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| On 3 years ago

Hindi Poetry: Hindi ki Vyatha.

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हिंदी कविता: हिन्दी की व्यथा

भारतेन्दु के भारत में क्यूं ,
हिन्दी इतनी बिखर गयी ।
रहिमन के दोहे कहां गये ,
कबिरा की साखी किधर गयी ।

प्रेमचन्द के पन्नो का जो,
जादू बिखरा था जग में ,
वो जादूगरनी हिन्दी जाने,
कहां गयी ,वो किधर गयी ।

भारत की गौरव गाथा का,
जो गान सुनाती थी जग को।
वो विश्व गुरु का ताज लिए ,
वो हिन्दी जाने किधर गयी ।

वो गंगा जमुना सी निर्मल ,
पावनता की रसधार लिए ,
वो कविता की सरिता बन के,
वो सरिता जाने किधर गयी ।

परदेशी भाषा के तप से,
क्यों हिन्दी इतनी सिहर गयी ,
क्यूं रोम रोम दहका इसका ,
क्यूं हिन्दी जाने पिघल गयी ।

महका दो गुलशन को फिर से,
हिन्दी की बगीया फिर महके।
रोम रोम पुलकित हो इसका,
विश्व धरा पर हिन्दी चहके।

रचयिता
गोविन्द सिंह राव
अध्यापक राउमावि
धुम्बडिया,जालोर