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| On 2 years ago

Folk Tale: Story about sacrifice, love and dedication.

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एक कहानी: वो गुड़ नही खाती थी।

बहुत छोटी सी उम्र में घर का चूल्हा-चौका करना उसे बिल्कुल पसंद नही था। गीली लकड़ियों की तपिश से निकलता कसैला धुँआ आंखों को छील देता था। जब तपते चूल्हे से वह गर्म गर्म रोटियों को उतारती थी तो उसकी नन्ही-नन्ही अंगुलियाँ लाल-भभक हो जाती थी। सबके बावजूद भी वो नन्ही सी गीता अपने परिवार की सेवा करती थी क्योंकि रसोई चाहे कितनी भी गर्म हो लेकिन वहाँ रखा गुड़ बहुत मीठा था।

अपने मुँह में मीठे गुड़ की डली रखकर वह गर्मी से तपते तन की व तपिश से सुर्ख अंगुलियों की जलन को भूल कर भविष्य के मीठे सपने बुना करती थी। अलसाई दोपहर में जब वो अपनी माँ के दामन में समा जाती तो उसकी माँ कड़वे तेल को उसकी अंगुलियों पर मसल देती थी व रसोई में गुड़ को कम खाने की ताकीद करती थी। गीता सुनती पूरा थी पर काम अधूरा ही करती। रोटी बिना कहे ही सेंकती पर गुड़ बंदिश के बावजूद खाती क्योंकि गुड़ से उसका मीठा नाता था।

वक्त का क्या है? ये तो बदलता ही रहता है पर बुरे वक्त में घड़ी की रफ्तार बड़ी धीमी हो जाती है। अपने जीसा की बीमारी का उसे इल्म था। रसोई में जेठ की गर्मी के बावजूद भी उसे तपन का इलहाम होना कम हो जाता था। भट्टी सी सुलगती रसोई में उसके दिमाग मे कमजोरी से जर्जर होते पिता की काया रहती व मुंह मे गुड़ की मिठास।

अपने नन्हे हाथों से जब रोटी , सब्जी, नमक व गुड़ से सजी थाली जब पिता को परोसती तो उसे जीवन मे स्वर्ग की अनुभूति होती। संध्या समय जब कुंवे पर पानी भरती वहाँ सहेलियों से गाँव भर के समाचार मिल जाते। जब भी किसी की मौत का समाचार मिलता तो वह नन्ही सी बालिका अपनी घघरी को कुंवे पर फेंककर अपने जीसा की छाती से कसकर सिमट जाती। उसे हर हाल में जीसा को मौत से दूर रखना था।

कुंवे पर उसने किसी को कहते सुना कि अगर किसी को अपनी इच्छा पूरी करवानी हो तो मंदिर में जाकर भगवान की मूरत के सामने अपनी सबसे प्रिय चीज का त्याग कर दे। सुनते ही नन्ही गीता मन्दिर की तरफ दौड़ी व भगवान की मूरत के सामने दण्डवत हो गई। जब ख्याल किया तो उसे माँ-जीसा और गुड़ का ख्याल आया। अपने जीसा को याद कर उसने गुड़ का त्याग कर दिया।

रसोई फिर भी तपती थी, रोटियाँ अंगुलियों को जलाती थी, कसैले धुँए से आँखे सुर्ख हो जाती थी, जीसा को लेकर रुलाई फुट पड़ती थी, गुड़ की भेरी भी रसोई में रहती थी लेकिन नन्ही गीता ने कभी गुड़ को नही छुआ। तपती रसोई में कसैले धुँए से उसकी आँखों से पानी गिरता था या आँसू बहते थे। किसी को अंदाजा नही था लेकिन वो गुड़ नही खाती थी।

वक्त बदला अब गीता दादी-नानी बन गई थी। बचपन उसमें तब भी जिंदा था। परिवार की खुशियों में ही अपनी मुस्कान को खोज लेती थी। अपनी तकलीफों की चुभन को चप्पल के नीचे दबा देती थी। उसके उज्ज्वल मन का उजास उसके प्यारे से मुखड़े पर बिखरा रहता था। उसकी दुआ से घर मे खुशियों का बसेरा था लेकिन उसके दमकते चेहरे पर बहुत बारीक से रेखाएं एक चिंता की थी। बुढाती बालिका गीता का युवक पुत्र वर्जित पदार्थ सेवन करता था।

गीता के हाथ से बना गुड का हलवा सब खाते थे, स्वाद से सबका मन कभी नही भरता था, गीता का चूल्हा भी कभी दम नही भरता था। वह सबके लिए बनाती, सबको खिलाती लेकिन एक रोज उसके पुत्र ने देखा कि उसकी माँ हलवे को छू नही पाती थी। पुत्र ने जोर देकर पूछा तो स्नेहमयी गीता ने बताया कि हलवा तो उसे पसंद है पर खा नही सकती क्योंकि वो एक बार फिर गुड़ नही खाती थी।

उसका पुत्र।