उसी साधू ने दिया है!”

नारद मुनि सत्य को जान कर लोट पड़े! जब उन्होंने सारी घटना महात्माजी को आकर सुनाई तो महात्माजी ने लज्जा से अपना सर झुका लिया!