| On 1 month ago

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस (International Workers Day) जिसे भाई लालो दिवस भी कहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस (International Workers Day) का आयोजन 02 जून को लगभग सम्पूर्ण विश्व मे बड़े उत्साह से मनाया जाता है। पंजाब के एक सामान्य मजदूर भाई लालो को भी इस दिन पंजाब परिक्षेत्र में बड़े सम्मान से याद किया जाता है। आइये, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के साथ ही भाई लालो के बारे में विस्तार से जानते है।

मजदूर दिवस का नारा "आवाज दो हम एक है।"

"आवाज दो, हम एक है" भारतीय मजदूरों में लोकप्रिय इस नारे ने उन्हें दशकों से एकजुट रखने में बहुत मदद की है। जब भी कोई मजदूर 

र्ष पहले अमेरिका में मजदूरों ने 8 घण्टे से अधिक काम नही करने के लिए मालिकों के विरुद्ध आवाज उठाई थी। इसमे 11,000

फैक्ट्रियों के 3,80,000 मजदूरों ने भाग लिया था। इस पहले संगठित आंदोलन को "मजदूर दिवस" के रूप में दुनिया भर में आयोजित किया जाता है। इसी आंदोलन के फलस्वरूप भारत सहित लगभग 80 देशों मे मजदूरों हेतु कार्य के घण्टे 8 निर्धारित है।

भाई लालो दिवस

भारतीय सन्दर्भ में यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि सिक्ख समुदाय इस दिवस को " भाई लालो दिवस " के रूप में मनाता है। गुरु नानकदेव जी ने अहंकारी हाकिम भागो के भोजन को अस्वीकार करके भाई लालो की मेहनत की कमाई को स्वीकार करके किसानों, कामगारों व मजदूरों को समर्थन प्रदान किया था।

भारत मे शुरुआत 1 मई 1923 से

भारत मे मजदूर दिवस के आयोजन की शुरुआत चेन्नई में 1 मई 1923 से हुई थी। भारत मे मद्रास हाईकोर्ट के सामने हुए विशाल प्रदर्शन के बाद संकल्प पारित करके यह सहमति बनाई गई थी कि एक मई को " कामगार दिवस " के रूप में मनाया जाएगा। इसका श्रेय भारती मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलु चैत्यार को जाता है।

आर्थिक, औधोगिक, निर्माण, उत्पादन, कृषि व अन्य समस्त उद्योगों में मजदूरों की अहम भूमिका है। उत्पादन के संसाधनों में सर्वाधिक महत्व मानवीय संसाधन का है। मानवीय संसाधनों का प्रबन्धन एक

बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है। कुल आय में कामगारों के हिस्से को निर्धारित करना एक संवेदनशील प्रक्रिया है।

वर्तमान मजदूर संगठनो की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध के बाद मानी जा सकती है। युद्ध के दौरान मजदूरों मे अपने अधिकार पाने, अपनी महत्ता जानने और अपनी सुविधाओं को पाने की जाग्रति उत्तपन्न हुई। उन्हे महसूस हुआ की उनके भी कुछ अधिकार हैं और सुविधाओं का हक है। आज मजदूरों की हितार्थ अनेक संगठन कार्यरत है।

दास प्रथा, गिरमिटिया व बँधुआ

इतिहास गवाह है कि मजदूरों, कामगरों व कृषको का बहुत बड़े स्तर पर शोषण हुआ है। दास प्रथा, गिरमिटिया, बंधुआ जैसे अनेक शब्द प्रचलित रहे है। मजदूरों के हकों हकूकों को

लेकर बहुत राजनीति हुई है कई सरकारों का निर्माण हुआ है, कई कानूनों का निर्माण हुआ है लेकिन हालात में वांछित सुधार आज भी अपेक्षित है।

आने वाले समय में भी बहुत सँघर्ष सम्भावित है। वैज्ञानिक प्रगति, कम्प्यूटर उपयोग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीनीकरण, भारी तकनीक उपयोग इत्यादि के चलते श्रमिकों की समस्याओं में वृद्धि सम्भावित है। अतः इस सम्बंध में एक व्यापक कार्ययोजना का निर्माण अतिआवश्यक प्रतीत होती है।

एक शायर के इस शेर में मजदूरों की स्तिथि पर प्रकाश डाला है-

"नींद आएगी भला उसे कैसे शाम के बाद।

रोटियां भी ना मयस्सर जिसे काम के बाद"।।