Jain Religion – The Five Fundamental Principles of Jainism

जैन धर्म- जैन धर्म के पांच मूलभूत सिद्धान्त।

भगवान महावीर जैन की वे अमर शिक्षाएं/व्रत जो विश्व को बदलने की शक्ति रखती है।।

सम्पूर्ण विश्व मे महावीर जयंती का आयोजन चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तेरस को किया जाता है। यह पर्व जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी के जन्मदिवस को जनकल्याणक पर्व के रूप में मनाया जाता हैं।

आज सम्पूर्ण विश्व मे जब हिंसा, आतंकवाद व असहिष्णुता का माहौल बन रहा है एवम विश्व किसी बड़े भयावह महायुद्ध के साये में प्रतिपल साँस ले रहा है तो महावीर स्वामी की शिक्षाओं का महत्व बहुत अधिक है। भगवान महावीर स्वामी की प्रमुख शिक्षाएं निम्नानुसार है-

1. अहिंसा- “अहिंसा परमो धर्म”!

भगवान महावीर स्वामी ने अहिंसा के महत्व को बहुत व्यापक स्तर पर प्रस्तुत किया था। उनकी स्नेहमय दृष्टि में अहिंसा शारीरिक , मानसिक व बौद्धिक स्तर से बढ़ कर थी उनके मत में अगर किसी को हमारी मदद की आवश्यकता है और हम उसकी मदद करने में सक्षम हैं फिर हम उसकी सहायता ना करें तो यह भी एक हिंसा माना जाता है।

2. अपरिग्रह-

अपरिग्रह का अर्थ है कि किसी भी वस्तु का संचय नही करना। आज विश्व मे जब सब तरफ संसाधनों पर अधिकार करने की होड़ मची है एवम इसी होड़ के कारण सम्पूर्ण विश्व मे तनाव है तब महावीर स्वामी द्वारा प्रदत्त अपरिग्रह की शिक्षा विश्व में शांति स्थापना में बहुत सहायक हैं। अपरिग्रह एक गैर-अधिकार की भावना, गैर लोभी या गैर लोभ की अवधारणा है, जिसमें अधिकारात्मकता से मुक्ति पाई जाती है। अगर आज विश्व इसे सिद्धान्त स्वरूप मानकर व्यवहार में सम्मिलित कर ले तो यह दुनिया निश्चित रूप से स्वर्ग समान बन जाएगी।

3. अचौर्य-

अचौर्य से साधारण रूप से मतलब है कि “दूसरे की वस्तु नही चुराना”। महावीर स्वामी इस विचार, सन्देश, सिद्धान्त को बहुत व्यापक रूप से अर्थ प्रदान करते हुए अभिव्यक्त करते है कि शरीर-मन-बुद्धि को “मैं” नहीं माना जा सकता बल्कि “मैं” को शुद्ध चेतन्य स्वरूप माना जाना चाहिए। शरीर, मन व बुद्धि तो मात्र जीवन जीने का साधन है इनको “मैं” मानने से हम अपने यथार्थ स्वरूप तक नही पहुँच सकते। अचोरीबके सिद्धान्त की पालना हेतु हमें “मैं” व “मेरा” से आगे बढ़कर स्वयम के आत्मिक स्वरूप को पहचान लेना होगा।

4. सत्य-

भगवान महावीर स्वामी की शिक्षा में “सत्य” व्रत सत्य को बोलने से आगे बढ़ाता है जिसमे हम मन और बुद्धि को इस प्रकार अनुशासित व संयमित करते है कि जीवन की प्रत्येक परिस्तिथि में हम सही क्रिया व प्रतिक्रिया का चुनाव करें। उचित व अनुचित में उचित का चुनाव करें एवम शाश्वत व क्षणभंगुर में शाश्वत का चयन करें। ऐसा निरन्तर चुनाव ही हमें सत्य के मार्ग पर ले जाता हैं।

5. ब्रह्मचर्य-

यह सिद्धांत सिद्धांतों — अहिंसा, सत्य, अचौर्य के परिणामस्वरूप फलीभूत होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ ब्रह्म + चर्य ‘ अर्थात ब्रह्म [ चेतना ] में स्थिर रहना। “शरीर से भोग” करने की तृष्णा को छोड़ पाना तब भी सम्भव है जबकि हम अहिंसा, सत्य व अचौर्य के सिद्धांतों को जीवन मे उतार कर उसे जीवनशैली बना लें।

उपरोक्त शिक्षाओं/सिद्धान्तों/व्रतों के धारण से हम दिव्य मार्ग पर चल सकते हैं। भगवान महावीर की इन शिक्षाओं पर चलकर अनेको ने अपने मार्ग में दिव्य शक्ति का अहसास किया है।
सादर।

1 COMMENT

  1. मै भगवान महावीर के सिद्धांतो की पालाना करूँगा

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