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| On 3 years ago

How To be A great Teacher?

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एक श्रेष्ठ शिक्षक कैसे बने?

"आप भी चंद्रगुप्तों को तराशिये ताकि राष्ट्र निर्माण हो सके।" प्रारम्भिक शिक्षा निदेशक।

जोधपुर, 28 जुलाई। संस्था प्रधानों की सत्रारम्भ वाकपीठ संगोष्ठी में प्रारंभिक शिक्षा निदेशक श्यामसिंह राजपुरोहित ने सरस्वती पूजन के पश्चात माता शारदे हेतु श्लोक पठन किया। वार्ता के आरम्भ में उन्होंने प्रधानाचार्य प्रतिभा रानी को राबाउमावि राजमहल के विद्यार्थी रहकर उसी विद्यालय में प्रधानाचार्य बनने की बधाई दी।

निदेशक ने अपने ज्ञानमय व गरिमामय उदबोधन में संस्था प्रधानों को प्रेरित करते हुए राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य की तरफ बढ़ने हेतु पाथेय प्रदान किया। सम्बोधन से चयनित ज्ञान बिंदु निम्नानुसार है।

"शिक्षक कभी साधारण नही होता"।

"शिक्षक कभी साधरण नही होता। प्रलय ओर सृजन उसकी गोद मे पलते है। मेरा धन ज्ञान है अगर मेरे ज्ञान में सामर्थ्य है तो अपने पोषण हेतु एक राज्य स्थापित कर लूंगा।" चाणक्य।

चाणक्य ने एक गड़रिये के बच्चे को शिक्षा देकर उसे राजा पद तक पहुँचा दिया। आप सभी इस कार्य को करने का सामर्थ्य रखते है।

"गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसके लागू पाय।"

"गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसके लागू पाय।" गुरु के 6 गुण होते है। प्रेरक, सूचक, ज्ञान की बात बताने वाला, रास्ता दिखाने वाला, शिक्षक व बोध कराने वाला।

आज हम एक शिक्षक भी पूर्ण नही होकर केवल मात्र अध्यापक रह गए है। हम केवल पाठ्य पुस्तकों का अध्यापन कर रहे है सही शिक्षा तक नही दे पा रहे है।

एक अध्यापक से शिक्षक अथवा गुरु बनने हेतु सदैव धर्म बनाये रखे, धर्म को जाने, धर्मानुसार आचरण करे, तत्व को जाने व समस्त गम्भीर बातों को सामने रखने का प्रयास करे।

गुरु ज्ञान को पुनर्स्मरण में सहायक होते है।

हर मनुष्य ज्ञान का भंडार होता है। अभ्यास व सच्चे गुरु की प्राप्ति होने पर ज्ञान का प्राकट्य होता है।
एक उदाहरण है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को पूर्ण ज्ञान दिया। गीता में 658 श्लोक बतलाने के पश्चात भगवन ने अर्जुन से पूछा।
(18 वाँ अध्याय, 72 वा श्लोक)
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ
त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः
प्रनष्टस्ते धनंजय ॥१८- ७२!!
भावार्थ-
हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?॥72॥
श्री कृष्ण के प्रश्न के जबाब में अर्जुन ने प्रतिउत्तर दिया।
(18 वाँ अध्याय, 73 वा श्लोक)
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः
करिष्ये वचनं तव ॥१८- ७३॥
भावार्थ
अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा॥73॥
श्री कृष्ण-अर्जुन सम्वाद से स्पष्ट की प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान का भंडार है एवम गुरु के प्रयास से उसे वह ज्ञान स्मृत हो जाता है।
ऐसी वाकपीठ का एक ही उद्देश्य होता है कि आपके ज्ञान में तारतम्य स्थापित किया जा सके। आप सभी मे ज्ञान है विभिन्न वार्ताओं के बाद वह ज्ञान पुनः स्मृत हो जाता है।

निजी मत

मैं निजी जीवन मे शिक्षक व चिकित्सक के पेशे का अत्याधिक सम्मान करता हूँ। एक शिक्षक एक सामान्य व्यक्तित्व को महान व्यक्तित्व में बदल सकता हूँ।

राजकीय विद्यालयों का बढ़ता क्रेज

विगत वर्षों में शिक्षा क्षेत्र में अनेक नवाचार हुए है, इसी कारण से विद्यार्थियों का निजी से राजकीय विद्यालय में आगमन हो रहा है।

ज्ञान महत्वपूर्ण कारक

ज्ञान अत्याधिक महत्वपूर्ण चीज है अतः आप अपने ज्ञान का पूर्ण विस्तार व विद्यार्थियों में इसका प्रसार करे।

हर विद्यार्थी विशेष

हर बच्चे की अपनी मौलिक विशेषता होती है अगर एक शिक्षक उसे पहचान कर यदि शिक्षक उस बच्चें अन्तरकरण को छू ले तो बच्चा उस शिक्षक को कभी नही भूलता।
जब मैं कक्षा नवम में था तब अंग्रेजी विषय की ए एक किताब एक रुपये पन्द्रह पैसे की थी। यह पुस्तक मेरे पास नही थी। जब मेरे पड़ोस में किसी के घर मे बच्चा हुआ तो मैं उन्हें बधाई देने गया तो उन्होंने एक रुपया मुझे बढसी स्वरूप दिया। शेष 15 पैसे एकत्र करने में समय लगा।
काश किसी अध्यापक ने मेरी स्तिथि पहचानी होती। आज भी ऐसे अनेकों बच्चे है, आप उनकी आवश्यकता को पहचाने। उनके दिल को छू ले वो आपको जीवन भर याद रखेगा।
अगर हम छोटे बच्चों में आत्मज्ञान पैदा नही कर सके, उसकी प्रतिभा को छू नही सके तो हमारे शिक्षक होने का कोई अर्थ नही रह जाता।
अभी तक जितनी निद्रा लेनी थी उसे ले ली अब जाग जाइये।इस दौर में आंख तो सबके पास है पर नजर किसके पास है?

विद्यार्थियों को जिज्ञासु बनाये।

एक शिक्षक के रूप में हमे विद्यार्थी में प्रश्न पूछने की ताकत पैदा करनी होगी। मैं बचपन में उल्टी सीढियां उतरते हुए अपने सवाल शिक्षक से करता था।

ज्ञान प्राप्ति हेतु क्या करना चाहिए? प्रश्न करना चाहिए।
गुरु जी की सेवा करनी है तो उनकी सेवा प्रश्नों से करनी चाहिए।
विद्यार्थी जब जिज्ञासु होते है तो शेष कार्य पूर्ण हो जाते है अतः उनमें जिज्ञासा उतपन्न करे।
गुरु-शिष्य के बीच उपदेश तो बस व्यवस्था है,असली तथ्य है ज्ञान की शक्ति । ज्ञानार्जन हेतु विद्यार्थी की प्रज्ञा कार्य करती है। आप बच्चे में ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित करने का कार्य करे।

उठिए! जागिये !! उद्देश्य प्राप्त कीजिये!!!

अगर आप सोए हुए है तो आप कलयुग में है। यदि आप जाग्रत होकर खड़े हो जाएंगे तो त्रता युग मे आ जाएंगे। यदि आप चलने लगे तो सतयुग में पहुंच जाएंगे।
यहीं वह श्रेष्ठ समय है जब आप अपने कौशलों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करके एक श्रेष्ठ युवा पीढ़ी का नेतृत्व करके एक गौरवशाली व समृद्ध भारत के निर्माण में सहयोग कर सकते है।
आप भी चन्द्रगुप्तो को तराशिये ताकी राष्ट्र निर्माण हो सके।

"साथ चले, साथ बढ़े, राष्ट्र निर्माण करें।

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  • बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति की है एक शिक्षक की। एक शिक्षक ही सही मार्गदर्शन कर सकता है। वह एक श्रेष्ठ पथप्रदर्शक होता है।