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| On 3 years ago

History of Rajasthan: Panna Dhai, Symbol of Sacrifice and Responsibility.

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पन्नाधाय – मातृ स्वरूपा ऎतिहासिक चरित्र !

पन्नाधाय उदयसिंह की धाय माता

पन्नाधाय खींची राजपूतो की बेटी थी और सत्वान सिंह गेहलोत को ब्याही थी! सत्वान सिंह मेवाड़ राजघराने में नौकर थे! इनके कुलदीप नाम का एक ही पुत्र था! इधर मेवाड़ नरेश वीर विक्रमादित्य के पुत्र जन्मा था! इसके पहले जितनी भी संताने पैदा हुई थी उनमे से एक भी नहीं बची थी! इसी लिए वीर विक्रमादित्य ने अपने बच्चे के पालन पोषण के लिए पन्ना को नन्हे राजकुमार की देख रेख हेतु ” धाय” के पद पर रखा था! वीर विक्रमादित्य के इस पुत्र का नाम उदयसिंह रखा गया था! राजकुमार उदय सिंह और पन्ना धाय का पुत्र कुलदीप सिंह आयु में लगभग समान अवस्था के थे! काल परिस्थति वश मेवाड़ के सिंहासन पर विक्रमादित्य सिंह के चचेरे भाई बनवीर सिंह का नियंत्रण हो गया! बनवीर सिंह राणा सांगा के चचेरे भाई का पुत्र था! बनवीर सिंह ने सोचा की मेरा तो कभी मेवाड़ पर राज नहीं होगा अतः उसने विक्रमादित्य और उसके पुत्र उदय सिंह के मारने का षड़यंत्र रचा! होनहार को कोई नहीं टाल सकता है! बनवीर की बुद्धि फिर गयी और वह अपनी तलवार लेकर राणा वीर विक्रमादित्य व बालक कुमार उदय सिंह को मारने के लिए किले में दाखिल हो गया! पहले राजा वीर विक्रमादित्य के महल में पंहुचा और उनके पहरेदारो और विक्रमादित्य को उसने ख़त्म कर दिया! इस घटना की खबर महल में चारो तरफ हो गयी! महल के सभी लोगो ने अपने बचाव का इंतेजाम शुरू कर दिया था!

बनवीर के समक्ष अपने पुत्र कुलदीप का समर्पण

विदुषी पन्ना ने तत्काल स्थितियों को समझ लिया की वीर विक्रमादित्य को मारने के पश्चात् अब बनवीर बाल राजकुमार उदय सिंह को जिन्दा नहीं छोड़ेगा! उसने तुरंत वह निर्णय लिया जिस निर्णय को लेने में दुनिया में कोई माँ कल्पना तक नहीं कर सकती! उसने मेवाड़ राजघराने की रक्षा हेतु, अपने राज धर्म के निर्वहन हेतु अपनी ममता को भुलाते हुए बाल राजकुमार उदयसिंह को अपने पुत्र कुलदीप के वस्त्र पहना दिए और कुलदीप को राजकीय वस्त्रो से आभूषित कर दिया ! बालक कुमार उदय सिंह की शैया पर अपने पुत्र कुलदीप को सुला दिया तथा बालक कुमार उदय सिंह को अमल खिला कर एक सहायिका की मदद से एक टोकरे में सुलाकर उन पर पुराने कपडे और महल का कूड़ा जमा कर दिया! इस टोकरे की निगरानी हेतु उसके पति सत्यवान सिंह को वहा छुपा दिया तत्पश्चात पन्ना ने महल के द्वार बंद कर लिए!

दुधमुंहे बालक कुलदीप का बलिदान

पगलाये बनवीर बालक राजकुमार उदय सिंह की तलाश में जनवासे के महल के द्वार खटखटाये, उसके हांथो में रक्त रंजीत तलवार थी! पन्ना धाय ने बनवीर को रोकने की हर कोशिश की परन्तु वह उस दुस्ट बनवीर को रोकने में असफल रही! बनवीर ने जब पन्ना से राजकुमार उदय सिंह के बारे में पूछा तो पन्ना ने राजशय्या पर सोये अपने पुत्र कुलदीप की तरफ इशारा कर दिया! बनवीर ने शय्या पर सोये कुलदीप के टुकड़े टुकड़े कर दिए और कुलदीप के शव पर अट्टहास किया! इस दृश्य को पन्ना धाय ने अपने सीने पर पत्थर रखकर अपनी आँखों से देखा परन्तु अपने राज धर्म को निभाया! बनवीर महल से निकला और चित्तोड़ के सिंहासन पर आरूढ़ हो गया!

राजकुमार उदयसिंह की रक्षा

बनवीर के जाने के पश्चात रोती बिलखती पन्ना ने कुलदीप के शव का अंतिम संस्कार किया और अपने पति और सहायिका के साथ टोकरे में सोये बाल राजकुमार उदय सिंह के साथ गुप्त रस्ते से महल के बाहर निकल गयी ! अपने सीने को वज्र सा करके वह निर्जन रास्तो से चलती कुम्भलगढ़ पहुची, कुम्भलगढ़ मेवाड़ की पुरानी राजधानी थी! कुम्भलगढ़ के राजा ने बनवीर के भय से बाल राजकुमार उदय सिंह की रक्षा और शरण देने से इंकार कर दिया गया! तत्कालीन समय में कुम्भलगढ़ पर जैन राजा का नियंत्रण था! राजा की माता के हस्तक्षेप से आखिर राजा ने शरण देना स्वीकार किया! राजा ने पन्ना धाय और बालक कुमार उदय सिंह को गुप्त शरण प्रदान की! पन्ना और उदय सिंह वह ६ वर्ष तक शरण में रहे और इसकी खबर मेवाड़ में किसी को भी नहीं होने दी!

राजकुमार की रक्षार्थ समर्पण

उचित समय आने पर जैन राजा की सहायता से पन्ना ने चितोड़ के सामंतो और ठाकुरो से संपर्क कर राजकुमार उदयसिंह के जिन्दा होने के समाचार दिए गए! संपूर्ण मेवाड़ में उत्साह का संचार हो गया! राजकुमार उदय सिंह के आगमन को सुनकर मेवाड़ से बनवीर फरार हो गया! राजकुमार उदय सिंह को सिंहासन पर आन बान और शान से सत्तारूढ़ करवाया गया! राणा उदय सिंह ने माता समान पन्ना धाय का सदेव सम्मान रखा! इस पर एक दोहा प्रचलित है !

होती ना पन्ना हिंदवाणै, पातळ सो युद्ध होतो कोणी!

होती ना हल्दीघाटी भी, राजपूती रख्याल होतो कोणी!!

इतिहास अधुरो रह जातो, सगळा पर पानी फिर जातो!

अकबर समाहि बादलीयों, हिंदवाणै ऊपर छा जातो!!

अर्थात अगर पन्ना नहीं होती तो महाराणा प्रताप भी नहीं होता और महाराणा नहीं होता तो हल्दी घाटी भी नहीं होती और मेवाड़ का इतिहास अँधेरे में रह जाता!

मातृशक्ति को नमन

जीवन और मृत्यु अटल है परन्तु पन्ना धाय ने अपने बलिदान से राजधर्म को निभा कर इतिहास में अपनी एक ऐसे पहचान बना ली है की सदियां उनको भुला ना पाएंगी! इस मातृ शक्ति को नमन!

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