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जगन्नाथ पुरी धाम यात्रा (Jagannath Puri Dham Yatra in Hindi)

पुरी, उड़ीसा  में  विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर स्थित है। जगन्नाथ पुरी धाम यात्रा यह भारत में चार धामों यानी पुरी, द्वारिका, बद्रीनाथ और रामेश्वर में से धामों (पवित्र स्थान का सबसे पवित्र स्थान) में से एक है। पुरी (पुरुषोत्तम क्षेत्र) में भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र की पूजा की जा रही है। श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर भारतीय राज्य ओडिशा के सबसे प्रभावशाली स्मारकों में से एक है, जिसका निर्माण गंग राजवंश के एक प्रसिद्ध राजा अनंत वर्मन चोदगंग देव द्वारा 12 वीं शताब्दी में समुद्र के किनारे पुरी में किया गया था।

जगन्नाथ पुरी धाम यात्रा

जगन्नाथ का मुख्य मंदिर कलिंग वास्तुकला में निर्मित एक प्रभावशाली और अद्भुत संरचना है, जिसकी ऊंचाई 65 मीटर है और इसे एक ऊंचे मंच पर बनाया गया है। पुरी में वर्ष में श्री जगन्नाथ के कई त्यौहार मनाए जाते हैं जैसे स्नान यात्रा, नेत्रोत्सव, रथ यात्रा (कार उत्सव), शयन  एकादशी, चितलगी अमावस्या, श्रीकृष्ण जन्माष्ठमी, दशहरा आदि हैं। सबसे महत्वपूर्ण त्योहार विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा  है। इस यात्रा को देखने के लिए देशभर से दूर दूर से लोग आते है। 

जगन्नाथ पुरी मंदिर की कथा :

राजा इंद्रदयुम्न मालवा का राजा था जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न को सपने में हुए थे जगन्नाथ के दर्शन। उन्होंने यहां कई विशाल यज्ञ किए और एक तालाब का निर्माण करवाया। एक रात भगवान नारायण ने उनको स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। ‍तुम एक मंदिर बनवाओ और उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित करो।  राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था जिसका नाम ब्राह्मण विद्यापति था।

विद्यापति पता था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की उस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा कर रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्‍ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसने उस  मूर्ति को गुफा में छुपा कही रखा है। होशियार विद्यापति ने मुखिया की बेटी से शादी कर ली । आखिर

में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंच गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को भेंट कर दी।

विश्‍ववसु अपने आराध्य नीलमाधव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी और व्यथित  हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान नीलमाधव भी दुखी हो गए। भगवान वापिस गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राजा इंद्रदयुम्न को वचन दिया  कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते उसे उनके लिए बहुत बड़ा मंदिर बनवाना होगा  राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान नीलमाधव अर्थात भगवान विष्णु को  मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा।

भगवान ने कहा कि कल तुम्हे समुद्र में तैरता हुआ लकड़ी की लठ्ठा मिलेगा जो द्वारिका से समुद्र के रस्ते  पुरी  में आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस लठ्ठे को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु की ही मदद लेना पड़ेगी। विश्ववसु आया और उस भारी-भरकम लठ्ठे को उठाकर मंदिर तक ले गया जिसको देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ । लठ्ठे से भगवान की मूर्ति गढ़ी जाने लगी लेकिन लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लठ्ठे में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। 

तब स्वर्ग लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धारण करके आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी एक शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में ही  बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता अगर किसी ने उन्हें देख लिया तो वे वापस चले जायेंगे । उनकी शर्त को स्वीकार कर लिया गया । लोगों को छैनी,आरी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई।

वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा

को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों की परवाह न करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं। उन्ही भगवन नीलमाधव को भगवान जगन्नाथ के नाम से जाना जाता है। 

जगन्नाथ मंदिर के रहस्यमय तथ्य :

हवा की उलटी दिशा में उडती है ध्वजा

जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वजा हमेशा  हवा के उलटी दिशा में लहराती है जबकि सामान्यतः कोई भी कपडा हवा के साथ बहता है। जगन्नाथजी की यह चमत्कारी ध्वजा आने वाले श्रद्धालुओ को आश्चर्य में डाल देती है। प्रतिदिन एक नई ध्वजा मंदिर के शिखर पर लगाई जाती है ऐसी मान्यता है की यदि किसी दिन नई ध्वजा नहीं चढ़ पाई तो मंदिर 28 वर्ष के लिए बंद हो जायेगा। 

सुदर्शन चक्र

पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के गुम्बद के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा चाहे आप इसी किसी भी दिशा से क्यों न देखे । इसे नीलचक्र भी कहते हैं जो अष्ठधातु का बना है। इसे जगन्नाथ जी के चक्र की संज्ञा दी जाती है। 

हवा की उलटी दिशा

समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की ओर आती है, लेकिन जगन्नाथ जी के मंदिर में यहां हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है। जो कि अपने आप में बहुत अद्भुत और रहस्यमई है। 

गुंबद पर नहीं उड़ता कोई भी पक्षी

जगन्नाथ मंदिर के ऊपर गुंबद के आस-पास अब तक कोई भी पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया है जैसा कि आम तौर पर हम देखते है । इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। ऐसी मान्यता है कि मंदिर किसी अदृशय शक्ति से घिरा हुआ है जिसको पार करना किसी के बस की बात नहीं है। 

दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर

500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद। लगभग 20 लाख भक्त यहां भोजन करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है। मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष एक समान रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। माना जाता है पुरी क्षेत्र की अदिष्ठात्री देवी अन्नपूर्णा की कृपा से वहा भोजन अक्षय बना रहता है।  

7 बर्तनो का रहस्य

 प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं लेकिन आश्चर्य की बात यह है की जो बर्तन सबसे ऊपर रखा हुआ होता है उसमे भोजन सबसे पहले पकता है और सबसे निचे वाले बर्तन में सबसे बाद में सामन्य नियम देखे तो सबसे निचे वाले बर्तन पर अग्नि की आंच सबसे ज्यादा लगती है जिस कारण उसमें सबसे पहले भोजन पकना चाहिए लेकिन वहा विज्ञान का नियम उल्टा हो जाता है। 

समुद्र की विपरीत ध्वनि

मंदिर के सिंह द्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर में ) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप मंदिर के बाहर एक भी  कदम को पार करेंगे, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। 

रूप बदलते जगन्नाथ जी

यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। यहां प्रत्येक 12 साल में एक बार नया  रूप बदला होता है। ये मूर्तियां नई जरूर बनाई जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि उन मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गई है

रथयात्रा

आषाढ़ माह द्वितिया को जगन्नाथ जी  रथ पर सवार होकर अपनी मौसी गुंडिचा के घर जाते हैं। यह रथयात्रा 5 किलो‍मीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है। रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रदयुम्न की पत्नी

थी इसीलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है। अपनी मौसी के घर भगवान 8 दिन रहते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को वापसी की यात्रा होती है।

जगन्नाथ जी की आरती :

श्री जगन्नाथ अष्टकम
कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः
रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥
महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥
कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥
परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥
हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥
जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।
सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥

चारो धामों को विस्तार में पढ़ने और जानने के लिए जाये, भारत के चार धाम

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