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| On 4 months ago

महिलाओं के कानूनी अधिकार व उनका प्रयोग। महिला सशक्तिकरण कानून

महिलाओं के कानूनी अधिकार व वर्तमान स्तिथि-

आप लाख दुहाई दे दीजिए और महिलाओं के लिए बने कानूनों का हवाला दे दीजिए लेकिन यह नही बता पाएंगे कि क्यों बालिका जन्म दर चिंताजनक स्तर तक घट गई है एवम महिलाओं के प्रति अत्याचार से समाज लहूलुहान क्यों हैं?
पुरातन काल मे महिलाओं की सामाजिक स्तिथि-

जिस राष्ट्र में महिलाओं को पूजा जाता था तथा "यत्र नारी पुजते" की अवधारणा रही हो। जिस देश मे योग्यतम पुत्र भी अपनी माता के नाम से यथा - भीष्म को "गांगेय", कर्ण को "राधेय" व अर्जुन को "कौन्तेय" पुकारा जाता था वहाँ वर्तमान समाज के समाचार-पत्र उनकी पीडाओं से लबरेज है।

We may cite the laws made for women, but they will not be able to tell why the girl child's birth rate has decreased to the alarming level and why the society is shocked by the atrocities against women. Here our Shivira Editorial team had exclusively covered the rights which every women should know.

महिला अधिकारों को लेकर चिंतन-

सम्पूर्ण विश्व मे महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है एवम इस बहस ने अब एक सामाजिक आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया है। न्याय के मूलभूत सिद्धांतो के तहत व मानवीय दृष्टिकोण से यह नितांत आवश्यक है कि महिलाओं को पूर्ण सरंक्षण प्रदान करना व उन्हें स्वयं के निर्णय लेते हुए जीवन जीने का अवसर प्राप्त हो।
महिलाओं के प्रति सामाजिक सुधार की आवश्यकता-
महिलाओं

के प्रति संवेदनशील व्यवहार एक जीवनशैली एवम विचारधारा है। सदियाँ बीत जाने के बाद भी पुरुष का व्यवहार किसी महिला के प्रति सामान्य नही हो पाना एक आश्चर्यजनक स्तिथि है। आज सम्पूर्ण विश्व मे जब पशु, पक्षी व जीव-जंतु तक के प्रति जागरूकता आ रही है , ऐसे युग मे नारी-स्वातंत्र्य की स्तिथि का निर्माण नही हो पाना भी मानवीयता की बहुत बड़ी हार है।

महिला अधिकारों के प्रति वैशविक चिंतन-

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर "द मेक्सिको प्लान ऑफ ऐक्शन" (1975), नैरोबी फॉरवर्ड लुकिंग स्ट्रेटेजी (1985), द बीजिंग डिक्लेरेशन तथा प्लैटफॉर्म फॉर ऐक्शन (1995) व 21वीं शताब्दी में लैंगिक समानता तथा विकास व शांति पर आयोजित UNGA सत्र द्वारा ग्रहण किया गया आउटकम डॉक्युमेंट को भी भारत को पर्याप्त समर्थन मिला है।

भारत मे महिलाओं के अधिकार-

इस आलेख द्वारा हम भारत में महिलाओ को कानूनी सुरक्षा व सामाजिक सरंक्षण प्रदान करने वाले विभिन्न व्यवस्थाओं का अध्धयन करेंगे। आज जब सम्पूर्ण विश्व मे भारत जैसे महान राष्ट्र में महिलाओं की स्तिथि पर चिंता प्रकट की जा रही है तब ऐसा अध्ययन अधिक समीचीन व सान्दर्भिक हो जाता है।

राष्ट्रीय महिला आयोग और महिला सशक्तिकरण कानून-

राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना वर्ष 1990 में संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई है, जिसके तहत महिला के अधिकारों तथा कानूनी अशिकारों को सुरक्षा प्रदान की जाती है। संविधान का 73वां तथा 74वां संशोधन (1993) में पंचायत तथा नगर निकाय के चुनावों में महिला को आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है, जिससे स्थानीय स्तरों पर उनकी भागीदारी का मार्ग प्रशस्त होता है।

राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति- 2001

राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति एक विराट अवधारणा है जिसमे महिलाओं से सम्बंधित संवैधानिक व्यवस्थाओं को समाज मे वास्तविक रूप से परिलक्षित करना है। इसमे विभिन्न पहलुओं को सम्मिलित करते हुए प्रत्येक महिला नागरिक को एक स्वतंत्रता युक्त माहौल सुलभ करवाना है।
महिलाओं को आर्थिक सरंक्षण प्रदान करने हेतु लघु उद्योग, कृषि व सहायक सेवाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु ऋण उपलब्ध करवाना, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु उनके लिए बेहतरीन शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आश्रय व कठिन परिस्थितियों में सहायता उपलब्ध करवाना है।
महिलाओं के प्रति हिंसा उन्मूलन व बालिकाओं के अधिकारों की रक्षार्थ सामाजिक संस्थागत ढांचे का निर्माण इसी प्रक्रिया के हिस्से है। इस हेतु राज्य के कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका विभागों के कर्मचारियों का प्रशिक्षण, जिसमें नीति तथा कार्यक्रम निर्माता, क्रियांवयन तथा विकास एजेंसियों, कानून अनुपालन प्रणाली व न्यायपालिका और साथ ही गैर-सरकारी संगठनों पर ध्यान दिया जाना है।

भारत में महिलाओं के संवैधानिक अधिकार-

भारतीय संविधान में महिलाओं को पूर्ण संवेधानिक सरंक्षण प्रदान किया गया है।
महिलाओं के मौलिक अधिकारों का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,21 व 22 में वर्णित है। शोषण के विरुद्ध अधिकारों का उल्लेख अनुच्छेद 23 व 24 में है। महिलाओं के सांस्कृतिक व शैक्षणिक अधिकार अनुच्छेद 29,30,39.1 व 42 में व्यवस्थित है। इसी क्रम में महिलाओं की सुरक्षार्थ घरेलू हिंसा, विवाह, सम्पति, उत्तराधिकार,दहेज निषेध इत्यादि कानूनों का निर्माण भी किया गया है। इन सबके साथ ही "समान नागरिक संहिता"

के तहत भी महिलाओं को पूर्ण सरंक्षण प्राप्त है।
उपरोक्त व्यवस्थाओं के अतिरिक्त महिलाओं के अधिकारों के सरंक्षण हेतु अनेक सामाजिक संस्थाए, गैर-सरकारी संगठन कार्यरत है।

महिलाओं की सुरक्षार्थ वास्तविक जीवन मे काम आने वाले कानून-

1. घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005
2. यौन उत्पीड़न अधिनियम
3. PCPNDT एक्ट।
4. समान वेतन अधिनियम,1976
5. मातृत्व लाभ अधिनियम,1961
6. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम
7. हिंदू मैरिज ऐक्ट

आम जीवन मे महिलाओं के अधिकार (महिला सशक्तिकरण कानून)-

1. आपराधिक प्रक्रिया संहिता, सेक्शन 46 के तहत एक महिला को सूरज डूबने के बाद और सूरज उगने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
2. यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को अपने नाम की गोपनीयता बनाए रखने का पूरा आधिकार है।
3. एक महिला को जीने का अधिकार देने के लिए लिंग की जांच और उसकी हत्या के खिलाफ कानून निर्मित है।
4. यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत आपको वर्किंग प्लेस पर हुए यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का पूरा हक है, महिलाओं को जांच लंबित रहने तक 90 दिन की पेड लीव का प्रावधान।
5. किसी मामले में अगर आरोपी एक महिला है, तो उस पर की जाने वाली कोई भी चिकित्सा जांच प्रक्रिया किसी महिला द्वारा या किसी दूसरी महिला की मौजूदगी में ही की जानी चाहिए।
6. रेप की शिकार हुई किसी भी महिला को मुफ्त कानूनी मदद पाने का पूरा अधिकार है।
7. भारत का कानून किसी महिला को अपने पिता की पुश्तैनी संपति में पूरा अधिकार ।
8. पति की हैसियत के हिसाब से महिला को गुजारा भत्ता का हक।
9. गरिमा और शालीनता के लिए अधिकार!

महिलाएं कहा करे शिकायत-

किसी भी प्रकार के प्रकरण हेतु प्राथमिक रूप से कोई भी महिला दुरभाष नम्बर 100 पर सूचना प्रदान कर सकती है। इसके अलावा प्रत्येक महिला अपनी शिकायत को नजदीकी पुलिस थाने में भी दर्ज करवा सकती है।

क्यों नही कर पाती महिलाएं अपने हको के लिए लड़ाई-

1. खुद को बड़े कदम उठाने के लिए स्वतंत्र नही समझना।
2. साक्षरता की कमी।
3. जटिल न्यायिक प्रक्रिया।
4. लोक-लाज का डर।
5. भावनात्मक सोच।
6. पुरानी सोच।

सार -

सार स्वरूप हम कह सकते है अनेकों कानूनों के निर्माण से ही नारी की सुरक्षा सम्भव नही हैं। एक सम्पूर्ण सुरक्षित वातावरण के निर्माण हेतु हमें अपने घर से ही शुरुआत करनी पड़ेगी एवम हमारे शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना पड़ेगा।

न्याय की प्रक्रिया को तीव्र करते हुए यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि बालिकाओं के अधिकार व महिलाओं के हितों की सुरक्षा हेतु अविलम्ब कार्यवाही प्रत्येक स्तर पर अविलम्ब हो।