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| On 2 years ago

Holi special: The color of nature with life.

होली विशेष : प्रकृति का रंग जीवन के संग।

भाई, सीधी सी बात करो। बहुत मिल जाएंगे कहते हुए की अब होली में वो पहले सी बात कहाँ? वो सच बोलते से हो सकते है, शायद होली में पहले वाली बात अब नही भी हो। लेकिन असल बात है कि क्या अब हम में भी वो पहले सी बात हैं?

बचपने की बात करें तो याद आता है कि होली का धूम-धड़ाका होली से दस-बारह दिन पहले आरम्भ हो जाता था। गेरियों के दल फागण की धुन चंग पर सजाकर गलियों से गुजरने लगते थे। छोटे-छोटे बालक गाय के गोबर को सुखाकर होलिका में अर्पित

करने हेतु अपनी मालाएं सजाना शुरू कर थे। घरों में साफ-सफाई और खेतों में फसल बुहारने में सभी व्यस्त होते थे। गृहणियों की तो बात ही मत पूछो होली से तीन-चार दिन पहले तो रसोई ही उनका मुकाम बन जाती थी। कोई कसर बाकी नही रहती थी।

बाल-टोली पर सबकी विशेष नजर रहती थी कि वे मजाल हैं कि होली से कुछ दिन पहले भी कोई नया वस्त्र नही पहन पाए। होली खेलने के लिए उनके लिए विशेष रूप पुराने कपड़े ढूंढ कर निकाले जाते थे। युवा वर्ग भी कैसे पीछे रह जाता? होलिका-दहन में उनका विशेष रोल रहता। वे घरों के कबाड़ से लेकर सूखे

पेड़ के तनों व टहनियों को एकत्र करने में रहते क्योकि जिस गाँव- मोहल्ले में वे रहते उससे बड़ी होली कहीं और बन जाना उनकी शान के खिलाफ जो था।

होली के दिन सबसे बड़ा सवाल होलिका-दहन के मुहूर्त का था। गाँव के बूढ़े-बुजुर्ग जल्दी का मुहूर्त अच्छा बताते लेकिन युवावर्ग को सुबह 4 बजे का मुहूर्त स्थाई रूप से पसन्द था क्योंकि इसी बहाने पूरी रात मजमा लग सके।

होलिका-दहन के पश्चात अगले सुबह-सवेरे से आलम रंगीन हो जाता। जिस तरफ नजर डालो बस रंगीन दिलकश नजारे होते। पूर्ण गरिमा से अपने से बड़ो पर रंग न्योछावर किये जाते, पूर्ण मित्रता के साथ अपने आयुवर्ग के साथ

होली का जश्न होता व पूर्ण आत्मीयता के साथ अपने से छोटो के कपोल लाल कर दिए जाते।

दोपहर के बाद सभी लोग एक दूसरे के यहाँ "रामा-श्यामा" करने यानी होली की शुभकामनाएं देने एक-दूसरे के घरों की तरफ निकल जाते। होली की शुभकामनाओं के साथ रिश्तों की नई इमारत भी बुलन्द होती व पुराने शिकवों के खण्डर भी ढह जाते। इन सबसे बढ़कर बाल-टोली की लॉटरी लग जाती क्योंकि घिस-घिस कर नहाने के बाद बदस्तूर लगा रंग और नए कपड़ो से लक-दक होकर वे एक सर दूसरे घर भाग-भागकर पकवानों का मजा लूटते।

अब बाजार मंगाई महंगी मिठाइयों को सजावटी बर्तनों में रखकर की गई पुरसगारी में मेहमान का कम बल्कि उसकी खुराक पर नजर रहती है। एक बड़े सेठ के यहाँ पहुंचे सामान्य आदमी ने त्यौहार के मौके पर चांदी के बर्तन में परोसे सूखे मेवों से लजाते-सकुचाते कुछ मेवे खा लिए। मेजबान ने औपचारिक रूप से कहाँ की कुछ और लीजिए तो मेहमान ने कहाँ की "जी, मैने 3-4 काजू ले लिये है। मेजबान ने खुद को जब्त करके जब कहा कि "लिए तो आपने 9 काजू और 13 पिश्ते हैं, पर लीजिए।" तो सब कुछ सामने आ ही गया।
आज मौका भी है दस्तूर भी। छोड़िए, सारी उलझनें और दिल से कहिए- होली है।।