Indian Economy: Agriculture and Small Industries are still relevant for India.

भारतीय अर्थव्यवस्था: विकास हेतु कृषि व लघु उद्योग अब भी प्रासंगिक।

इस आलेख को अर्थव्यवस्था के समंक छोड़कर व्यवहारिक धरातल पर लिखने का प्रयास करते है। यह बिल्कुल सही है कि अब 1980 के दौर में जिन लोगों ने अर्थशास्त्र पढा है उन्हें आज की अर्थनीति अब समझ मे नही आने वाली क्योकि आज ना तो भारत गांव में बसने वाला देश रहा है है ना ही इसे अब कृषि प्रधान व्यवस्था समझा जा सकता है।

आप किसी भी बड़े महानगर से बाहर निकने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि मीलों तक सडक के दोनों किनारों पर सीमेंट के जंगल बने है। सीमेंट के इन जंगलों में बेशुमार यातायात व विलासिता के प्रतीक इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बेशुमार मीथेन गैस का निष्कर्षण करके वायुमंडल को निरन्तर दूषित कर रहा है।

शहर छोड़ देने के बाद भी आपको पालतु जानवरो यानी गायों,भेड़ो, बकरियों के विचरण करते झुंड या टोले कदाचित ही दृष्टिगोचर होंगे। आज से 100 साल पहले हर नगर किसी ना किसी वस्तु विशेष के उत्पादन के लिए पूरे देश व विदेश में भी अपनी पहचान रखता था। अब ऐसा नही मिलेगा ।एक जमाने मे राजस्थान के नागौर के बने लोहे के उपकरण विख्यात थे लेकिन अब वहाँ के स्थानीय बाजार में आपकों चीन के उत्पाद ही मिलेंगे। ऐसा कमोबेश सभी नगरों व जिलों में मिलेगा।

हमारी सकल उत्पाद दर, प्रति व्यक्ति आय, अर्थव्यवस्था का आकार , आयकर की उपलब्धता, इत्यादि को चाहे हमारे अर्थव्यवस्था के पैरोकार पॉजिटिव मान ले लेकिन दरअसल ऐसा है नहीं। यह सत्य है कि हमारी विशाल जनसंख्या विशाल मांग पैदा करती है एवम हमारे व्यापारी, माफ कीजिये उद्योगपति नही, इसे पूरा करते है।

हमारे व्यापारी न्यूनतम लागत पर माल का जुगाड़ करके उसे बाजार के सपुर्द करते है। बाजार में मांग को पूरा करने के लिए चीन है। चीन सभी प्रकार का माल न्यूनतम कीमत पर आपको देने के लिए तैयार है। क्यों तैयार है, उसका अपना गणित है और वह इस गणित का होशयार खिलाड़ी है।

जब तथाकथित रूप से सरकार या पैरोकार जब आयात शुल्क बढाने का अभिनय करते है अथवा भारत में उत्पादन की बढ़त की दिखावटी कोशिश करते है तो हमारे कुशल व्यापारी मौका समझकर “मेड इन इंडिया” के नाम पर एसेंबलिंग शुरू कर देते है। दो या अधिक देशों से आवश्यक कम्पोनेंट मंगाकर मेड इन इंडिया का स्टिकर चस्पा करने के आदि हो चुके है।

आखिर। हम क्यों कुछ चुनिंदा औद्योगिक ब्रांड्स या घरानों पर ऊनी इंडिपेंडेंस बढ़ा रहे है। अमेरिका व अन्य विकसित देश यह गलती कर चुके है उनके यहाँ उनकी जमीन से फले-फुले बड़े उद्योग भी अपनी सरकार की नही सुनते। ज्यादा प्रतिबंध लगाने की नीति बने तो ये सक्षम उद्योग दूसरे देशों मे अपने लिए आधार बना लेते है।

भारत का सच्चा विकास एक श्रमशील, कुशल , विनियोजित, विभिन्नतापूर्ण, विशिष्ट व निरन्तर औद्योगिकरण से होगा एवम इसके लिए अवश्य8 है कि हम लधु, माध्यम व कुटीर उद्योगों का सबलीकरण करे। इन उद्योगों हेतु उत्साहपूर्ण, ईमानदार, सहयोगी व प्रोत्साहित करने वाली औद्योगिक नीति, आधारभूत सरंचना व सहायता केंद्रों की आज आवश्यकता हैं।

देशज उद्योगों की सफलता में उनके लिए बैकहैंड के रूप में मजबूत कृषि व्यवस्था आवश्यक हैं। यह समय आ गया है कि प्रत्येक राज्य अब कृषि के पुरातन रूप के साथ ही वर्तमान अनुसंधान को प्रोत्साहन देते हुए विश्व परिदृश्य पर तीखी नजर बनाए रखे। आज जिस प्रकार से बड़े देश पेटेंट्स व कॉपीराइट की आड़ में कृषि हेतु आवश्यक बीजो के मालिक बनने का प्रयास आरम्भ कर चुके है वह कल विनाश का कारण भी बन सकता है।

बहुत सारी बातों का सार एक ही है हमे अगर विश्व बाजार में विकास करना है व साथ मे खुशहाली का आनंद भी रखना है तो भारतीय कृषि व लघु उद्योगों को प्रतिष्ठित करना ही होगा। बाकी सब ठीक है। जय भारत।

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