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Guideline For Headmasters and Principals. Supervision, Inspection and Monitoring.

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2 परिवीक्षण

संस्था प्रधान मार्गदर्शिका : परिवीक्षण।

पार्ट-3

परिवीक्षण करते समय ध्यान देने योग्य बिंदु, मानदण्ड, परिवीक्षण आधार, योजना निर्माण व परिवीक्षण अभिलेख।

परिवीक्षण

विद्यालय के शैक्षिक, एवं भौतिक समुन्नयन की दिशा में सतत प्रेरणा एवं मार्गदर्शन देने हेतु परिवीक्षण किया जाना किसी भी जागरूक संस्थाप्रधान के लिए अति आवश्यक है। इससे शिक्षक, कर्मचारियों व विद्यार्थियों के व्यवसायिक कौशल में निरन्तर गुणात्मक परिवर्तन आता है। जिससे विद्यालय प्रशासन को सुदृढता प्राप्त होती है। यही नही परिवीक्षण से संस्थाप्रधान को उन क्षेत्रों को चिन्हित किए जाने का भी अवसर प्राप्त होता है, जहाँ अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार परिवीक्षण अधीनस्थ के साथ-साथ संस्थाप्रधान की आन्तरिक दक्षता की अभिवद्धि करने का कार्य करता है। यह कहा जा सकता है कि परिवीक्षण कुशल प्रबन्धन द्वारा अपेक्षित परिणाम प्राप्त
करने की दशा में उत्प्रेरक का कार्य करता है।

3.1 परिवीक्षण हेतु ध्यान देने योग्य बिन्दु

1. परिवीक्षण सूचित के साथ-साथ आवश्यकतानुसार असूचित भी किया जाना चाहिए।
2. इस हेतु परिवीक्षत किए जाने वाले क्षेत्रों के अनुसार पूर्व ही विस्तृत योजना का विकास किया जाना चाहिए।
3. परिवीक्षणकर्ता का दृष्टिकोण सकारात्मक एवं उत्प्रेरणापरक होना चाहिए। सार्थक सझाव भी दिए जाने चाहिए, जिससे शिक्षक कर्मचारी को अपने कार्यों के निष्पादन में सहायता मिल सकें।
4. विद्यालय का कार्य क्षेत्र बहुत व्यापक है। अतः संस्थाप्रधान को समस्त प्रवृत्तियाँ यथा-कक्षा गत शिक्षण, लिखित कार्य, प्रवृति कार्य, परिसर व्यवस्था, कार्यालय का परिवीक्षण ही नहीं करना चाहिए, बल्कि सभी प्रवृत्तियों के मध्य सामंजस्य उत्पन्न करने का भी प्रयास करना चाहिए।
5. परिवीक्षण के बाद इसका प्रतिवेदन तैयार कर इसकी अनुपालना सुनिश्चित करनी चाहिए !

3.2 विहित मानदण्ड

परिवीक्षण हेतु विभाग द्वारा निर्धारित मानदण्ड इस प्रकार हैं:-* 30 अध्यापक तक सत्र में तीन बार
* 30 अध्यापक से अधिक होने पर सत्र में दो बार
* कार्यालय का परिवीक्षण सत्र में दो बार
* प्रवृति कार्य (प्रति) सत्र में दो बारविभाग द्वारा निर्धारित इन मानदण्डों के अतिरिक्त भी प्रत्येक क्षेत्र में अधिकाधिक परिवीक्षण करते रहने से शैक्षिक पर्यावरण को प्रभावी बनाया जा सकता है।

3.3 परिवीक्षण का आधार

परिवीक्षण द्वारा व्यावहारिक मार्गदर्शन दिए जाने के लिए संस्थाप्रधान को निम्नांकित आधार विभिन्न परिवीक्षण क्षेत्रों में अपनाने चाहिए।

(अ) कक्षा कक्ष शिक्षण:-

* पूर्व में यदि परिवीक्षण किया गया तो उसकी अनुपालना ।
* शिक्षण-अधिगम क्रियाएँ।
* सहायक सामग्री का प्रयोग।
* कक्षागत अनुशासन एवं शिक्षक-शिक्षार्थी संबंध।
* अभिलेख संधारण की स्थिति।

(आ) लिखित कार्य परिवीक्षण :-

* पूर्व किए गए परिवीक्षण की अनुपालना।
* योजनानुसार जाँच कार्य के प्रति इच्छा शक्ति।
* करणीय कार्य की नियमियतता का निर्वाह।
* अभिलेख संधारण की स्थिति।

(इ) प्रवृति कार्य:-

* पूर्व में किए गए परिवीक्षण की अनुपालना की स्थिति।
* मानवीय एवं भौतिक संसाधनों के नियोजन की स्थिति।
* अभिलेख संधारण की स्थिति।
* प्रवृति कार्य के दायित्व वहन के प्रति निष्ठा।

(ई) कार्यालय:-

* पूर्व में किए गए परिवीक्षण की अनुपालना की स्थिति।
* अभिलेख संधारण की स्थिति।
* कार्य निष्पादन की निरन्तरता एवं इससे
* परिवेदनाओं के निस्तारण में मदद।
* समस्त क्षेत्रों में प्राप्त उपलब्धियों की वैद्यता एवं विश्वसनीयता को भी किसी भी संस्थाप्रधान
को अपने परिवीक्षण का आधार बनाना चाहिए।

3.4 योजना निर्माण

* परिवीक्षण को समयबद्ध संचालित करने के लिए संस्था प्रधान को सूचित अथवा असूचित दोनों ही प्रकार के परिवीक्षण की योजना सत्रारंभ से पूर्व ही तैयार कर लेनी चाहिए। इस हेतु कार्य दिवसों के सन्दर्भ योजना विकसित करने के लिए शिविरा पंचांग का अवलोकन आवश्यक रूप से करना चाहिए।
* संस्थाप्रधान अपनी सीमा एवं प्रबन्ध कौशल का उपयोग कर व्यावहारिक योजना बनाए. इस हेतु निम्नांकित समेकित प्रारूप को प्रयुक्त किया जा सकता है।

3.5 परिवीक्षण अभिलेख

* योजनानुसार निर्धारित दिनांक (यदि अवकाश हो तो आगामी कार्य दिवस पर) को परिवीक्षण करने बाद इसका प्रतिवेदन तैयार कर संबंधित शिक्षक/कर्मचारी को सूचित कराया जाना चाहिए।
* कक्षा कक्षा शिक्षण, लिखित कार्य, प्रवृति कार्य एवं कार्यालय कार्य के प्रतिवेदन प्रारूप बाजार में उपलब्ध रहते हैं। कक्षा कक्ष शिक्षण
* दैनन्दिनी संधारण व पाठयोजना
* उददेश्य
* प्रस्तावना
* शिक्षण अधिगत संस्थितियाँ
* सहायक सामग्री का उपयोग व श्यामपट्ट का कार्य
* लिखित कार्य की मात्रा व गुणवत्ता
* सुझाव

लिखित कार्य:-

* योजनानुसार क्रियान्विति
* अनुक्रमणिका
* कार्य की मात्रा व गुणवत्ता
* रख रखाव
* नियमितता
* अनुवर्तन कार्य
* सुझाव

प्रवृत्ति कार्य :-

* योजनानुसार क्रियान्विति
* उद्देश्य की संप्राप्ति
* शिक्षार्थी, शिक्षक एवं अभिभावकों की सहभागिता
* मानवीय या भौतिक संसाधनों का उपयोग
* प्रतिवेदन
* सुझाव

कार्यालय कार्य -(संस्थापन, लेखा, भण्डार, सामान्य शाखा आदि)

* भौतिक सत्यापन की स्थिति
* अभिलेखों का अपडेट संधारण
* रख रखाव
* शेष प्रकरणों की स्थिति
* कार्य निस्तारण प्रक्रिया
* कर्मचारी, शिक्षक, शिक्षार्थी अन्तर्सम्बन्ध एवं इसका विद्यालयी पर्यावरण पर प्रभाव

परिवीक्षण की उक्त योजनाबद्ध क्रियान्विति के साथ जहाँ इसकी अनुपालना निरन्तर मोनिटरिंग आवश्यक है वहीं इन सभी क्षेत्रों में परिवीक्षण एवं अवलोकन से उभरने वाले बिन्दुओं पर अधीनस्थों के साथ प्रति माह बैठक कर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। संस्थाप्रधान को इससे अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने में सहयोग प्राप्त होगा।

प्रभावी परिवीक्षण व शिक्षा में गुणवत्ता

शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा की गुणवत्ता बढाये जाने की बात आए दिन बैठको, सामाजिक संगठनो, संचार माध्यमों में होती रहती है। इसको लेकर शिक्षा के क्षेत्र में नये प्रयोग व नवाचार भी होते है।आधुनिक समय में राजकीय विद्यालयों में शिक्षा में गुणवत्ता बढाने की बात करना औचित्यपूर्ण लगता है जहाँ दिनों दिन घटते नामांकन की समस्या से अधिकारीगण व शिक्षक चितित है।

शिक्षा में गुणवत्ता बढाने के आवश्यक कारक:-

(1) विद्यालय का भौतिक वातावरण:-

* विद्यालय परिसर अच्छा हो, साफ सुथरा हो व पेड़ पौधों से सुसज्जित हो।
* कक्षा कक्ष
* शौचालय
* वाचनालय व पुस्तकालय
* खेल मैदान
* पेयजल सुविधा
* शिक्षण सामग्री

(2) विद्यालय में शिक्षकों की उपलब्धता:-

अध्यापन गतिविधियों में रुचि रखने वाले पर्याप्त संख्या मे शिक्षक हो।(3) सह शैक्षिक गतिविधियों का आयोजन हो।

(4) प्रभावी परिवीक्षण हो:-

यह सहज मानवीय गुण है। यदि उसके किये कार्यों की प्रशंसा हो तो वह अपने किये कार्यों में सुधार व गुणवत्ता लाने का प्रयास करता है और यदि ऐसा न हो तो उसके कार्य औपचारिकता मात्र बनकर रह जाते है।
ऐसा ही शिक्षकों व विद्यालय के संस्थाप्रधान के साथ भी होता है। यदि उन्हें कोई देखने वाला हो न हो तो वह निश्चित व निरुपाय बने रहते हैं व अपना कार्य नियमित औपचारिकता मानकर करते है किन्तु यदि उनके कार्य का निरीक्षण किया जाएँ तो अपने कार्य को अच्छा व प्रभावी दिखाने के लिए शैक्षिक नवाचार करते रहते है। अध्यापन की गहन तैयारी करते है। पाठ को बच्चों के लिए रुचिकर बनाते है व उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत होती है। अतः
प्रभावी परीवीक्षण शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने का सर्वोत्तम उपाय है।प्रभावी परीवीक्षण के लिए आवश्यक है कि यह मात्र औपचारिक न हो। इसमें विभाग के नियमित कार्यक्रमों एवं विराम कार्यक्रमों का समयबद मूल्यांकन व समीक्षा कर मार्गदर्शन देना भी है।आज की परिस्थितियों में प्रायः निरीक्षण भी एक औपचारिकता मात्र बन गया है। जिसका कोई प्रभाव कार्यालयों व विधालयों पर नहीं होता है अतः निरीक्षण को प्रभावी बनाना आवश्यक हैं।

जि.शि.अ. द्वारा किये जाने वाले निरीक्षण:-

1. विद्यालय निरीक्षण।
2. बी.ई.ओ. कार्यालय का निरीक्षण।
3. स्वयं के कार्यालय का निरीक्षण |
4. खेलकूद व अन्य सहशैक्षिक गतिविधियों का निरीक्षण।
5. एस.एस.ए. द्वारा स्थापित के.जी.बी. आवासीय विद्यालय, बी.आर.सी. केन्द्र व आदि का निरीक्षण।

परिवीक्षण कौन-कौन कर सकते हैं:-

1. संस्था प्रधान द्वारा शिक्षकों के अध्यापन, स्वयं के कार्यालय, सहशैक्षिक गतिविधियों का परिवीक्षण।
2. बी.ई.ई.ओ. द्वारा विद्यालयों व स्वयं के कार्यालय का परिवीक्षण।
3. जि.शि.अ. द्वारा विद्यालयों, बी.ई.ई.ओ व स्वयं के कार्यालय का।
4. उप निदेशक द्वारा विद्यालयों, जि.शि.अ. कार्यालयों व स्वयं के कार्यालय का।
5. निदेशक व उनके कार्यालय के अधिकारी द्वारा मण्डल, जिला व ब्लॉक कार्यालयों व विद्यालयों के साथ-साथ स्वयं के कार्यालयों का।
6. राज्य सरकार में शिक्षा से जुड़े अधिकारियों द्वारा भी शिक्षा से संबंधित कार्यालयों व विद्यालयों का निरीक्षण किया जा सकता है।
7. प्रवेशोत्सव व मुख्यमंत्री शिक्षा संबल अभियान के अन्तर्गत अन्य विभागों के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण किये जा सकते हैं।
8. जिला कलेक्टर द्वारा समय-समय पर निरीक्षण करवाये जा सकते हैं।

निरीक्षण :-निरीक्षण तीन तरह से हो सकते हैं-

अ. सूचित
ब. असूचित
स. पैनल निरीक्षणसूचित में विद्यालय / कार्यालय का निरीक्षण सूचना निश्चित माह व दिनांक की देकर किया जाता है। असूचित निरीक्षण में बिना सूचना के अचानक किया जाता है। पैनल निरीक्षण में एक दल बनाकर किया जाता है जिसमें शिक्षक/मंत्रालयिक कर्मचारी व लेखाकर्मी आदि सम्मिलित होते हैं।

निरीक्षण के समय क्या-क्या देखा जा सकता हैं:-

1. विद्यालय या कार्यालय का परिसर, साज सज्जा, सफाई व्यवस्था रोशनी बिजली पानी आदि की पर्याप्त व्यवस्था व खेल मैदान आदि।
2. कार्यालय रिकॉर्ड यथा स्कालर रजिस्टर उपस्थिति रजिस्टर, पुस्तकालय रजिस्टर, अवकाश सम्बंधित रिकॉर्ड व आवक-जावक रजिस्टर, परीक्षा से संबंधित अभिलेख आदि।
3. दैनिक डायरी, संस्था प्रधान , शिक्षक व विधार्थी।
4. पोषाहार संबंधी अभिलेख, लेखा।
5. एन.सी.सी./स्काउट व अन्य खेलकूद गतिविधियों संबंधी रिकॉर्ड ।
6. रोकङ-कैश बुक, चुकारा रजिस्टर, बिल व अन्य लेखा संबंधी रजिस्टर।
7. वरियता रजिस्टर-चिकित्सा व यात्रा बिल।
8. पेंशन प्रकरण, सर्विस बुक (कर्मचारी व शिक्षक)
9. एस.डी.एम.सी./एस.एम.सी.बैठक रजिस्टर।
10. चयनित वेतनमान, वेतन स्थिरीकरण।

कक्षा अध्यापन व विषयवार, कालांशवार:-

अध्ययन व अध्यापन का निरीक्षण प्रायः कक्षा में जाकर करना चाहिए। अध्यापन का तरीका, छात्रों की सहभागिता, प्रश्नोत्तर, सहायक सामग्री का उपयोग, छात्र अध्यापक गतिविधियाँ आदि। मुल्यांकन कक्षा के निरीक्षण में छात्रों से उनकी कठिनाइयों व उनसे प्रश्न पूछकर आने वाली समस्याओं के निराकरण के लिए सझाव आदि दिये जाने चाहिए । गृहकार्य व कक्षा कार्य की कॉपी भी देखी जानी चाहिए। छात्रों से उनकी कठिनाइयाँ व समस्या आदि पूछने से उनका आत्मबल बढ़ता है व शिक्षकों की भी अध्यापन के लिए प्रशंसा करनी चाहिए तथा जहां कमी पायी जाए उसके बारे में उसे उचित सुझाव व दिशा निर्देश दिये जाने चाहिए। गत वर्षों के परीक्षा परिणाम के संबंध में भी शिक्षकों व अभिभावकों से चर्चा की जानी चाहिए । विद्यालय के स्टॉफ से व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से चर्चा की जानी चाहिए।परिवीक्षण की एक वार्षिक व मासिक योजना सत्र के प्रारंभ में बनाई जाए। विस्तृत व सूचित निरीक्षण के समय पूर्व में अधिकारियों द्वारा किये गये निरीक्षण व उनकी अनुपालना देखी जानी चाहिए । असूचित निरीक्षण उन विधालयों या कार्यालयों का किया जाना चाहिए जिनका गत वर्षों में विस्तृत निरीक्षण किया गया है।निदेशालय द्वारा राज्य सरकार के निर्देशानुसार जि.शि.अ. व अन्य अधिकारियों के मानदण्ड तय कर रखे हैं जो संलग्न हैं। निरीक्षण की अनुपालना भी भेजी जानी चाहिए।

नोट: विभागीय पुनर्गठन में कुछ नए कार्यालय व पद सृजित हुए है अतः 2014 में प्रकाशित इस मार्गदर्शिका को नवीन सन्दर्भ में लिया जाना चाहिए।

उपरोक्त मार्गदर्शिका का प्रकाशन राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान , उदयपुर (राजस्थान) द्वारा प्रकाशित की गई है।

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