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| On 1 month ago

Jodhpur

जोधपुर को जोधाणा, ब्ल्यू सिटी, सनसिटी के नाम से भी जाना जाता हैं। जोधपुर का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। राठौड़ वंश के प्रमुख राव जोधा को जोधपुर की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने 1459 में जोधपुर की स्थापना की थी।

जोधपुर का इतिहास

कन्नौज छोड़ने के बाद राठौड़ अपने लिए नए राज्य की खोज करते हुए राजस्थान के वर्तमान पाली जिले पहुँच गए थे। अफगानों के साथ हुए युद्ध के कारण राठौड़ राजवंश को कन्नौज छोड़ना पड़ा था। इससे पूर्व कन्नौज राज्य का दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान के साथ भीषण युद्ध हुआ था।

राठौड़ो द्वारा कालांतर में जोधपुर पर राज्य करने वाले राव जोधा को लगा कि तत्कालीन राजधानी मंडोर सुरक्षित नही है अतः उन्होंने यह निर्णय लिया कि नव जोधपुर की स्थापना हो। उन्होंने यह निर्णय 1459 ईसवी में लिया था। कालांतर में जोधपुर ने बहुत प्रगति की थी। ब्रिटिश राज के दौरान जोधपुर राज्य भूमि क्षेत्र द्वारा राजपूताना में सबसे बड़ा था। जोधपुर ब्रिटिश राज के तहत समृद्ध हुआ था। जोधपुर के व्यापारियों ने बहुत विकास भी किया था । जोधपुर की प्रमुख व्यापार करने वाली जातियों के नाम जैन, माहेश्वरी व अग्रवाल थे। इस वर्ग ने पूरे भारत में व्यापार में एक प्रमुख स्थान पर कब्जा कर लिया था। 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और राजस्थान यानी तत्कालीन राजपुताना राज्य का भारत संघ में विलय हो गया। जोधपुर राजस्थान का जयपुर के बाद दूसरा बड़ा शहर बना।


अपणायत का शहर

अपणायत का हिंदी में मतलब होता है आपसी प्रेम। जोधपुर के निवासियों में बहुत अपणायत है वे एक दूसरे से मिले बिना रह नही सकते है इसीलिए यहाँ हर मुहल्ले में बात करने के लिए हथाई यानी बातचीत का स्थान निर्धारित है। मुहल्ले के सीनियर लोग रोज शाम को यहाँ बैठ कर बातचीत करते है व यह क्रम देर रात तक चलता हैं। इसी आपसी प्रेम के कारण जो भी व्यक्ति किसी दूसरे शहर से यहाँ ट्रांसफर होकर आया वह यही बस गया। इसी कारण इस शहर में उत्तरप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड इत्यादि के हजारों परिवार यहां स्थायी रूप से अपना मकान बना कर बस गए हैं।

हथाई का मतलब

हथाई का मूल अर्थ बताना मुश्किल है लेकिन इतना बताना आसान है कि जहां पर समान प्रकृति के दस बीस इंसान बैठकर दिन-दुनिया की बाते कर सके उस स्थान को हथाई कहते हैं। वैसे तो यह व्यवस्था पूरे भारत मैं है लेकिन जोधपुर, बीकानेर, फलोदी, बाड़मेर की हथाई थोड़ी जगप्रसिद्ध हैं। यहाँ पर बैठकर लोग बाते ही नही करते बल्कि शतरंज खेलते है व चाय का आनंद उठाते हैं। एक बात और हैं यहां बैठ कर अगला जीमन या गोठ कहा होगी यह भी डिसाइड होता हैं।

जीमण या गोठ।

जीमण थोड़ा बड़े लेवल पर भोजन होता है जबकि गोठ थोड़ा पारिवारिक मामला होता हैं। भोजन दोनों में गरिष्ठ व स्वादिष्ट होता है लेकिन दोनों के मतलब एकदम अलग है। जीमण के लिए पहले से तैयारी की जाती है जबकि गोठ आकस्मिक भी हो सकती हैं। जोधपुर के निवासी दोनों का आनंद लेते हैं।

जोधपुर का इमारती पत्थर

"अपणायत" की इस नगरी के जहाँ " खंडे" यानी इमारती पत्थर प्रसिद्ध है । यहां की छीने बड़ी मशहूर है आस पास के जिलो के लोग आज भी अपने मकान के निर्माण के समय छत में लगने वाली छीनो यानी एक फुट बाई दस फुट के पत्थरों को यहां से लेकर जाते है। इनकी बड़ी साइज़ भी उपलब्ध होती हैं। ऐसा माना जाता है कि जहाँ आरसीसी की उम्र महज 60 साला होती है वही ये छीने 200 साल से भी अधिक साथ निभाती हैं।

जोधपुर अच्छे खाने की शौकीन नगरी

एक तरफ जहां जोधपुर के "खण्डे" यानी पत्थर मशहूर है वहीँ इसके " खावण खंडे" यानी खाने- पीने के शौकीन मशहूर हैं। खावन खण्डे एक स्थानीय शब्द है जिसका मतलब उस व्यक्ति से हैं जो कि अच्छे खाने का शौकीन हैं। जोधपुर के बारे में यह तय है कि शादी ब्याव में जोधपुर जितना अच्छा व स्वादिष्ट खाना पूरे भारत मे तो क्या शायद पूरी दुनिया मे भी नही बनता।

यहां की मिठाइयों की बात अलग है। दुनिया की बेस्ट मिठाई को भी यहाँ क्वालिटी के आधार पर फेल कर दिया जाता हैं। यहाँ के हलवाई बहुत होशियार है एवम वे अपनी पसंद का दूध, मावा व सूखे मेवे मिलने पर ही आपके लिए आदेशित भोजन बनाते हैं। वे चोहटे का दूध मिलने पर ही मिठाई बनाते है अगर आप उनको डेयरी का दूध लाकर लेंगे तो उनका मुड़ इस कदर खराब होगा कि वे आपसे बात तक करना बंद कर देंगे।

चोहटे का दूध

जोधपुर के अंदर भीतरी शहर व पाल रोड पर स्तिथ मिल्क मेन कॉलोनी जोधपुर हेतु सबसे बड़े दुग्ध सप्लाई सेंटर है। दूध का काम बहुतायत में घांची समाज के दुग्ध विक्रेता करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र से दूध लाकर शहर में बेचने का कार्य अनेक जातियों द्वारा किया जाता है।

घांची समाज द्वारा बेचे जाने वाले दुग्ध की दुकान पर प्रायः यह लिखा होता है कि " चोहटे का दूध "। जब दुकान पर यह शब्द हो तो इस बात की गारंटी होती है इस दुकान पर 100% शुद्ध दूध उपलब्ध है तथा उसमें पानी की एक बूंद भी नही मिलाई गई हैं। इस प्रकार की गारंटी व विश्वास शायद भारत के किसी भी दूसरे स्थान पर आपको नही मिल सकता।

किला दिखना जरूरी

इस शहर की आबोहवा में प्यार को महसूस करने वाले जानते है कि दिन कही भी गुजरे परन्तु शाम को किले के दर्शन जरुरी हैं। लोग बड़ी तकलीफ उठाकर भी शाम को अपने घर पहुँचना जरूरी समझते हैं। वे यह कहते भी है कि " शाम रा किलो दिखनो जरूरी हैं।" हालांकि लोग रोज किले के दर्शन नही करते है मगर इस कहावत का आशय मात्र इतना ही है कि यहां के लोग पारिवारिक मूल्यों पर चलते है एवम आपसी प्रेम के कारण शाम को अपने आशियाने में आना जरूरी समझते हैं।

जोधपुर के महापुरुष


राव सिंहा जी, राव जोधा जी की इस नगरी को राव मालदेव ने विस्तार व चंद्रसेन ने स्वाभिमान दिया। दुर्गादास राठोड़ व मुकनदास खींची ने इसकी सेवा की और मीरा माता ने सोभाग्य प्रदान किया। पत्थर के मेहरानगढ़ की नीव में राजाराम जी मेघवाल जी ने अपनी जिंदगी कुर्बान की। इस जिले से ही परमवीर चक्र विजेता शैतान सिंह भी हैैं।

राजनीति क्षेत्र में जोधपुर अग्रणी है। जोधपुर के अशोक जी गहलोत तीन बार के राज्य के मुख्य मंत्री रह चुके हैं। इसके अलावा बरकततुल्ला खान व जयनारायण व्यास भी राजस्थान के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हो चुके हैं। जोधपुर स्तिथ हाईकोर्ट के कारण अनेक विधिवेत्ता ने सम्पूर्ण भारत मे अपनी पहचान बनाई हैं। जिनमें मघराज कल्ला व सिंघवी परिवार प्रमुख हैं।

अंतरराष्ट्रीय टूरिस्ट पॉइंट


आज इस शहर का अन्तर्राष्ट्रीय टूरिंग मैप में विशेष स्थान इसके नीले रंग से पुते निवास स्थानों से है एवँ सूर्य देवता की पहली किरण यहाँ आशीर्वाद देती है। इसलिए इसे ब्लू सिटी और सन सिटी कहा जाता हैं।

शहर के सातो दरवाजो की बात निराली है, उम्मेद पैलेस जहाँ ताजमहल की याद दिलाता है वहीँ मेहरानगढ़ दुश्मनो में ख़ौफ़ पैदा करता है। कायलाना जल का स्त्रोत है वही मंडोर इतिहास को समझने का केंद्र है। जोधपुर सम्पूर्ण भारत का चहेता पर्यटन केंद्र हैं। शहर के तुरजी के झालरे के आसपास अनेक गेस्ट हाउस है जो कि विदेशों से आये मेहमानों से भरे रहते हैं।

जोधपुर की विश्वप्रसिद्ध मिठाईयां

आप यहाँ पधारे ( यानी आएं) और यहाँ की मावा की कचोरी, गुलाबजामुन, लड्डू, मिर्चीबड़ा और माखनिया लस्सी नहीं जीमे (खाएं) तो बात नहीं बनेगी। यहाँ के लोग तो खाने की थाली देखकर बता देते है कि लड्डु मोहनजी की दूकान का है और गुलाबजामुन चतुर जी के हाथो से बना हैं। यहाँ तक कि सबकी अपनी अपनी पसंद है किसी को पोकर स्वीट होम, किसी को वैष्णव स्वीट्स, किसी को जनता, किसी को रावत स्वीट होम तो किसी को किसी ठेले वाले कि मिठाई के बिना मजा ही नही आता।

मिठाई के मामले में यह एक एक्सपर्ट सिटी है अतः यहाँ मिठाई की दुकानें भी विशिष्ट है। हर दुकान की अपनी एक वेरायटी है तथा वह दुकान अपना पूरा फोकस उस मिठाई की क्वालिटी कंट्रोल पर रखती हैं। यहाँ के लोग भाव नही देखते लेकिन मिठाई पसंद आने पर आपकी दुकान की बिक्री को रातोरात चौगुनी कर देते हैं।


जोधपुर की मीठी भाषा।


यहाँ की वाणी और यहाँ का पानी बहुत मीठा है। यहाँ आओ तो " पधारो " और जाओ तो भी " पधारो " विश्वविख्यात है। यहांाँ के निवासी प्रत्येक को बड़े आदर से आवाज देते है। किसी के नाम के साथ " सा " लगाया जाता हैैं।

कभी मेरे शहर से गुजरो तो सीधे मत निकल जाना , कुछ रुकना और इसकी आत्मा में इसके अपनत्व की मिठास को साथ लेकर पधारना।