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| On 3 years ago

Global Warming and It's Effects, The Earth is in danger.

सारी दुनिया ख़ामोशी से कर रही है इंतजार "कयामत" का।

विश्व का आज सबसे बड़ा मुद्दा यह नही है कि इस धरती पर किसका साम्राज्य रहेगा बल्कि यह है कि यह धरती खुद कितने दिन रह पाएगी? यह स्थापित तथ्य है कि सूर्य से अलग हुआ यह अग्निपिण्ड बहुत दीर्घकाल में मनुष्यों के बसने लायक बना परन्तु अब यह क्रमशः विनाश की तरफ अग्रसर है।

हिन्दू शास्त्रों में मूल रूप से प्रलय के चार प्रकार बताए गए। पहला किसी भी धरती पर से जीवन का समाप्त हो जाना, दूसरा धरती का नष्ट होकर भस्म बन जाना, तीसरा सूर्य सहित ग्रह-नक्षत्रों का नष्ट होकर भस्मीभूत हो जाना और चौथा भस्म का ब्रह्म में लीन हो जाना।

ग्लोबल वार्मिंग।

विश्व स्तर पर मौसम

के तापमान का रिकॉर्ड हम पिछले 140 वर्षों से रख रहे है। विश्व का तापमान का रिकॉर्ड देखे तो 2015 को सबसे गर्म वर्ष घोषित किया गया था। इसके बाद 201 को सबसे गर्म वर्ष घोषित किया गया। यह प्रमाण है कि पृथ्वी निरन्तर गर्म होती जा रही है एवम यह ग्लोबल वार्मिंग निरन्तर बढ़ने के आसार है। ग्लोबल वार्मिंग नापने के क्रम में प्रमुख चिंता वर्षभर में रात के न्यूनतम तापमान में होने वाली निरन्तर वृद्धि है।

ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण।

ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण मनुष्यों द्वारा उत्पादित "ग्रीनहाउस गैस" है। एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह के वातावरण में मौजूद कुछ गैसें वातावरण के तापमान को अपेक्षाकृत अधिक बनाने में मदद करतीं हैं। इन गैसों में

कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन आदि शामिल हैं। यदि ग्रीनहाउस प्रभाव नहीं होता तो शायद ही पृथ्वी पर जीवन होता, क्योंकि तब पृथ्वी का औसत तापमान -18° सेल्सियस होता न कि वर्तमान 15° सेल्सियस।
कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन पिछले १०-१५ सालों में ४० गुणा बढ़ गया है। दूसरे शब्दों में औद्यौगिकीकरण के बाद से इसमें १०० गुणा की बढ़ोत्तरी हुई है। इन गैसों का उत्सर्जन आम प्रयोग के उपकरणों एसी, फ्रिज, कम्प्यूटर, स्कूटर, वाहन आदि से होता है। कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्त्रोत पेट्रोलियम ईंधन और परंपरागत चूल्हे हैं।

विकसित देशों को कोई परवाह नही।

यह भी स्थापित तथ्य है कि उपकरणों व परिवहन का सर्वाधिक प्रयोग विकसित देशों ने ही किया है। आज भी सबसे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड गैसों का उत्सर्जन विकसित व्यवस्था द्वारा ही किया जा रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणाम।
ग्लोबल वार्मिंग के निरंन्तर बढ़ते जाने से स्वरूप बारिश के तरीकों में बदलाव, हिमखण्डों और ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और वनस्पति तथा जन्तु जगत पर प्रभावों के रूप के सामने आ सकते हैं।
आज पृथ्वी के सामने सबसे बड़ा खतरा शुद्र ग्रहों के टकराने व ग्लोबल वार्मिंग का है। समुन्द्रों के जलस्तर के बढ़ने से आज पृथ्वी के बड़े हिस्से के जलप्लावित होने की भविष्यवाणी वैज्ञानिक कर रहे है। ग्लोबल वार्मिंग एक तरह से क्रमिक विकास की तरह हो गई है। हम वार्मिंग से बचने के लिए अधिक उपकरण व सुविधाओं का प्रयोग करते जाएंगे व वार्मिंग निरन्तर बढ़ती ही जाएगी।
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का तापमान 3

से 8 डिग्री तक बढ़ सकता है। ऐसा अगर हुआ तो भयंकर विनाश हो सकता है। हजारों लाखों वर्षो से धरती पर जमी बर्फ की चादरें पिघलने लग जायेगी व समुन्द्रों में जलस्तर की बढ़ोतरी से कयामत के समान विनाश आरम्भ हो जाएगा।

कैसे रोके इस कयामत को।

यह कयामत रोकी जा सकती है लेकिन इसके लिए "एथिक्स" बनाने व अपनाने पड़ेंगे। सम्पूर्ण विश्व को एकसाथ होकर प्रयास करने पड़ेंगे अन्यथा अकल्पनीय कीमत देनी पड़ेगी।
अगर हम सभी श्रम प्रधान व त्यागमय जीवन जीना आरम्भ करे तथा इस टेक्नोलॉजी उपयोग में लाये जो बहुत अधिक फ्यूल एफिशिएंसी पर काम करती हो एवम हर व्यक्ति प्रकृति के साथ जीना आरम्भ करे तो ही यह विनाश रुकना सम्भव है।