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राजस्थानी एक स्वतंत्र भाषा | Introduction to Rajasthani Language

राजस्थान की भाषा को राजस्थानी ( Rajasthani ) कहते है। राजस्थानी भाषा की मान्यता हेतु देश ही नही अपितु अन्य देशों में रहने वाले राजस्थानी प्रयास रहते है। राजस्थानी भाषा एक विशाल क्षेत्र में बोली जाती है। राजस्थान की इस मीठी भाषा मे अकूत साहित्य भंडार है। आइये, हम इस विश्वप्रसिद्ध राजस्थानी भाषा की आरंभिक जानकारी प्राप्त करते है। Let's know the basic introduction of Rajasthani language.

राजस्थानी भाषा की शाखाएं व उपशाखाएं | Branches and sub-branches of Rajasthani language

वर्त्तमान राजस्थान और पूर्व राजपूताने की भाषा को “राजस्थानी” कहते हैं ! इसके मुख्य 7 विभाग हैं, मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाडोती, मेवाती, बागड़ी, मेवाड़ी और बृजभाषा! वैसे तो उपशाखाएँ स्थान भेद से 100 से भी अधिक है परन्तु इन्ही 7 उपभाषाओं में उनका समावेश हो जाता है! राजस्थान में निम्नलिखित कहावत बहुत प्रसिद्ध है ।

"कोस कोस पर बदले पानी और चार कोस पर वाणी"

अर्थात् राजस्थान में हर एक कोस की दुरी पर पानी का स्वाद बदल जाता है और 4 कोस पर भाषा यानि वाणी भी बदल जाती है। हर स्थान के निवासियों का उच्चारण भी अलग है एवम उनके स्वयं के स्थानीय शब्द व कहावतें भी राजस्थान में हैं। इन सबके उपरांत भी मोटे तौर पर राजस्थानी भाषा 7 स्थानीय भाषाओं का योग कहा जाता हैं।

राजस्थानी भाषा की शाखाओं से सम्बंधित स्थान | Diverse Rajasthani Language

आज़ादी पूर्व के मारवाड़ , बीकानेर व जैसलमेर राज्यो में मारवाड़ी; बूंदी, कोटा, शाहपुरा, झालावाड़ में हाडोती; जयपुर में ढूंढाड़ी ; अलवर में मेवाती; मेवाड़ में मेवाड़ी: भरतपुर, धोलपुर व करोली में बृजभाषा और सिरोही, बांसवाड़ा, डूंगरपुर व प्रतापगढ़ में बागड़ी भाषा बोली जाती है! बागड़ी बोली गुजराती से मिलती जुलती भीलो की बोली है ! ये हिंदी भाषा की शाखाये है और सभी विभागो के लोग आपस में एक दूसरे की भाषाए प्राय समझ लेते है क्योकि राजस्थानी भाषा के इन विभिन्न रूपो में विशेष अंतर नहीं है! सब लोगो की मूल-मातृ-भाषा हिंदी ही समझनी चाहिए!

हिंदी मूल मातृ भाषा है एवम सँस्कृत प्रत्येक भाषा के जड़ में है। इसके उपरांत भी राजस्थानी भाषा का स्वतंत्र अस्तित्व है । पूर्व रियासतों ने भी स्थानीय भाषाओं के विकास पर बहुत बल दिया था। आज राजस्थानी भाषा का स्वयम का विशाल साहित्यिक खजाना उपलब्ध है। तत्कालीन शासकों ने अपने समय मे स्थानीय भाषाओं के विकास के साथ ही पुस्तक सरंक्षण, लेखक सम्मान की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया था। इस सन्दर्भ में 17 वी सदी में बीकानेर के शासक अनूप सिंह जी द्वारा स्थापित " अनूप पुस्तकालय " एक उदाहरण है। इस पुस्तकालय में नैणसी की ख्यात पुस्तक की प्राचीनतम प्रति उपलब्ध हैं।

उपरोक्त प्रकार से राजस्थानी की मुख्य 7 शाखाओं मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाडोती,

मेवाती, बागड़ी, मेवाड़ी और बृजभाषा में पूर्ण रूप से समर्द्ध उच्च स्तरीय साहित्य उपलब्ध है।

राजस्थानी साहित्य शैली - डिंगल व पिंगल | Rajasthani Literary Style - Dingle and Pingal

राजस्थान में साहित्य की विधा ऐतिहासिक रूप से बहुत समृद्ध रही है। राजस्थान में साहित्य सृजन के साथ साहित्य को पठन- पाठन की भी विशिष्ट शैली है। राजस्थान में डिंगल व पिंगल प्रमुख शैली हैं।

  • राजस्थान की प्राचीन राजकीय भाषा संस्कृत थी जिससे प्राकृत भाषा बनी ! सर्वे साधारण की भाषा “प्राकृत” थी !
  • राजपूताने की कविता की भाषा “डिंगल” है, जो प्राकृत का रूपांतर है! इस डिंगल भाषा में भाट, चारण, सेवग, मोतीसर, ढोढी आदि कवियो का प्राचीन इतिहास १० वी शताब्दी में मिलता है!
  • यह डिंगल शब्द “डींग” और “गल” शब्द मिलकर बना है! इसका अर्थ ऊँची बोली का है, क्योकि इस भाषा के कवि उच्च स्वर से अपनी कविता का पाठ करते है!
  • पिंगल पूर्वी राजस्थान की एक भाषा शैली है जबकि डिंगल पश्चिमी राजस्थान की भाषा शैली है। पिंगल राव या भाट कवियों की शैली है तो डिंगल चारण कवियों की। दोनों ही भाषा शैलियों में शासकीय यशोगान व विरदावली वाचन के साथ कविता व दोहों के माध्यम से समसामयिक समस्याओं और प्राकृतिक परिवेश का सार्थकचित्रण किया गया है।
  • बृजभाषा की कविता में ध्वनि उच्च नहीं होती और उसमे मधुरता विशेष होती है! इसलिए इस ब्रिज भाषा
    को राजपूताने में पिंगल अर्थात पांगली (लंगड़ी-लूली) कविता कहते है! पिंगू का अर्थ लंगड़ी और गल का अर्थ बात या बोली होता है!
  • स्वर्गीय कविराज मुरारदान महामहोपाध्यया ने “डिंगल” शब्द का अर्थ अनघड़ पत्थर या मिटटी का ढगल (ढेला) किया है! क्योकि इसमें गुजराती, मराठी, मागधी, सिंधी, बृजभाषा, संस्कृत, फारसी, अरबी आदि कई भाषाओं के अपभ्रंश शब्द पाये जाते हैं! अपभ्रंश भी साधारण नहीं! वह भी इतना ज्यादा की उसका असली रूप जान लेना भी कठिन हो जाता है!
  • राजस्थानी भाषा मे संस्कृत के मुक्ताफल को डिंगल भाषा में मोताहल, युधिष्ठिर को जुजठल, ध्रुवभट को दुहड़, श्रीहर्ष को सीहा, हस्तबल को हाथल और आलभट्ट को अलट लिखा गया है!

राजस्थानी भाषा की विशिष्टता | Specialties of Rajasthani Language

राजस्थानी भाषा को आप पूर्णतया हिंदी भाषा नही कह सकते है । यह भाषा अपने कलेवर में स्थानीयता का विशिष्ट रूपांतरण समाहित किये हुए हैं। सामान्य हिंदी भाषा जानने वाला व्यक्ति ठेठ राजस्थानी को समझ नही सकता है। हिंदी की निकटता के उपरांत भी राजस्थानी एक पूर्ण रूप से पृथक है। हिंदी भाषा का राजस्थान की भाषा मे अधिक मात्रा में रूपांतरण होता है।

कितना रूपांतर है ? इस भाषा में ट,ठ, ड,ण, ढ और ऴ आदि अक्षरो की प्रधानता होती है, और “स” का प्रयोग प्रायः “ह” होता है! इस भाषा में ऋ, ॠ, लॄ,ए,ऐ ,औ-ये स्वर नहीं होते और तालवी (श)

ही लिखा व बोला मूर्धनि(प) के स्थान पर भी दंती सकार (स ) ही लिखा और बोला जाता है! ऐसे ही “ख” के स्थान पर “ष” लिखा जाता है!

आशा है आप को इस लेख द्वारा राजस्थानी भाषा की आरंभिक जानकारी अवश्य मिली होगी। राजस्थान की मीठी भाषा राजस्थानी से सम्बंधित विशेष आलेख शीघ्र ही आपकी पसंदीदा वेबसाइट www.shivira.com पर मिलेंगे। हिंदी हमारे राष्ट्र का अभिमान है एवम हम सभी अपनी मातृभाषा हिंदी का पूर्ण सम्मान करते है। आइये, हिंदी भाषा मे एक लेख पढ़ते है जिससे हमें हिंदी भाषा मे विशेषण के महत्व की जानकारी प्राप्त होगी।

विशेषण किसे कहते हैं?

विशेषण के बारे में पूर्ण जानकारी यथा - विशेष्य, विशेषण के भेद/प्रकार, विशेषण की अवस्थाएं, अवस्थाओं के विभिन्न रूप, विशेषण का मूल व बनना इत्यादि समस्त जानकारी।

प्रत्येक विद्यार्थी हेतु पठनीय।